बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
यदा च जित्वापि महीं समग्रां वासय दृष्टं पुरमेकमेव । तत्रापि चैकं भवनं निषेव्यं श्रमः परार्थे ननु राजभावः ॥११.४७ और जब कि सारी पृथ्वी को जीतकर भी रहने के लिए वह एक ही नगर को देखता है, और उसमें भी उसे एक ही महल का सेवन करना पड़ता है, तब अवश्य ही राजत्व दूसरों के लिए (परि-) श्रम (करना) है ॥४७ ॥ राज्ञोऽपि वासोयुगमेकमेव क्षुत्सन्निरोधाय तथान्नमात्रा । शय्या तथैकासनमेकमेव शेषा विशेषा नृपतेर्मदाय ॥११.४८ राजा के लिए भी एक ही जोड़ा वस्त्र, उसी तरह क्षुधा-निवृत्ति के लिए कुछ अन्न, उसी तरह एक शय्या और एक ही आसन (आवश्यक है); राजा की शेष विशेषताएँ तो मद (पैदा करने) के लिए हैं ॥४८ ॥ तुष्ट्यर्थमेतच्च फलं यदिष्टमुपैषि राज्यान्मम तुष्टिरस्ति । तुष्टौ च सत्यां पुरुषस्य लोके सर्वे विशेषा ननु निर्विशेषाः ॥११.४९ और यदि सन्तोष के लिए यह फल इष्ट है, तो राज्य के बिना भी मुझे सन्तोष है। संसार में मनुष्य को सन्तोष होनेपर सब विशेषताएँ विशेषता-रहित हैं ॥४९ ॥ तन्नास्मि कामान् प्रति सम्प्रतार्यः क्षेमं शिवं मार्गमनुप्रपन्नः । स्मृत्वा सुहृत्त्वं तु पुनः पुनर्मां ब्रूहि प्रतिज्ञां खलु पालयति ॥११.५० इसलिए कर्मों के प्रति मैं बहकाया नहीं जा सकता; मङ्गलमय व कल्याणकारी मार्ग की शरण में हूँ। मित्रता का स्मरण कर आप बार-बार मुझसे कहें- "अवश्य प्रतिज्ञा पालन करो" ॥५० ॥ न ह्यस्म्यमर्षेण वनं प्रविष्टो न शत्रुबाणैरवधूतमौलिः । कृतस्पृहो नापि फलाधिकेभ्यो गृह्णामि नैतद्वचनं यतस्ते ॥११.५१ न तो क्रोध से मैंने वन में प्रवेश किया है, और न शत्रु के बाणों से मुकुट कँपाये जानेपर ही। न तो अधिक फल के लिए अभिलाषा करता हूँ, जिससे आपकी यह बात न मान रहा हूँ ॥५१ ॥ यो दन्दशूकं कुपितं भुजङ्गं मुक्त्वा व्यवस्येद्धि पुनर्गृहीतुम् । दाहात्मिकां वा ज्वलितां तृणोल्कां सन्त्यज्य कामान् स पुनर्भजेत ॥११.५२ जो डँसनेवाले कुपित साँपों को, या जलानेवाली जलती उल्का को छोड़कर फिर से पकड़ने का विचार करे, वही कर्मों को छोड़कर फिर उनका सेवन करे ॥५२ ॥ अन्धाय यश्च स्पृहयेदनन्धो बद्धाय मुक्तो विधनाय चाढ्यः । उन्मत्तचित्ताय च कल्पचित्तः स्पृहां स कुर्याद्विषयात्मकाय ॥११.५३ जो दृष्टिमान् दृष्टि-हीन (होने के) लिए और जो मुक्त (पुरुष) बन्दी (होने के) लिए, और जो धनी निर्धन (होने के) लिए और जो स्वस्थ-चित्त उन्मत्त-चित्त (होने के) लिए अभिलाषा करे, वही विषयी (होने के) लिए अभिलाषा करे ॥५३ ॥
भैक्षोपभोगीति च नानुकम्प्यः कृती जरामृत्युभयं तितीर्षुः । इहोत्तमं शान्तिसुखं च यस्य परत्र दुःखानि च संवृतानि ॥११.५४ "भिक्षा पर रहता है" इसलिए वह बुद्धिमान् अनुकम्पा के योग्य नहीं जो जरा व मृत्यु का भय पार करना चाहता है, जिसका इस संसार में उत्तम शान्ति सुख प्राप्त है और परलोक में जिसके दुःख नष्ट हैं ॥५४ ॥ लक्ष्म्यां महत्यामपि वर्तमानस्तृष्णाभिभूतस्त्वनुकम्पितव्यः । प्राप्नोति यः शान्तिसुखं न चेह परत्र दुःखं प्रतिगृह्यते च ॥११.५५ महती लक्ष्मी की (गोद में) रहता हुआ भी तृष्णा से अभिभूत पुरुष अनुकम्पा के योग्य है, जो इस लोक में शान्ति-सुख नहीं पाता और जो परलोक में दुःखों से प्राप्त होता है ॥५५ ॥ एवं तु वक्तुं भवतोऽनुरूपं सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव । ममापि वोढुं सदृशं प्रतिज्ञां सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव ॥११.५६ ऐसा कहना आपके सत्त्व आचार और कुल के अनुरूप है, मेरे लिए भी प्रतिज्ञा पालन करना मेरे सत्त्व, आचार और कुल के योग्य है ॥५६ ॥ अहं हि संसारशरेण विद्धो विनिःसृतः शान्तिमवाप्तुकामः । नेच्छेयमाप्तुं त्रिदिवेऽपि राज्यं निरामयं किं बत मानुषेषु ॥११.५७ संसाररूप तीर से विद्ध होकर शान्ति पाने की इच्छा से मैं (घर से) निकला हूँ, स्वर्ग का भी निष्कण्टक राज्य नहीं पाना चाहता हूँ, मर्त्यलोक का क्या कहना? ॥५७ ॥ त्रिवर्गसेवां नृप यत्तु कृत्स्नतः परो मनुष्यर्थ इति त्वमात्थ माम् । अनर्थ इत्येव ममात्र दर्शनं क्षयी त्रिवर्गो हि न चापि तर्पकः ॥११.५८ पूरा-पूरा त्रिवर्ग सेवन परम पुरुषार्थ है, हे राजन्, यह जो आपने मुझे कहा, इसमें मैं अनर्थ ही देखता हूँ क्योंकि त्रिवर्ग नाशवान् है और तृप्तिदायक भी नहीं है ॥५८ ॥ पदे तु यस्मिन्न जरा न भीर्न रुङ् न जन्म नैवोपरमो न चाधयः । तमेव मन्ये पुरुषार्थमुत्तमं न विद्यते यत्र पुनः पुनः क्रिया ॥११.५९ जिसमें न जरा है, न भय, न रोग, न जन्म, न मृत्यु, और न आधि, उसी पद को मैं उत्तम पुरुषार्थ मानता हूँ जिसमें बार-बार कर्म नहीं करना पड़ता ॥५९ ॥ यदप्यवोचः परिपाल्यतां जरा नवं वयो गच्छति विक्रियामिति । अनिश्चयोऽयं बहुशो हि दृश्यते जराप्यधीरा धृतिमच्च यौवनम् ॥११.६० यह जो कहा कि जरा की प्रतीक्षा करो, नई वयस में विकार होता है, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि बहुधा देखा जाता है कि बुढ़ापे में भी अधैर्य है और जवानी में भी धैर्य ॥६० ॥⁴⁸
⁴⁸- "चपलं" की जगह "बहुशः" रक्खा गया है। बुद्धचरित 59
