भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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स्वकर्मदक्षश्च यदान्तको जगद् वयःसु सर्वेष्ववशं विकर्षति। विनाशकाले कथमव्यवस्थिते जरा प्रतीक्ष्या विदुषा शमेप्सुना ॥११.६१ जब कि अपने कर्म में निपुण यम विवश जगत् को सब अवस्थाओं में दूर खींच रहा है, तब विनाश-काल अनिश्चित होनेपर शान्ति पाने का इच्छुक बुद्धिमान् क्यों बुढ़ापे की प्रतीक्षा करे? ॥61 ॥ जरायुधो व्याधिविकीर्णसायको यदान्तको व्याध इवाशिवः स्थितः। प्रजामृगान् भाग्यवनाश्रितांस्तुदन् वयःप्रकर्षं प्रति को मनोरथः ॥११.६२ जब कि जरा-रूप-शस्त्र धारी यम अमङ्गल व्याध के समान खड़ा होकर व्याधिरूप तीरों को बिखेरता हुआ भाग्य-रूप वन में आश्रित प्रजा रूप मृगों को पीड़ित कर रहा है, तब बुढ़ापे (में धर्म करने) की क्या चाह हो सकती है? ॥62 ॥ अतो युवा वा स्थविरोऽथवा शिशुस्तथा त्वरावानिह कर्तुमर्हति । यथा भवेद्धर्मवतः कृपात्मनः प्रवृत्तिरिष्टा विनिवृत्तिरेव वा ॥११.६३ इसलिए युवा हो, या वृद्ध या शिशु, वह यहाँ शीघ्र ऐसा करे, जिससे धर्मात्मा व शुद्धात्मा होकर (स्वर्ग- प्राप्ति-द्वारा) इष्ट प्रवृत्ति या (मोक्ष-प्राप्ति-द्वारा) इष्ट निवृत्ति प्राप्त करे ॥63 ॥ यदात्थ चापीष्टफलां कुलोचितां कुरुष्व धर्म्याय मखक्रियामिति । नमो मखेभ्यो न हि कामये सुखं परस्य दुःखक्रियया यदिष्यते ॥११.६४ यह जो कहा कि इष्ट फल देनेवाली कुलोचित यज्ञ-क्रिया धर्म के लिए करो; यज्ञों को प्रणाम है, मैं वह सुख नही चाहता, जो दूसरों को दुःख देकर चाहा जाता है ॥64 ॥ परं हि हन्तुं विवशं फलेप्सया न युक्तरूपं करुणात्मनः सतः। क्रतोः फलं यद्यपि शाश्वतं भवेत्तथापि कृत्वा किमु यत्क्षयात्मकम् ॥११.६५ जो दयावान् है उसके लिए फल पाने की इच्छा से दूसरे विवश जीव की हत्या करना ठीक नहीं। यदि यज्ञ का फल शाश्वत भी हो, तो भी वह करके क्या जो हिंसात्मक है? ॥65 ॥ भवेच्च धर्मो यदि नापरो विधिर्व्रतेन शीलेन मनःशमेन वा । तथापि नैवार्हति सेवितुं क्रतुं विशस्य यस्मिन् परमुच्यते फलम् ॥११.६६ यदि व्रत, शील या मानसिक शान्ति द्वारा धर्म प्राप्त होने का दूसरा उपाय न हो, तो भी यज्ञ का सेवन नही करना चाहिए, जिसमें दूसरे को मारकर फल प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है ॥66 ॥ इहापि तावत्पुरुषस्य तिष्ठतः प्रवर्त्तते यत्परहिंसया सुखम् । तदप्यनिष्टं सघृणस्य धीमतो भवान्तरे किं बत यन्न दृश्यते ॥११.६७ इस लोक में रहते हुए पुरुष को पर-हिंसा से जो सुख होता है, वह भी दयावान् बुद्धिमान् के लिए इष्ट (वांछनीय) नहीं; दूसरे जन्म में जो दिखाई नहीं पड़ रहा है उसका क्या? ॥