भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

यदा च जित्वापि महीं समग्रां वासय दृष्टं पुरमेकमेव । तत्रापि चैकं भवनं निषेव्यं श्रमः परार्थे ननु राजभावः ॥११.४७ और जब कि सारी पृथ्वी को जीतकर भी रहने के लिए वह एक ही नगर को देखता है, और उसमें भी उसे एक ही महल का सेवन करना पड़ता है, तब अवश्य ही राजत्व दूसरों के लिए (परि-) श्रम (करना) है ॥४७ ॥ राज्ञोऽपि वासोयुगमेकमेव क्षुत्सन्निरोधाय तथान्नमात्रा । शय्या तथैकासनमेकमेव शेषा विशेषा नृपतेर्मदाय ॥११.४८ राजा के लिए भी एक ही जोड़ा वस्त्र, उसी तरह क्षुधा-निवृत्ति के लिए कुछ अन्न, उसी तरह एक शय्या और एक ही आसन (आवश्यक है); राजा की शेष विशेषताएँ तो मद (पैदा करने) के लिए हैं ॥४८ ॥ तुष्ट्यर्थमेतच्च फलं यदिष्टमुपैषि राज्यान्मम तुष्टिरस्ति । तुष्टौ च सत्यां पुरुषस्य लोके सर्वे विशेषा ननु निर्विशेषाः ॥११.४९ और यदि सन्तोष के लिए यह फल इष्ट है, तो राज्य के बिना भी मुझे सन्तोष है। संसार में मनुष्य को सन्तोष होनेपर सब विशेषताएँ विशेषता-रहित हैं ॥४९ ॥ तन्नास्मि कामान् प्रति सम्प्रतार्यः क्षेमं शिवं मार्गमनुप्रपन्नः । स्मृत्वा सुहृत्त्वं तु पुनः पुनर्मां ब्रूहि प्रतिज्ञां खलु पालयति ॥११.५० इसलिए कर्मों के प्रति मैं बहकाया नहीं जा सकता; मङ्गलमय व कल्याणकारी मार्ग की शरण में हूँ। मित्रता का स्मरण कर आप बार-बार मुझसे कहें- "अवश्य प्रतिज्ञा पालन करो" ॥५० ॥ न ह्यस्म्यमर्षेण वनं प्रविष्टो न शत्रुबाणैरवधूतमौलिः । कृतस्पृहो नापि फलाधिकेभ्यो गृह्णामि नैतद्वचनं यतस्ते ॥११.५१ न तो क्रोध से मैंने वन में प्रवेश किया है, और न शत्रु के बाणों से मुकुट कँपाये जानेपर ही। न तो अधिक फल के लिए अभिलाषा करता हूँ, जिससे आपकी यह बात न मान रहा हूँ ॥५१ ॥ यो दन्दशूकं कुपितं भुजङ्गं मुक्त्वा व्यवस्येद्धि पुनर्गृहीतुम् । दाहात्मिकां वा ज्वलितां तृणोल्कां सन्त्यज्य कामान् स पुनर्भजेत ॥११.५२ जो डँसनेवाले कुपित साँपों को, या जलानेवाली जलती उल्का को छोड़कर फिर से पकड़ने का विचार करे, वही कर्मों को छोड़कर फिर उनका सेवन करे ॥५२ ॥ अन्धाय यश्च स्पृहयेदनन्धो बद्धाय मुक्तो विधनाय चाढ्यः । उन्मत्तचित्ताय च कल्पचित्तः स्पृहां स कुर्याद्विषयात्मकाय ॥११.५३ जो दृष्टिमान् दृष्टि-हीन (होने के) लिए और जो मुक्त (पुरुष) बन्दी (होने के) लिए, और जो धनी निर्धन (होने के) लिए और जो स्वस्थ-चित्त उन्मत्त-चित्त (होने के) लिए अभिलाषा करे, वही विषयी (होने के) लिए अभिलाषा करे ॥५३ ॥


भैक्षोपभोगीति च नानुकम्प्यः कृती जरामृत्युभयं तितीर्षुः । इहोत्तमं शान्तिसुखं च यस्य परत्र दुःखानि च संवृतानि ॥११.५४ "भिक्षा पर रहता है" इसलिए वह बुद्धिमान् अनुकम्पा के योग्य नहीं जो जरा व मृत्यु का भय पार करना चाहता है, जिसका इस संसार में उत्तम शान्ति सुख प्राप्त है और परलोक में जिसके दुःख नष्ट हैं ॥५४ ॥ लक्ष्म्यां महत्यामपि वर्तमानस्तृष्णाभिभूतस्त्वनुकम्पितव्यः । प्राप्नोति यः शान्तिसुखं न चेह परत्र दुःखं प्रतिगृह्यते च ॥११.५५ महती लक्ष्मी की (गोद में) रहता हुआ भी तृष्णा से अभिभूत पुरुष अनुकम्पा के योग्य है, जो इस लोक में शान्ति-सुख नहीं पाता और जो परलोक में दुःखों से प्राप्त होता है ॥५५ ॥ एवं तु वक्तुं भवतोऽनुरूपं सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव । ममापि वोढुं सदृशं प्रतिज्ञां सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव ॥११.५६ ऐसा कहना आपके सत्त्व आचार और कुल के अनुरूप है, मेरे लिए भी प्रतिज्ञा पालन करना मेरे सत्त्व, आचार और कुल के योग्य है ॥५६ ॥ अहं हि संसारशरेण विद्धो विनिःसृतः शान्तिमवाप्तुकामः । नेच्छेयमाप्तुं त्रिदिवेऽपि राज्यं निरामयं किं बत मानुषेषु ॥११.५७ संसाररूप तीर से विद्ध होकर शान्ति पाने की इच्छा से मैं (घर से) निकला हूँ, स्वर्ग का भी निष्कण्टक राज्य नहीं पाना चाहता हूँ, मर्त्यलोक का क्या कहना? ॥५७ ॥ त्रिवर्गसेवां नृप यत्तु कृत्स्नतः परो मनुष्यर्थ इति त्वमात्थ माम् । अनर्थ इत्येव ममात्र दर्शनं क्षयी त्रिवर्गो हि न चापि तर्पकः ॥११.५८ पूरा-पूरा त्रिवर्ग सेवन परम पुरुषार्थ है, हे राजन्, यह जो आपने मुझे कहा, इसमें मैं अनर्थ ही देखता हूँ क्योंकि त्रिवर्ग नाशवान् है और तृप्तिदायक भी नहीं है ॥५८ ॥ पदे तु यस्मिन्न जरा न भीर्न रुङ् न जन्म नैवोपरमो न चाधयः । तमेव मन्ये पुरुषार्थमुत्तमं न विद्यते यत्र पुनः पुनः क्रिया ॥११.५९ जिसमें न जरा है, न भय, न रोग, न जन्म, न मृत्यु, और न आधि, उसी पद को मैं उत्तम पुरुषार्थ मानता हूँ जिसमें बार-बार कर्म नहीं करना पड़ता ॥५९ ॥ यदप्यवोचः परिपाल्यतां जरा नवं वयो गच्छति विक्रियामिति । अनिश्चयोऽयं बहुशो हि दृश्यते जराप्यधीरा धृतिमच्च यौवनम् ॥११.६० यह जो कहा कि जरा की प्रतीक्षा करो, नई वयस में विकार होता है, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि बहुधा देखा जाता है कि बुढ़ापे में भी अधैर्य है और जवानी में भी धैर्य ॥६० ॥⁴⁸


⁴⁸- "चपलं" की जगह "बहुशः" रक्खा गया है। बुद्धचरित 59