स्वकर्मदक्षश्च यदान्तको जगद् वयःसु सर्वेष्ववशं विकर्षति। विनाशकाले कथमव्यवस्थिते जरा प्रतीक्ष्या विदुषा शमेप्सुना ॥११.६१ जब कि अपने कर्म में निपुण यम विवश जगत् को सब अवस्थाओं में दूर खींच रहा है, तब विनाश-काल अनिश्चित होनेपर शान्ति पाने का इच्छुक बुद्धिमान् क्यों बुढ़ापे की प्रतीक्षा करे? ॥61 ॥ जरायुधो व्याधिविकीर्णसायको यदान्तको व्याध इवाशिवः स्थितः। प्रजामृगान् भाग्यवनाश्रितांस्तुदन् वयःप्रकर्षं प्रति को मनोरथः ॥११.६२ जब कि जरा-रूप-शस्त्र धारी यम अमङ्गल व्याध के समान खड़ा होकर व्याधिरूप तीरों को बिखेरता हुआ भाग्य-रूप वन में आश्रित प्रजा रूप मृगों को पीड़ित कर रहा है, तब बुढ़ापे (में धर्म करने) की क्या चाह हो सकती है? ॥62 ॥ अतो युवा वा स्थविरोऽथवा शिशुस्तथा त्वरावानिह कर्तुमर्हति । यथा भवेद्धर्मवतः कृपात्मनः प्रवृत्तिरिष्टा विनिवृत्तिरेव वा ॥११.६३ इसलिए युवा हो, या वृद्ध या शिशु, वह यहाँ शीघ्र ऐसा करे, जिससे धर्मात्मा व शुद्धात्मा होकर (स्वर्ग- प्राप्ति-द्वारा) इष्ट प्रवृत्ति या (मोक्ष-प्राप्ति-द्वारा) इष्ट निवृत्ति प्राप्त करे ॥63 ॥ यदात्थ चापीष्टफलां कुलोचितां कुरुष्व धर्म्याय मखक्रियामिति । नमो मखेभ्यो न हि कामये सुखं परस्य दुःखक्रियया यदिष्यते ॥११.६४ यह जो कहा कि इष्ट फल देनेवाली कुलोचित यज्ञ-क्रिया धर्म के लिए करो; यज्ञों को प्रणाम है, मैं वह सुख नही चाहता, जो दूसरों को दुःख देकर चाहा जाता है ॥64 ॥ परं हि हन्तुं विवशं फलेप्सया न युक्तरूपं करुणात्मनः सतः। क्रतोः फलं यद्यपि शाश्वतं भवेत्तथापि कृत्वा किमु यत्क्षयात्मकम् ॥११.६५ जो दयावान् है उसके लिए फल पाने की इच्छा से दूसरे विवश जीव की हत्या करना ठीक नहीं। यदि यज्ञ का फल शाश्वत भी हो, तो भी वह करके क्या जो हिंसात्मक है? ॥65 ॥ भवेच्च धर्मो यदि नापरो विधिर्व्रतेन शीलेन मनःशमेन वा । तथापि नैवार्हति सेवितुं क्रतुं विशस्य यस्मिन् परमुच्यते फलम् ॥११.६६ यदि व्रत, शील या मानसिक शान्ति द्वारा धर्म प्राप्त होने का दूसरा उपाय न हो, तो भी यज्ञ का सेवन नही करना चाहिए, जिसमें दूसरे को मारकर फल प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है ॥66 ॥ इहापि तावत्पुरुषस्य तिष्ठतः प्रवर्त्तते यत्परहिंसया सुखम् । तदप्यनिष्टं सघृणस्य धीमतो भवान्तरे किं बत यन्न दृश्यते ॥११.६७ इस लोक में रहते हुए पुरुष को पर-हिंसा से जो सुख होता है, वह भी दयावान् बुद्धिमान् के लिए इष्ट (वांछनीय) नहीं; दूसरे जन्म में जो दिखाई नहीं पड़ रहा है उसका क्या? ॥67 ॥ न च प्रतार्योऽस्मि फलप्रवृत्तये भवेषु राजन् रमते न मे मनः। लता इवाम्भोधरवृष्टिताडिताः प्रवृत्तयः सर्वगता हि चञ्चला ॥११.६८ 60 अश्वघोष और फल के लिए प्रवृत्ति की ओर मैं नही बहकाया जा सकता हूँ, जन्म-चक्र में, हे राजन्, मेरा मन नही लग रहा है। बादल की वृष्टि से ताड़ित लता के समान यह सर्वव्यापी प्रवृत्ति चञ्चल है ॥68 ॥⁴⁹ इहागतश्चाहमितो दिदृक्षया मुनेरराडस्य विमोक्षवादिनः । प्रयामि चाद्यैव नृपास्तु ते शिवं वचः क्षमेथाः मम तत्त्वनिष्ठुरम् ॥११.६९ यहाँ आया हूँ और मोक्ष-वादी मुनि अराड को देखने की इच्छा से आज ही यहाँ से जा रहा हूँ। हे राजन्, आपका कल्याण हो, मेरे सत्यनिष्ठुर वचन को क्षमा कीजिए ॥69 ॥ अवेन्द्रवद्विध्यव शश्वदर्कवद्गुणैरव श्रेय इहाव गामव । अवायुरार्यैरव सत्सुतानव श्रियञ्च राजन्नव धर्ममात्मनः ॥११.७० इन्द्र के समान रक्षा कीजिए, आकाश के सूर्य के समान सदा रक्षा कीजिए, अपने आर्य (= उत्तम) गुणों से इस लोक में कल्याण की रक्षा कीजिए, पृथ्वी की रक्षा कीजिए, आयु की रक्षा कीजिए, सत्पुत्रों की रक्षा कीजिए, हे राजन्, लक्ष्मी व अपने धर्म की रक्षा कीजिए ॥70 ॥ हिमारिकेतुद्भवसंभवान्तरे यथा द्विजो याति विमोक्ष्यवंस्तनुम् । हिमारिशत्रुक्षयशत्रुघातने तथान्तरे याहि विमोक्ष्यन्मनः ॥११.७१ जैसे अग्नि-पताका (= धूम) से उत्पन्न होनेवाले (= बादल) से वृष्टि होनेपर अग्नि अपनी बाहरी आकृति को छोड़ देती है (या साँप अपनी केंचुल छोड़ता है), वैसे ही सूर्य-शत्रु (= तम) का विनाश करने में जो शत्रु (= विघ्न) हैं उनकी हत्या करके अपना मन मुक्त कीजिए" ॥71 ॥ नृपोऽब्रवीत्साञ्जलिरागतस्पृहो यथेष्टमाप्नोतु भवानविघ्नतः । अवाप्य काले कृतकृत्यतामिमां ममापि कार्यो भवता त्वनुग्रहः ॥११.७२ राजा ने हाथ जोड़कर अभिलाषापूर्वक कहा- "आप यथेष्ट सफलता निर्विघ्न प्राप्त करें और इसे प्राप्त कर समय पर मेरे ऊपर भी आप अनुग्रह कीजिएगा" ॥72 ॥ स्थिरं प्रतिज्ञाय तथेति पार्थिवे ततः स वैश्वन्तरमाश्रमं ययौ । परिव्रजन्तं समुदीक्ष्य विस्मितो नृपोऽपि वव्राज पुरिं गिरिव्रजम् ॥११.७३ तब, “वैसा ही हो" इस तरह राजा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा कर, वह वैश्वंतर-आश्रम की ओर गया। उसे जाते देखकर विस्मित हुआ राजा भी गिरि-वज्र पुरी (= राजगृह) को चला गया ॥73 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते कामविगर्हणो नामैकादशः सर्गः ॥११॥ ⁴⁹ - किसी जीव का जन्म बराबर एक ही योनि में नहीं होता है, वह भिन्न-भिन्न योनि में पैदा होता रहता है, और कभी वह स्वर्ग में रहता है तो कभी नरक में; इसलिए प्रवृत्ति का सर्वव्यापी और चञ्चल कहा गया है।
द्वादश सर्ग अराड-दर्शन ततः शमविहारस्य मुनेरिक्षवाकुचन्द्रमाः । अराडस्याश्रमं भेजे वपुषा पूरयन्निव ॥१२.१ तब इक्ष्वाकु (-वंश का) चन्द्रमा शम-धर्म में विहार करनेवाले अराड के आश्रम में गया, उस (आश्रम) को वह (राज-कुमार) अपने रूप से मानो भर रहा था ॥1 ॥ स कालामसगोत्रेण तेनालोक्यैव दूरतः । उच्चैः स्वागतमित्युक्तः समीपमुपजग्मिवान् ॥१२.२ कालाम गोत्र के उस मुनि ने दूर से ही उसे देखकर जोर से 'स्वागत' शब्द कहा, और वह (कुमार) उसके समीप गया ॥2 ॥ तावुभौ न्यायतः पृष्ट्वा धातुसाम्यं परस्परम् । दारव्योर्मेध्ययोर्वृष्योः शुचौ देशे निषेदतुः ॥१२.३ वे दोनों न्यायपूर्वक परस्पर धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछकर पवित्र स्थान में काठ के दो पवित्र आसनों पर बैठ गये ॥3 ॥ तमासीनं नृपसुतं सोऽब्रवीन्मुनिसत्तमः । बहुमानविशालाभ्यां दर्शनाभ्यां पिबन्निव ॥१२.४ उस मुनि-श्रेष्ठ ने, सम्मान के कारण अपनी विकसित आँखों से, बैठे हुए उस राज कुमार को मानो पीते हुए कहा:— ॥4 ॥ विदितं मे यथा सौम्य निष्क्रान्तो भवनादसि । छित्त्वा स्नेहमयं पाशं पाशं दृप्त इव द्विपः ॥१२.५ “हे सौम्य, मुझे मालूम है कि आप किस प्रकार घर से निकले हैं। जैसे गर्वीला हाथी बन्धन को काटकर (निकलता है), वैसे ही स्नेहमय बन्धन को काटकर आप निकले हैं ॥5 ॥ सर्वथा धृतिमच्चैव प्राज्ञं चैव मनस्तव । यस्त्वं प्राप्तः श्रियं त्यक्त्वा लतां विषफलामिव ॥१२.६ आपका मन सब प्रकार से धैर्यवान् व ज्ञानवान् है जो आप विषाक्त फलवाली लता की तरह लक्ष्मी को तजकर आये हैं ॥6 ॥ नाश्चर्यं जीर्णवयसो यज्जग्मुः पार्थिवा वनम् । अपत्येभ्यः श्रियं दत्त्वा भुक्तोच्छिष्टामिव स्रजम् ॥१२.७ (इसमें कुछ) आश्चर्य नहीं कि बूढ़े होनेपर राजा लोग अपनी सन्तानों को उपभोग की गई झूठी माला की तरह राज्य-लक्ष्मी सौंपकर वन गये हैं ॥7 ॥