67 ॥ न च प्रतार्योऽस्मि फलप्रवृत्तये भवेषु राजन् रमते न मे मनः। लता इवाम्भोधरवृष्टिताडिताः प्रवृत्तयः सर्वगता हि चञ्चला ॥११.६८ 60 अश्वघोष और फल के लिए प्रवृत्ति की ओर मैं नही बहकाया जा सकता हूँ, जन्म-चक्र में, हे राजन्, मेरा मन नही लग रहा है। बादल की वृष्टि से ताड़ित लता के समान यह सर्वव्यापी प्रवृत्ति चञ्चल है ॥68 ॥⁴⁹ इहागतश्चाहमितो दिदृक्षया मुनेरराडस्य विमोक्षवादिनः । प्रयामि चाद्यैव नृपास्तु ते शिवं वचः क्षमेथाः मम तत्त्वनिष्ठुरम् ॥११.६९ यहाँ आया हूँ और मोक्ष-वादी मुनि अराड को देखने की इच्छा से आज ही यहाँ से जा रहा हूँ। हे राजन्, आपका कल्याण हो, मेरे सत्यनिष्ठुर वचन को क्षमा कीजिए ॥69 ॥ अवेन्द्रवद्विध्यव शश्वदर्कवद्गुणैरव श्रेय इहाव गामव । अवायुरार्यैरव सत्सुतानव श्रियञ्च राजन्नव धर्ममात्मनः ॥११.७० इन्द्र के समान रक्षा कीजिए, आकाश के सूर्य के समान सदा रक्षा कीजिए, अपने आर्य (= उत्तम) गुणों से इस लोक में कल्याण की रक्षा कीजिए, पृथ्वी की रक्षा कीजिए, आयु की रक्षा कीजिए, सत्पुत्रों की रक्षा कीजिए, हे राजन्, लक्ष्मी व अपने धर्म की रक्षा कीजिए ॥70 ॥ हिमारिकेतुद्भवसंभवान्तरे यथा द्विजो याति विमोक्ष्यवंस्तनुम् । हिमारिशत्रुक्षयशत्रुघातने तथान्तरे याहि विमोक्ष्यन्मनः ॥११.७१ जैसे अग्नि-पताका (= धूम) से उत्पन्न होनेवाले (= बादल) से वृष्टि होनेपर अग्नि अपनी बाहरी आकृति को छोड़ देती है (या साँप अपनी केंचुल छोड़ता है), वैसे ही सूर्य-शत्रु (= तम) का विनाश करने में जो शत्रु (= विघ्न) हैं उनकी हत्या करके अपना मन मुक्त कीजिए" ॥71 ॥ नृपोऽब्रवीत्साञ्जलिरागतस्पृहो यथेष्टमाप्नोतु भवानविघ्नतः । अवाप्य काले कृतकृत्यतामिमां ममापि कार्यो भवता त्वनुग्रहः ॥११.७२ राजा ने हाथ जोड़कर अभिलाषापूर्वक कहा- "आप यथेष्ट सफलता निर्विघ्न प्राप्त करें और इसे प्राप्त कर समय पर मेरे ऊपर भी आप अनुग्रह कीजिएगा" ॥72 ॥ स्थिरं प्रतिज्ञाय तथेति पार्थिवे ततः स वैश्वन्तरमाश्रमं ययौ । परिव्रजन्तं समुदीक्ष्य विस्मितो नृपोऽपि वव्राज पुरिं गिरिव्रजम् ॥११.७३ तब, “वैसा ही हो" इस तरह राजा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा कर, वह वैश्वंतर-आश्रम की ओर गया। उसे जाते देखकर विस्मित हुआ राजा भी गिरि-वज्र पुरी (= राजगृह) को चला गया ॥73 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते कामविगर्हणो नामैकादशः सर्गः ॥११॥ ⁴⁹ - किसी जीव का जन्म बराबर एक ही योनि में नहीं होता है, वह भिन्न-भिन्न योनि में पैदा होता रहता है, और कभी वह स्वर्ग में रहता है तो कभी नरक में; इसलिए प्रवृत्ति का सर्वव्यापी और चञ्चल कहा गया है।