इदं मे मतमाश्चर्यं नवे वयसि यद्भवान् । अभुक्त्वाैव श्रियं प्राप्तः स्थितो विषयगोचरे ॥१२.८ इसे मैं आश्चर्य मानता हूँ कि आप, नई वयस में विषयों की गोचर-भूमि में रहते हुए, लक्ष्मी का उपभोग किए बिना ही आ गये हैं ॥8 ॥ तद्विज्ञातुमिमं धर्मं परमं भाजनं भवान् । ज्ञानप्लवमधिष्ठाय शीघ्रं दुःखार्णवं तर ॥१२.९ इसलिए इस परम धर्म को जानने के लिए आप उत्तम पात्र हैं; ज्ञानरूप नाव पर चढ़कर दुःखरूप सागर को शीघ्र पार कीजिए ॥9 ॥ शिष्ये यद्यपि विज्ञाते शास्त्रं कालेन वर्ण्यते । गाम्भीर्याद्व्यवसायाच्च न परीक्ष्यो भवान्मम ॥१२.१० यद्यपि शिष्य को जानने के बाद समय पर शास्त्र बताया जाता है, किन्तु आपकी गम्भीरता व निश्चय के कारण मैं आपकी परीक्षा नहीं करूँगा" ॥10 ॥ इति वाक्यमराडस्य विज्ञाय स नरर्षभः । बभूव परमप्रीतः प्रोवाचोत्तरमेव च ॥१२.११ अराड की यह बात जानकर वह नर-श्रेष्ठ परम प्रसन्न हुआ और उत्तर दिया:— ॥11 ॥ विरक्तस्यापि यदिदं सौमुख्यं भवतः परम् । अकृतार्थोऽप्यनेनास्मि कृतार्थ इव सम्प्रति ॥१२.१२ “विरक्त होनेपर भी आपकी जो यह अत्यन्त अनुकूलता है, अकृतार्थ होनेपर भी मैं इससे इस समय कृतार्थ-सा हूँ ॥12 ॥ दिदृक्षुरिव हि ज्योतिर्याियासुरिव दैशिकम् । त्वद्दर्शनमहं मन्ये तितीर्षुरिव च प्लवम् ॥१२.१३ आपके दर्शन को मैं वैसा ही मान रहा हूँ, जैसा कि देखने की इच्छा करनेवला प्रकाश को, यात्रा की इच्छा करनेवाला (मार्ग) बतानेवाले को, और (नदी) पार करने की इच्छा करनेवाला नाव को मानता है ॥13 ॥ तस्मादर्हसि तद्वक्तुं वक्तव्यं यदि मन्यसे । जरामरणरोगेभ्यो यथायं परिमुच्यते ॥१२.१४ इसलिए यदि आप कहने योग्य समझें, तो आपको वह कहना चाहिए जिससे यह व्यक्ति जरा मरण व रोग से मुक्त हो जाय" ॥14 ॥ इत्यराडः कुमारस्य माहात्म्यादेव चोदितः । सङ्क्षिप्तं कथयांचक्रे स्वस्य शास्त्रस्य निश्चयम् ॥१२.१५ बुद्धचरित 61
कुमार के माहात्म्य से ही प्रेरित होकर, अराड ने अपने शास्त्र का सङ्क्षिप्त निश्चय इस प्रकार कहा:- ॥15 ॥ श्रूयतामयमस्माकं सिद्धान्तः शृण्वतां वर । यथा भवति संसारो यथा चैव निवर्तते ॥१२.१६ “हे श्रोताओं में श्रेष्ठ, हमारा यह सिद्धान्त सुनिये कि कैसे यह संसार प्रवृत्त होता है और कैसे निवृत्त होता है ॥16 ॥ प्रकृतिश्च विकारश्च जन्म मृत्युर्जरेव च । तत्तावत्सत्त्वमित्युक्तं स्थिरसत्त्व परेहि तत् ॥१२.१७ हे स्थिर-सत्त्व, इसे समझिये; प्रकृति, विकार, जन्म, जरा व मृत्यु को ही सत्त्व कहा गया है ॥17 ॥ तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकौविद । पञ्च भूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥१२.१८ हे प्रकृति को जाननेवाले, उसमें पाँच (महा-) भूतों, अहङ्कार, बुद्धि और अव्यक्त को प्रकृति जानिये ॥18 ॥ विकार इति बुध्यस्व विषयानिन्द्रियाणि च । पाणिपादं च वाचं च पायूपस्थं तथा मनः ॥१२.१९ विषयों, इन्द्रियों, हाथ-पाँव, वाणी, गुदा, जननेन्द्रिय व मन को विकार समझिये ॥19 ॥ अस्य क्षेत्रस्य विज्ञानात्क्षेत्रज्ञ इति सञ्ज्ञि च । क्षेत्रज्ञ इति चात्मानं कथयन्त्यात्मचिन्तकाः ॥१२.२० और सञ्ज्ञावान् (= चेतनावान्, होशवाला) इस क्षेत्र को जानने के कारण क्षेत्रज्ञ है। और आत्मा की चिन्ता करनेवाले लोग आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं ॥20 ॥ सशिष्यः कपिलश्चेह प्रतिबुद्ध इति स्मृतः । सपुत्रः प्रतिबुद्धस्तु प्रजापतिरिहोच्यते ॥१२.२१ और इस संसार में शिष्यों-सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है, उसने पुत्रों सहित ज्ञान प्राप्त किया और वह इस संसार में प्रजापति कहा जाता है ॥21 ॥⁵⁰ जायते जीर्यते चैव बाध्यते म्रियते च यत् । तद्व्यक्तमिति विज्ञेयमव्यक्तं तु विपर्ययात् ॥१२.२२ जो जन्म लेता है, बूढ़ा होता है, पीड़ित होता है और मरता है उसे व्यक्त समझना चाहिए और जो इसका विपरीत (उलटा) है उसे अव्यक्त समझना चाहिए ॥22 ॥ अज्ञानं कर्म तृष्णा च ज्ञेयाः संसारहेतवः । स्थितोऽस्मिंस्त्रितये जन्तुस्तत्सत्त्वं नातिवर्तते ॥१२.२३ अज्ञान, कर्म व तृष्णा संसार के कारण-स्वरूप हैं। इन तीनों गुणों में रहनेवाला प्राणी उस सत्त्व (= प्रकृति विकार जन्म जरा व मृत्यु) के पार नहीं जा सकता ॥23 ॥ विप्रत्ययादहङ्कारात्सन्देहादभिसम्प्लवात् । अविशेषानुपायभ्यां सङ्गादभ्यवपाततः ॥१२.२४ विप्रत्यय, अहङ्कार, सन्देह अभिसम्प्लव, अविशेष, अनुपाय, सङ्ग और अभ्यवपात के कारण (प्राणी उस सत्त्व के पार नहीं जा सकता) ॥24 ॥ तत्र विप्रत्ययो नाम विपरीतं प्रवर्तते । अन्यथा कुरुते कार्यं मन्तव्यं मन्यतेऽन्यथा ॥१२.२५ उसमें विप्रत्यय (= अविश्वास, मिथ्या विश्वास) विपरीत आचरण करता है, जो करना है उसे अन्यथा करता है, जो विचारना है उसे अन्यथा विचारता है ॥25 ॥ ब्रवीम्यहमहं वेद्मि गच्छाम्यहमहं स्थितः । इतीहैवमहङ्कारस्त्वनहङ्कार वर्तते ॥१२.२६ हे अहङ्कार-रहित, मैं बोलता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं जाता हूँ, मैं खड़ा हूँ, इस प्रकार इस संसार में अहङ्कार होता है ॥26 ॥ यस्तु भावानसन्दिग्धानेकीभावेन पश्यति । मृत्पिण्डवदसन्देहे स इहोच्यते ॥१२.२७ हे सन्देह-रहित, जो परस्पर नहीं मिली हुई चीजों को मिट्टी के ढेले के समान एक (=ठोस) देखता है, वह इस संसार में सन्देह कहा जाता है ॥27 ॥ य एवाहं स एवेदं मनो बुद्धिश्च कर्म च । यश्चैवैष गणः सोऽहमिति यः सोऽभिसम्प्लवः ॥१२.२८ जो ही मैं हूँ वही यह मन बुद्धि कर्म है, और (मन बुद्धि व कर्म का) जो यह समूह है वहीं मैं हूँ, ऐसा जो है वह अभिसम्प्लव है ॥28 ॥ अविशेषं विशेषज्ञ प्रतिबुद्धाप्रबुद्धयोः । प्रकृतीनां च यो वेद सोऽविशेष इति स्मृतः ॥१२.२९ हे विशेषज्ञ, जो ज्ञानी व अज्ञानी के बीच तथा प्रकृति के बीच अविशेष (= अभेद, भेद नहीं) जानता है वह अविशेष स्मरण किया गया है ॥29 ॥
⁵⁰- “प्रतिबुद्धिरिति स्मृतिः” के स्थान में “प्रतिबुद्ध इति स्मृतः” रक्खा गया है। यह एक दुर्बोध श्लोक है। इस दुर्बोधता का कारण पाठ-दोष ही जान पड़ता है। श्लोक-संख्या 29, 40 और 22 को देखते हुए, इसके तीसरे चरण में “प्रतिबुद्ध” की जगह “अप्रतिबुद्ध” पढ़ना ठीक होगा। तब अर्थ यों हो—“और, इस संसार में शिष्यों- सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है और पुत्रों सहित प्रजापति (भूतात्मा, मार) अज्ञानी कहा जाता है।” 62 अश्वघोष
नमस्कारवषट्कारौ प्रोक्षणाभ्युक्षणादयः । अनुपाय इति प्राज्ञैरुपायज्ञ प्रवेदितः ॥१२.३० नमस्कार, वषट्कार (= आहुति), सिञ्चन-आदि को, हे उपायज्ञ, बुद्धिमानों ने अनुपाय (= अनुचित उपाय) बताया है ॥३०॥ सज्जते येन दुर्मेधा मनोवाग्बुद्धिकर्मभिः । विषयेष्वनभिष्वङ्ग सोऽभिष्वङ्ग इति स्मृतः ॥१२.३१ जिससे दुर्बुद्धि पुरुष मन वाणी बुद्धि व कर्म द्वारा विषयों में आसक्त होता है, वह, हे आसक्ति-रहित, सङ्ग (= आसक्ति) स्मरण किया गया है ॥३१॥ ममेदमहमत्येति यद्दुःखमभिमन्यते । विज्ञेयोऽभ्यवपातः स संसारे येन पात्यते ॥१२.३२ “मेरा यह है, मैं इसका हूँ” इस दुःख के अभिमान को अभ्यवपात जानना चाहिए जिसके द्वारा संसार में पतन होता है ॥३२॥ इत्यविद्या हि विद्वांसः पञ्चपर्वां समीहते । तमो मोहं महामोहं तामिस्रद्वयमेव च ॥१२.३३ वह विद्वान् कहता है कि अविद्या पाँच पर्वों (= ग्रन्थियों) की होती है—तम, मोह, महामोह, और तामिस्र ॥३३॥ तत्रालस्यं तमो विद्धि मोहं मृत्युं च जन्म च । महामोहस्त्वसम्मोह काम इत्येव गम्यताम् ॥१२.३४ उनमें आलस्य को तम, जन्म व मृत्यु को मोह जानिये। हे मोह-रहित, काम ही महामोह है, ऐसा समझिये ॥३४॥ यस्मादत्र च भूतानि प्रमुह्यन्ति महान्त्यपि । तस्मादेष महाबाहो महामोह इति स्मृतः ॥१२.३५ जिस कारण इस (काम) में बड़े-बड़े प्राणी भी मूढ़ हो जाते हैं, इस कारण हे महाबाहो, यह महामोह स्मरण किया गया है ॥३५॥ तामिस्रमिति चाक्रोध क्रोधमेवाधिकुर्वते । विषादं चान्धतामिस्रमविषाद प्रचक्षते ॥१२.३६ हे क्रोध-रहित, क्रोध को तामिस्र कहते हैं और हे विषाद-रहित, विषाद को अन्ध-तामिस्र कहते हैं ॥३६॥ अनयाविद्यया बालः संयुक्तः पञ्चपर्वया । संसारे दुःखभूयिष्ठे जन्मस्वभिनिषिच्यते ॥१२.३७ पाँच पर्वोंवाली इस अविद्या से युक्त होकर मूर्ख मनुष्य दुःख-बहुल संसार में बार-बार जन्म लेता है ॥३७॥ द्रष्टा श्रोता च मन्ता च कार्यकारणमेव च । अहमित्येवमागम्य संसारे परिवर्तते ॥१२.३८ “द्रष्टा श्रोता चिन्तक व कार्य का साधक मैं ही हूँ” ऐसा समझकर वह संसार में भटकता है ॥३८॥ इहैभिर्हेतुभिर्धीमन् जन्मःश्रोतः प्रवर्तते । हेत्वभावात्फलाभाव इति विज्ञातुमर्हसि ॥१२.३९ इस संसार में इन कारणों से, हे धीमन्, जन्म को सोता चलता रहता है। कारण नही होने से फल नही हो सकता, ऐसा आपको जानना चाहिए ॥३९॥ तत्र सम्यङ्गतिर्विद्वान्मोक्षकाम चतुष्टयम् । प्रतिबुद्धाप्रबुद्धौ च व्यक्तमव्यक्तमेव च ॥१२.४० इसमें, हे मोक्ष के इच्छुक, सम्यक् बुद्धिवाले को (यह) चार जानना चाहिए-ज्ञानी-अज्ञानी और व्यक्त- अव्यक्त ॥४०॥ यथावदेतद्विज्ञाय क्षेत्रज्ञो हि चतुष्टयम् । आजवंजवतां हित्वा प्राप्नोति पदमक्षरम् ॥१२.४१ इन चारों को ठीक ठीक जानकर क्षेत्रज्ञ जन्म-मरण की वेगवती धारा को छोड़ देता है और अविनाशी पद प्राप्त करता है ॥४१॥ इत्यर्थं ब्राह्मणा लोके परमब्रह्मवादिनः । ब्रह्मचर्यं चरन्तीह ब्राह्मणांन्वासयन्ति च ॥१२.४२ इसके लिए संसार में परमब्रह्म-वादी ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं और ब्राह्मणों को इसकी शिक्षा देते हैं” ॥४२॥ इति वाक्यमिदं श्रुत्वा मुनेस्तस्य नृपात्मजः । अभ्युपायं च पप्रच्छ पदमेव च नैष्ठिकम् ॥१२.४३ उस मुनि की यह बात सुनकर राजा के पुत्र ने उपाय और नैष्ठिक पद के बारे में पूछा:- ॥४३॥ ब्रह्मचर्यमिदं चर्यं यथा यावच्च यत्र च । धर्मस्यास्य च पर्यन्तं भवान्व्याख्यातुमर्हति ॥१२.४४ “इस ब्रह्मचर्य का आचरण जैसे जितना और जहाँ करना चाहिए, और इस धर्म का जो अन्त है उसकी आप व्याख्या कीजिए।” ॥४४॥ इत्यराडो यथाशास्त्रं विस्पष्टार्थं समासतः । तमेवान्येन कल्पेन धर्ममस्मै व्यभाषत ॥१२.४५ अराड ने शास्त्रानुसार उसी धर्म को उसके लिए अन्य तरीके से सङ्क्षेप में स्पष्ट शब्दों में कहा:- ॥४५॥ अयमादौ गृहान्मुक्त्वा भैक्षाकं लिङ्गमाश्रितः । समुदाचारविस्तीर्णं शीलमादाय वर्तते ॥१२.४६ बुद्धचरित 63
“आरम्भ में घर छोड़कर वह भिक्षु-वेश धारण करता है और सदाचार-व्यापी शील ग्रहण करता है ॥46 ॥ सन्तोषं परमास्थाय येन तेन यतस्ततः । विविक्तं सेवते वासं निर्द्वन्द्वः शास्त्रवित्कृती ॥१२.४७ जहाँ-तहाँ से जो कुछ मिल जाता है उसी से परम सन्तोष पाकर वह निर्द्वन्द्व शास्त्रज्ञ व बुद्धिमान् एकान्त निवास का सेवन करता है ॥47 ॥ ततो रागाद्भयं दृष्ट्वा वैराग्याच्च परं शिवम् । निगृह्णन्निन्द्रियग्रामं यतते मनसः श्रमे ॥१२.४८ तब राग से भय की (उत्पत्ति) और वैराग्य से परम कल्याण की (उत्पत्ति) देखकर इन्द्रिय-समूह का निग्रह करता हुआ वह मानसिक शान्ति के लिए यत्न करता है ॥48 ॥ अथो विविक्तं कामेभ्यो व्यापादादिभ्य एव च । विवेकजमवाप्नोति पूर्वध्यानं वितर्कवत् ॥१२.४९ तब वह काम व व्यापद (= पर-द्रोह-चिन्तन, क्रोध) आदि से रहित, विवेक-जन्य और वितर्क-युक्त पूर्व ध्यान प्राप्त करता है ॥49 ॥ तच्च ध्यानसुखं प्राप्य तत्तदेव वितर्कयन् । अपूर्वसुखलाभेन ह्रियते बालिशो जनः ॥१२.५० और उस ध्यान-सुख को पाकर, उसी की चिन्ता करता हुआ, मूर्ख आदमी अपूर्व सुख की प्राप्ति द्वारा अपहृत (पथभ्रष्ट) होता है ॥50 ॥ शमेनैवंविधेनायं कामद्वेषविगर्हिणा । ब्रह्मलोकमवाप्नोति परितोषेण वञ्चितः ॥१२.५१ काम-द्वेष-विरोधिनी ऐसी शान्ति द्वारा वह सन्तुष्ट होकर ब्रह्म-लोक प्राप्त करता है ॥51 ॥⁵¹ ज्ञात्वा विद्वान्वितर्कांस्तु मनःसङ्क्षोभकारकान् । तद्वियुक्तमवाप्नोति ध्यानं प्रीतिसुखान्वितम् ॥१२.५२ किन्तु वितर्क (= विचार) मन को क्षुब्ध करते हैं, ऐसा जानकर विद्वान् उन (वितर्कों) से वियुक्त और प्रीति-सुख से युक्त ध्यान प्राप्त करता है ॥52 ॥ ह्रियमाणस्तया प्रीत्या यो विशेषं न पश्यति । स्थानं भास्वरमाप्नोति देवेष्वाभास्वरेषु सः ॥१२.५३ उस प्रीति द्वारा हरण किया जाता हुआ जो विशेष को नहीं देखता है वह, आभास्वर देवों के बीच भास्वर (= उज्ज्वल) स्थान प्राप्त करता है ॥53 ॥ ⁵¹- = “वञ्चित” के स्थान में “सज्जितः” या “युक्त” बोधक कोई दूसरा शब्द होगा । यस्तु प्रीतिसुखात्तस्माद्विवेचयति मानसम् । तृतीयं लभते ध्यानं सुखं प्रीतिविवर्जितम् ॥१२.५४ जो उस प्रीति-सुख (प्रीति के सुख से) अपने मन को अलग करता है वह, सुखमय, किन्तु प्रीति-रहित तृतीय ध्यान प्राप्त करता है ॥54 ॥ यस्तु तस्मिन्सुखे मग्नो न विशेषाय यत्नवान् । शुभकृत्स्नैः स सामान्यं सुखं प्राप्नोति दैवतैः ॥१२.५५ जो उस सुख में मग्न होकर विशेष के लिए यत्न नही करता हे वह शुभकृत्स्न देवताओं के साथ सामान्य सुख प्राप्त करता है ॥55 ॥ तादृशं सुखमासाद्य यो न रज्यत्युपेक्षकः । चतुर्थं ध्यानमाप्नोति सुखदुःखविवर्जितम् ॥१२.५६ वैसा सुख पाकर जो अनुरक्त नही होता है, उदासीन रहता है, वह सुख-दुःख से रहित चतुर्थ ध्यान प्राप्त करता है ॥56 ॥ तत्र केचिद्व्यवस्यन्ति मोक्ष इत्यभिमानिनः । सुखदुःखपरित्यागादव्यापाराच्च चेतसः ॥१२.५७ उसमें सुख-दुःख का परित्याग होने से और चित्त का व्यापार नही होने से कुछ अभिमानी निश्चय करते हैं कि मोक्ष यही है ॥57 ॥ अस्य ध्यानस्य तु फलं समं देवैर्बृहत्फलैः । कथयन्ति बृहत्कालं बृहत्प्रज्ञापरीक्षकाः ॥१२.५८ ब्रह्म-ज्ञान के परीक्षक कहते हैं कि इस ध्यान का फल बृहत्फल देवों के साथ दीर्घ कालतक रहता है ॥58 ॥ समाधेर्व्युत्थितस्तस्माद्दृष्ट्वा दोषांश्शरीरिणाम् । ज्ञानमारोहति प्राज्ञः शरीरविनिवृत्तये ॥१२.५९ उस समाधि से उठकर, शरीर-धारियों के दोष देखकर बुद्धिमान् पुरुष शरीर-निवृत्ति के लिए ज्ञान (-मार्ग) पर आरूढ़ होता है ॥59 ॥ ततस्तद्ध्यानमुत्सृज्य विशेषे कृतनिश्चयः । कामेभ्य इव स प्राज्ञो रूपादपि विरज्यते ॥१२.६० तब उस ध्यान को छोड़कर, विशेष के लिए निश्चय कर बुद्धिमान् (पुरुष) काम की तरह रूप से भी विरक्त होता है ॥60 ॥ शरीरे खानि यान्यस्मिन्तान्यादौ परिकल्पयन् । घनेष्वपि ततो द्रव्येष्वाकाशमधिमुच्यते ॥१२.६१ 64 अश्वघोष
इस शरीर में जो शून्य स्थान हैं पहले उनकी कल्पना करता है, तब (इसके) ठोस पदार्थों को भी शून्य समझता है ॥61 ॥ आकाशगतमात्मानं सङ्क्षिप्त्य त्वपरो बुधः । तदेवानन्ततः पश्यन्विशेषमधिगच्छति ॥१२.६२ दूसरा बुद्धिमान् पुरुष आकाश में स्थित अपने को (या आकाश में व्याप्त आत्मा को) सङ्क्षिप्त (= सङ्कुचित) कर, उसी को अनन्त की तरह देखता हुआ विशेष को प्राप्त करता है ॥62 ॥ अध्यात्मकुशलस्त्वन्यो निवर्त्यात्मानमात्मना । किञ्चिन्नास्तीति सम्पश्यन्नाकिञ्चन्य इति स्मृतः ॥१२.६३ अध्यात्म-कुशल दूसरा पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा को निवृत्त कर “कुछ भी नही है” ऐसा देखता हुआ आकिञ्चन्य (=अकिञ्चन ?) स्मरण किया गया है ॥63 ॥ ततो मुञ्जादिषीकेव शकुनिः पञ्जरादिव । क्षेत्रज्ञो निःसृतो देहान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥१२.६४ तब मुञ्ज से (निकली) सींक के समान, पिंजड़े से (निकले) पक्षी के समान, देह से निकला हुआ क्षेत्रज्ञ मुक्त कहा जाता है ॥64 ॥ एतत्परमं ब्रह्म निर्लिङ्गं ध्रुवमक्षरम् । यन्मोक्ष इति तत्त्वज्ञाः कथयन्ति मनीषिणः ॥१२.६५ यह परम ब्रह्म है, चिह्न-रहित, ध्रुव और अविनाशी है, जिसे तत्त्वज्ञ मनीषी मोक्ष कहते हैं ॥65 ॥ इत्युपायश्च मोक्षश्च मया सन्दर्शितस्तव । यदि ज्ञातं यदि रुचैर्यथावत्प्रतिपद्यताम् ॥१२.६६ इस तरह मोक्ष और उपाय मैंने आपको बतला दिये हैं; यदि इसे समझा और यदि रुचि हो, तो उचित रीति से इसे प्राप्त कीजिए ॥66 ॥ जैगीषव्योऽथ जनको वृद्धश्चैव पराशरः । इमं पन्थानमासाद्य मुक्ता ह्यन्ये च मोक्षिणः ॥१२.६७ जैगीषव्य, जनक, वृद्ध पराशर और दूसरे मोक्षवाले इस मार्ग से चलकर मुक्त हुए” ॥67 ॥ इति तस्य स तद्वाक्यं गृहीत्वा तु विचार्य च । पूर्वहेतुबलप्राप्तः प्रत्युत्तरमुवाच ह ॥१२.६८ उसका यह वचन सुनकर और विचार करके पूर्व जन्मों के हेतु-बल (=तीन कुशल-मूलों की शक्ति) से युक्त कुमार ने उत्तर दिया:- ॥68 ॥ श्रुतं ज्ञानमिदं सूक्ष्मं परतः परतः शिवम् । क्षेत्रज्ञस्यापरित्यागाद्वैम्येतन्नैष्ठिकम् ॥१२.६९
“यह सूक्ष्म ज्ञान सुना, जो उत्तरोत्तर कल्याण-कारी होता गया है। क्षेत्रज्ञ का परित्याग नही होने से इसे मैं नैष्ठिक नही समझता हूँ ॥69 ॥ विकारप्रकृतिभ्यो हि क्षेत्रज्ञं मुक्तमप्यहम् । मन्ये प्रसवधर्माणं बीजधर्माणमेव च ॥१२.७० विकार और प्रकृति से युक्त होनेपर भी क्षेत्रज्ञ में उत्पत्ति करने का धर्म (=गुण, स्वभाव) और बीज होने का धर्म रहता है, ऐसा मैं मानता हूँ ॥70 ॥ विशुद्धो यद्यपि ह्यात्मा निर्मुक्त इति कल्प्यते । भूयः प्रत्ययसद्भावादमुक्तः स भविष्यति ॥१२.७१ यद्यपि विशुद्ध आत्मा मुक्त समझा जाता है, प्रत्ययों (कारणों) के विद्यमान होने से वह फिर अमुक्त (=बद्ध) हो जायगा ॥71 ॥ ऋतुभूम्यम्बुविरहाद्यथा बीजं न रोहति । रोहति प्रत्ययैस्तैस्तैस्तद्वत्सोऽपि मतो मम ॥१२.७२ जैसे ऋतु भूमि व जल के अभाव से बीज अङ्कुरित नही होता है और उन उन प्रत्ययों के होने से अङ्कुरित होता है, वैसे ही मैं उसे भी मानता हूँ ॥72 ॥ यत्कर्माज्ञानतृष्णानां त्यागान्मोक्षश्च कल्प्यते । अत्यन्तस्तत्परित्यागः सत्यात्मनि न विद्यते ॥१२.७३ यह कि कर्म अज्ञान व तृष्णा के त्याग से मोक्ष पाने की कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर उसका अत्यन्त (=सम्पूर्ण) त्याग नही हो सकता ॥73 ॥ हित्वा हित्वा त्रयमिदं विशेषस्तूपलभ्यते । आत्मनस्तु स्थितियंत्र तत्र सूक्ष्ममिदं त्रयम् ॥१२.७४ इन तीनों को धीरे-धीरे छोड़ने से विशेष की प्राप्ति होती है, किन्तु जहाँ आत्मा की स्थिति है वहाँ ये तीनों सूक्ष्म रूप में रहते ही हैं ॥74 ॥ सूक्ष्मत्वाच्चैव दोषाणामव्यापाराच्च चेतसः । दीर्घत्वायुषश्चैव मोक्षस्तु परिकल्प्यते ॥१२.७५ दोषों के सूक्ष्म होने से, चित्त का व्यापार नही होने से, और (उस अवस्था में) आयु लम्बी होने से मोक्ष की (केवल) कल्पना कर ली जाती है ॥75 ॥ अहङ्कारपरित्यागो यश्चैष परिकल्प्यते । सत्यात्मनि परित्यागो नाहङ्कारस्य विद्यते ॥१२.७६ और अहङ्कार-परित्याग की जो यह कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर अहङ्कार का परित्याग नही हो सकता ॥76 ॥
बुद्धचरित 65
सङ्ख्यादिभिर्मुक्तश्च निर्गुणो न भवत्ययम्। तस्मादसति नैर्गुण्ये नास्य मोक्षोऽभिधीयते ॥१२.७७ और सङ्ख्या आदि से मुक्त नही होनेपर वह (=आत्मा) निर्गुण नही होता है, इसलिए निर्गुण न होनेपर इसे मोक्ष हुआ, ऐसा नहीं कह सकते ॥77॥ गुणिनो हि गुणानां च व्यतिरेको न विद्यते। रूपोष्णाभ्यां विरहितो न ह्यग्निरुपलभ्यते ॥१२.७८ गुणी व गुण जुदा-जुदा नही रह सकते। रूप व गर्मी से रहित अग्नि नही पाई जाती ॥78॥ प्राग्देहान्न भवेद्देही प्राग्गुणेभ्यस्तथा गुणी। तस्मादादौ विमुक्तः सन् शरीरी बध्यते पुनः ॥१२.७९ देह से पूर्व देही नही, उसी तरह गुणों से पूर्व गुणी नही, इसलिए शुरु में मुक्त होनेपर भी शरीरी (=आत्मा) फिर (शरीर में) बद्ध होता है ॥79॥ क्षेत्रज्ञो विशरीरश्च ज्ञो वा स्यादज्ञ एव वा। यदि ज्ञो ज्ञेयमस्यास्ति ज्ञेये सति न मुच्यते ॥१२.८० और शरीर-रहित क्षेत्रज्ञ ज्ञ (=जाननेवाला) या अज्ञ है। यदि ज्ञ है, तो इसके लिए ज्ञेय (जानने को शेष) है और ज्ञेय होनेपर यह मुक्त नहीं हैं ॥80॥ अथाज्ञ इति सिद्धो वः कल्पितेन किमात्मना। विनापि ह्यात्मनाऽज्ञानं प्रसिद्धं काष्ठकुड्यवत् ॥१२.८१ यदि आपके अनुसार अज्ञ साबित होता है, तो आत्मा की कल्पना करने से क्या (प्रयोजन)? आत्मा के बिना भी अज्ञान (का अस्तित्व) काठ व दीवार के समान सिद्ध है ॥81॥ परतः परतस्त्यागो यस्मात्तु गुणवान् स्मृतः। तस्मात्सर्वपरित्यागान्मन्थे कृत्स्नां कृतार्थताम् ॥१२.८२ क्योंकि एक एक करके त्याग करना गुणवान स्मरण किया गया है, इसलिए सर्व-त्याग से पूर्ण कृतार्थता होती है, ऐसा मैं मानता हूँ" ॥82॥ इति धर्ममराडस्य विदित्वा न तुतोष सः। अकृत्स्नमिति विज्ञाय ततः प्रतिजगाम ह ॥१२.८३ अराड का यह धर्म जानकर वह सन्तुष्ट नही हुआ, यह (धर्म) अपूर्ण है ऐसा जानकर वहाँ से चला गया ॥83॥ विशेषमथ शुश्रूषुरुद्रकस्याश्रमं ययौ। आत्मग्राहाच्च तस्यापि जगृहे न स दर्शनम् ॥१२.८४ तब विशेष सुनने की इच्छा से वह उद्रक के आश्रम में गया और आत्मा (के सिद्धान्त) को मानने के कारण उसका भी दर्शन उसने ग्रहण नही किया ॥84॥
सञ्ज्ञासञ्ज्ञित्वयोर्दोषं ज्ञात्वा हि मुनिरुद्रकः। आकिञ्चन्यात्परं लेभेऽसञ्ज्ञासञ्ज्ञात्मिकां गतिम् ॥१२.८५ सञ्ज्ञा (=चेतना) व असञ्ज्ञा (=अचेतना) का दोष जानकर उद्रक मुनि ने अञ्चिनता से परे सञ्ज्ञा असञ्ज्ञा-रहित मार्ग को प्राप्त किया ॥85॥ यस्माच्चालम्बने सूक्ष्मे सञ्ज्ञासञ्ज्ञे ततः परम्। नासञ्ज्ञी नैव सञ्ज्ञीति तस्मात्तत्रगतस्पृहः ॥१२.८६ क्योंकि सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा भी आलम्बन (=मानसिक या शारीरिक कर्म का आधार) है, उस (सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा) से परे न असञ्ज्ञा-युक्त और न सञ्ज्ञा-युक्त अवस्था है, इसलिए वह (उद्रक) उस (अवस्था) का अभिलाषी हुआ ॥86॥ यतश्च बुद्धिस्तत्रैव स्थितान्यत्राप्रचारिणी। सूक्ष्मापादी ततस्तत्र नासञ्ज्ञित्वं न सञ्ज्ञिता ॥१२.८७ और क्योंकि बुद्धि सूक्ष्म व अपटु (=कर्म रहित) होकर वहाँ रहती है, अन्यत्र नही जाती; इसलिए वहाँ न असञ्ज्ञा है, न सञ्ज्ञा ॥87॥ यस्माच्च तदपि प्राप्य पुनरावर्तते जगत्। बोधिसत्त्वः परं प्रेप्सुस्तस्मादुद्रकमत्यजत् ॥१२.८८ और क्योंकि उसे भी प्राप्त कर आदमी फिर संसार में लौट आता है, इसलिए परम पद पाने के इच्छुक बोधिसत्त्व ने उद्रक का त्याग किया ॥88॥ ततो हित्वाश्रमं तस्य श्रेयोऽर्थी कृतनिश्चयः। भेजे गयस्य राजर्षेर्नगरीसञ्ज्ञमाश्रमम् ॥१२.८९ तब श्रेय पाने की इच्छा से निश्चय कर, उसका आश्रम छोड़, उसने राजर्षि गय के नगरी नामक आश्रम का सेवन किया ॥89॥ अथ नैरञ्जनातीरे शुचौ शुचिपराक्रमः। चकार वासमेकान्तविहाराभिरतिर्मुनिः ॥१२.९० तब पवित्र पराक्रमवाले, एकान्त-विहार में आनन्द पानेवाले उस मुनि ने नैरञ्जना नदी के पवित्र तीर पर निवास किया ॥90॥ (आगतान् तत्र) तत्पूर्वं पञ्चेन्द्रियवशोड्ढतान्। तपः (-प्रवृत्तान्) व्रतिनो भिक्षून् पञ्च निरैक्षत ॥१२.९१ अपने से पहले ही वहाँ आये हुए पाँच भिक्षुओं को देखा; वे तपस्वी और व्रती थे, पाँच इन्द्रियों को वश करने के अभिमानी थे ॥91॥ ते चोपतस्थुर्दृष्ट्वात्र भिक्षवस्तं मुमुक्षवः। पुण्यार्जितधनारोग्यमिन्द्रियार्था इवेश्वरम् ॥१२.९२
66 अश्वघोष
उसे वहाँ देखकर मोक्ष चाहनेवाले भिक्षु उसकी सेवा में उपस्थित हुए, जैसे इन्द्रिय-विषय उस ऐश्वर्यशाली की सेवा में उपस्थित होते हैं जिसने अपने पुण्यों से धन व आरोग्य अर्जित किये हों ॥92 ॥ सम्पूज्यमानस्तैः प्रह्वैर्विनयादनुवर्तिभिः । तद्वशस्थायिभिः शिष्यैर्लोलैर्मन इवेन्द्रियैः ॥१२.९३ अपने वश में रहनेवाले उन शिष्यों द्वारा, जो विनयी होने के कारण नम्र व आज्ञा-कारी थे, वह वैसे ही पूजित हुआ, जैसे चपल इन्द्रियों से चित्त पूजित (= सेवित) होता है ॥93 ॥ मृत्युजन्मान्तकरणे स्यादुपायोऽयमित्यथ । दुष्कराणि समारेभे तपांस्यनशनेन सः ॥१२.९४ तब उसने उपवास-द्वारा दुष्कर तप शुरू किये, यह सोचते हुए कि मृत्यु व जन्म का अन्त करने में यह उपाय होगा ॥94 ॥ उपवासविधीन्नैकान् कुर्वन्नरदुराचरान् । वर्षाणि षट् शमप्रेप्सुरकरोत्कार्श्यमात्मनः ॥१२.९५ भाँति-भाँति के उपवास, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हैं; छः वर्षों तक करते हुए, शम प्राप्त करने की इच्छा से उसने अपने को कृश बनाया ॥95 ॥ अन्नकालेषु चैकैः स कोलतिलतण्डुलैः । अपारपारसंसारपारं प्रेप्सुरपारयत् ॥१२.९६ अपार-पार संसार का पार पाने की इच्छा से भोजन के समय एक एक बेर तिल व चावल से उसने पारण किया ॥96 ॥ देहादपचयस्तेन तपसा तस्य यः कृतः । स एवोपचयो भूयस्तेजसास्य कृतोऽभवत् ॥१२.९७ उस तप द्वारा उसके शरीर से जितना ही क्षय हुआ, फिर तेज द्वारा उसकी उतनी ही वृद्धि हुई ॥97 ॥ कृशोऽप्यकृशकीर्तिश्रीर्ह्लादं चक्रेऽन्यचक्षुषाम् । कुमुदानामिब शरच्छुक्लपक्षादिचन्द्रमाः ॥१२.९८ (शरीर से) क्षीण होनेपर भी उसकी श्री और कीर्ति क्षीण नहीं हुई और दूसरों की आँखों को उसने वैसे ही आनन्दित किया, जैसे शरद ऋतु के शुक्ल-पक्ष के आरम्भी का चन्द्रमा कुमुदों को आनन्दित करता है ॥98 ॥ त्वगस्थिशेषो निःशेषैर्मेदःपिशितशोणितैः । क्षीणोऽप्यक्षीणगाम्भीर्यः समुद्र इव स व्यभात् ॥१२.९९ उसकी त्वचा व हड्डियाँ शेष रह गईं, मेद-मांस व शोणित निःशेष हो गये; इस तरह क्षीण होनेपर भी वह अक्षीण-गाम्भीर्य (= जिसकी गम्भीरता क्षीण नहीं हुई) समुद्र के समान शोभित हुआ ॥99 ॥
अथ कष्टतपःस्पष्टव्यर्थक्लिष्टतनुर्मुनिः । भवभीरुरिमां चक्रे बुद्धिं बुद्धत्वकाङ्क्षया ॥१२.१०० तब कठोर-तप द्वारा, स्पष्ट ही, शरीर को व्यर्थ क्लेश देकर, जन्म से डरनेवाले मुनि ने बुद्धत्व (पाने) की आकाङ्क्षा से यह विचार किया:— ॥100 ॥ नायं धर्मो विरागाय न बोधाय न मुक्तये । जम्बूमूले मया प्राप्तो यस्तदा स विधिर्ध्रुवः ॥१२.१०१ “इस धर्म से न विराग होगा, न बोध, न मुक्ति। उस समय जम्बू-वृक्ष के मूल में मैंने जो विधि प्राप्त की थी वही ध्रुव है ॥101 ॥ न चासौ दुर्बलेनाप्तुं शक्यमित्यागतादरः । शरीरबलवृद्ध्यर्थमिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् ॥१२.१०२ दुर्बल उसे प्राप्त नहीं कर सकता”, (शरीर के प्रति) ऐसा आदर होनेपर शरीर-बल की वृद्धि के लिए उसने फिर यह सोचा:— ॥102 ॥ क्षुत्पिपासाश्रमक्लान्तः श्रमादस्वस्थमानसः । प्राप्नुयान्मनसावाप्यं फलं कथमनिर्वृतः ॥ १२.१०३ “जो भूख प्यास व थकावट से ग्रस्त है, थकावट से अस्वस्थचित्त है अ-सुखी है, वह मन से प्राप्त होनेवाला फल कैसे पायेगा? ॥103 ॥ निर्वृतिः प्राप्यते सम्यक् सततेन्द्रियतर्पणात् । सन्तर्पितेन्द्रियतया मनःस्वास्थ्यमवाप्यते ॥१२.१०४ इन्द्रियों को निरन्तर तृप्त करने से सुख ठीक-ठीक प्राप्त होता है; इन्द्रियों को अच्छी तरह से तृप्त करने से मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है ॥104 ॥ स्वस्थप्रसन्नमनसः समाधिरुपपद्यते । समाधियुक्तचित्तस्य ध्यानयोगः प्रवर्तते ॥१२.१०५ जिसका मन स्वस्थ व प्रसन्न है उसे समाधि सिद्ध होती है, जिसका चित्त समाधि से युक्त है उसे ध्यान-योग होता है ॥105 ॥ ध्यानप्रवर्तनाद्धर्माः प्राप्यन्ते यैरवाप्यते । दुर्लभं शान्तमजरं परं तदमृतं पदम् ॥१२.१०६ ध्यान होने से धर्म प्राप्त होते हैं, जिनसे वह परम पद प्राप्त होता है जो दुर्लभ, शान्त, अजर और अमर है ॥106 ॥ तस्मादाहारमूलोऽयमुपाय इतिनिश्चयः । आहारकरणे धीरः कृत्वामितमतिर्मतिम् ॥१२.१०७
बुद्धचरित 67
इसलिए, यह उपाय आहार-मूलक है", ऐसा निश्चय कर अपरिमित बुद्धिवाले उस धीर ने भोजन करने का विचार किया ॥107 ॥ स्नातो नैरञ्जनातीरादुत्ततार शनैः कृशः । भक्त्यावनतशाखाग्रैर्दत्तहस्तस्तटद्रुमैः ॥१२.१०८ स्नान कर, वह कृश-तनु-नैरञ्जना नदी के तीर से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा; उस समय शाखाओं के अग्रभागों को भक्तिपूर्वक झुकाकर तटवर्ती वृक्षों ने हाथ (= सहारा) दिया ॥108 ॥ अथ गोपाधिपसुता दैवतैरभिचोदिता । उद्भूतहृदयानन्दा तत्र नन्दबलागमत् ॥१२.१०९ तब देवताओं से प्रेरित होकर गोप-राज की पुत्री नन्दबला आनन्दित हृदय से वहाँ गई ॥109 ॥ सितशङ्खोज्ज्वलभुजा नीलकम्बलवासिनी । सफेनमालानीलाम्बुर्यमुनेव सरिद्वरा ॥१२.११० उसकी भुजाएँ श्वेत शङ्खों से उज्जवल थीं, वह नीला वस्त्र पहने हुई थी, जैसे फेन-मालाओं से युक्त नील जलवाली सरिता-श्रेष्ठ यमुना (उपस्थित हुई) हो ॥110 ॥ सा श्रद्धावर्धितप्रीतिर्विकसल्लोचनोत्पला । शिरसा प्रणिपत्यैनं ग्राहयामास पायसम् ॥१२.१११ श्रद्धा से उसकी प्रीति बढ़ी, नेत्ररूप उत्पल विकसित हुए। शिर से प्रणाम कर उस (मुनि) के द्वारा उसने पायस ग्रहण कराया ॥111 ॥ कृत्वा तदुपभोगेन प्राप्तजन्मफलां स ताम् । बोधिप्राप्तौ समर्थोऽभूत्सन्तर्पितषडिन्द्रियः ॥१२.११२ उस (पायस) का उपभोग कर उसने उस (कन्या) का जन्म सफल किया और छः इन्द्रियों को अच्छी तरह तृप्त कर बोधि-प्राप्ति में समर्थ हुआ ॥112 ॥ पर्याप्ताप्यायनामूर्तिश्च सार्धं स्वयशसा मुनिः । कान्तिधैर्ये बभारैकः शशाङ्कार्णवयोर्द्वयोः ॥१२.११३ अपने यश के साथ वह मुनि शरीर से पर्याप्त वृद्धि को प्राप्त हुआ। उस एक ने ही चन्द्रमा और सागर दोनों की (क्रमशः) कान्ति व धैर्य धारण किये ॥113 ॥ आवृत्त इति विज्ञाय तं जहुः पञ्च भिक्षवः । मनीषिणमिवात्मानं निर्मुक्तं पञ्च धातवः ॥१२.११४ वह (धर्म से) निवृत्त हो गया, ऐसा जानकर पाँचों भिक्षुओं ने उसे छोड़ दिया, जैसे मुक्त हुए मनीषी आत्मा को पाँचों धातु छोड़ देते हैं ॥114 ॥ व्यवसायद्वितीयोऽथ शाद्वलास्तीर्णभूतलम् । सोऽश्वत्थमूलं प्रययौ बोधाय कृतनिश्चयः ॥१२.११५ तब बुद्धत्व के लिए निश्चय कर, (अपने एकमात्र साथी) निश्चय के साथ वह पीपल वृक्ष के नीचे गया, जहाँ की भूमि हरे तृणों से ढकी थी ॥115 ॥ ततस्तदानीं गजराजविक्रमः पदस्स्वनेनानुपमेन बोधितः । महामुनेरागतबोधिनिश्चयो जगाद कालो भुजगोत्तमः स्तुतिम् ॥१२.११६ तब उस समय काल नामक उत्तम सर्प, जो गजराज के समान पराक्रमी था, अनुपम पद-ध्वनि द्वारा जगाया गया; बोधि (-प्राप्ति) के लिए निश्चय किया है, ऐसा जानकर उनसे महामुनि की स्तुति कीः- ॥116 ॥ यथा मुने त्वच्चरणावपीडिता मुहुर्मुहुर्निष्टनतीव मेदिनी । यथा च ते राजति सूर्यवत्प्रभा ध्रुवं त्वमिष्टं फलमद्य भोक्ष्यसे ॥१२.११७ “हे मुनि, आपके चरणों से पीड़ित होकर जिस प्रकार पृथ्वी मानो बार-बार गरज रही है और जिस प्रकार आपकी प्रभा सूर्य के समान चमक रही है, अवश्य ही आज आप इच्छित फल भोगेंगे ॥117 ॥ यथा भ्रमन्त्यो दिवि चाषपङ्क्तयः प्रदक्षिणं त्वां कमलाक्ष कुर्वते । यथा च सौम्या दिवि वान्ति वायवस्त्वमद्य बुद्धो नियतं भविष्यसि ॥१२.११८ हे कमल-लोचन, जिस प्रकार आकाश में मँडराते हुए चाष (= नीलकण्ठ) पक्षियों के झुण्ड आपकी प्रदक्षिणा कर रहे हैं और जिस प्रकार आकाश में सुन्दर हवा बह रही है, अवश्य ही आज आप बुद्ध होंगे" ॥118 ॥ ततो भुजङ्गप्रवरेण संस्तुतस्तृणान्युपादाय शुचीनि लावकात् । कृतप्रतिज्ञो निषसाद बोधये महारोर्मूलमुपाश्रितः शुचेः ॥१२.११९ तब सर्प-श्रेष्ठ द्वारा स्तुति की जानेपर, उसने (तृण) काटनेवाले से पवित्र तृण ले लिया और बोधि (-प्राप्ति) के लिए प्रतिज्ञा कर, पवित्र महारु के नीचे आश्रय लेकर बैठ गया ॥119 ॥ ततः स पर्यङ्कमकम्प्यमुत्तमं बबन्ध सुप्तोरगभोगपिण्डितम् । भिनद्मि तावद्भुवि नैतदासनं न यामि तावत्कृतकृत्यतामिति ॥१२.१२० तब उसने उत्तम अविचल पर्यङ्क आसन बाँधा, जो सोये हुए साँप के शरीर के समान पुञ्जीभूत था। (और कहा)- "तबतक पृथिवी पर इस आसन को नही तोडूंगा, जबतक कि सफलता नही प्राप्त करूँगा" ॥120 ॥ ततो ययुर्मुदमतुलां दिवौकसो ववाशिरे न मृगगणा न पक्षिणः । न सस्वनुर्वन्तरवोऽनिलाहताः कृतासने भगवति निश्चितात्मनि ॥१२.१२१ जब दृढ़ निश्चय करके भगवान् ने आसन ग्रहण किया, तब देवों ने अतुल आनन्द पाया, पशु-पक्षी बोले नहीं, और हवा से आहत होनेपर भी जङ्गल के पेड़ों से शब्द नहीं हुआ ॥121 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृतेऽराडदर्शनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२ ॥ 68 अश्वघोष
त्रयोदश सर्ग मार की पराजय तस्मिन्विमोक्षाय कृतप्रतिज्ञे राजर्षिवंशप्रभवे महर्षौ । तत्रोपविष्टे प्रजहर्ष लोकस्तत्रास सद्धर्मरिपुस्तु मारः ॥१३.१ मोक्ष के लिए प्रतिज्ञा कर राजर्षि-वंश में उत्पन्न वह महर्षि वहाँ बैठ गया, तब संसार को हर्ष हुआ, किन्तु सद्धर्म-शत्रु मार को भय हुआ ॥1॥ यं कामदेवं प्रवदन्ति लोके चित्रायुधं पुष्पशरं तथैव । कामप्रचाराधिपतिं तमेव मोक्षद्विषं मारमुदाहरन्ति ॥१३.२ संसार में जिसे कामदेव, चित्रायुध तथा पुष्पशर कहते हैं उसी मोक्ष-शत्रु को जो काम-संचार का अधिपति है, मार कहते हैं ॥2॥ तस्यात्मजा विभ्रमहर्षदर्पास्तिस्रोऽरतिप्रीतिवृषश्च कन्याः । पप्रच्छुरेनं मनसो विकारं स तांश्च ताश्चैव वचोऽभ्युवाच ॥१३.३ विभ्रम, हर्ष व दर्प नामक उसके पुत्रों ने तथा अरति, प्रीति व तृष्णा (=प्यास) उसकी तीन कन्याओं ने उससे मानसिक विकार (का कारण) पूछा। उसने उन पुत्रों व कन्याओं से यह वचन कहा:- ॥3॥ असौ मुनिर्निश्चयवर्म बिभ्रत्सत्त्वायुधं बुद्धिशरं विकृष्य । जिगीषुरास्ते विषयान्मदीयान्तस्मादयं मे मनसो विषादः ॥१३.४ “निश्चयरूप कवच धारण कर, बुद्धिरूप तीरवाला सत्त्वरूप अस्त्र (=धनुष) खींचकर, वह मुनि मेरा राज्य जीतना चाहता है; इसलिए मेरा यह मेरा मानसिक विषाद है ॥4॥ यदि ह्यसौ मामभिभूय याति लोकाय चाख्यात्यपवर्गमार्गम् । शून्यस्ततोऽयं विषयो ममाद्य वृत्ताच्च्युतस्येव विदेहभर्तुः ॥१३.५ यदि वह मुझे जीत जाता है और जगत् को अपवर्ग का मार्ग बताता है, तो मेरा वह राज्य आज उसी प्रकार सूना हो जायगा जिस प्रकार सदाचार से च्युत होनेपर विदेह-राज (=कराल जनक या निमि विदेह) का राज्य (सूना हो गया था) ॥5॥ तद्यावदेवैष न लब्धचक्षुर्मद्गोचरे तिष्ठति यावदेव । यास्यामि तावद्द्रतमस्य भेत्तुं सेतुं नदीवेग इवातिवृद्धः ॥१३.६ इसलिए जबतक यह ज्ञान-चक्षु नहीं प्राप्त करता है; जबतक मेरे ही क्षेत्र में रहता है, तबतक इसका व्रत भङ्ग करने के लिए जाऊँगा जैसे नदी का अत्यन्त बढ़ा हुआ वेग पुल को तोड़ता है।" ॥6॥ ततो धनुः पुष्पमयं गृहीत्वा शरान् जगन्मोहकरांश्च पञ्च । सोऽश्वत्थमूलं समुतोऽभ्यगच्छदस्वास्थ्यकारी मनसः प्रजानाम् ॥१३.७
तब फूलों का धनुष तथा जगत् को मूढ़ करनेवाले पाँच तीर लेकर, प्रजाओं के मन को अस्वस्थ करनेवाला वह मार अपनी सन्तानों के साथ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे गया ॥7॥ अथ प्रशान्तं मुनिमासनस्थं पारं तितीर्षुं भवसागरस्य । विष्यज्य सव्यं करमायुधाग्रे क्रीडन् शरेणेदमुवाच मारः ॥१३.८ तब अस्त्र के अग्रभाग पर बाँया हाथ रखकर, तीर से खेलते हुए मार ने आसन पर स्थित प्रशान्त मुनि से, जो भव-सागर के पार तक तैरने को इच्छुक था, यह कहा:- ॥8॥ उत्तिष्ठ भोः क्षत्रिय मृत्युभीत चर स्वधर्मं त्यज मोक्षधर्मम् । बाणैश्च यज्ञैश्च विनीय लोकं लोकात्पदं प्राप्नुहि वासवस्य ॥१३.९ “ऐ मौत से डरनेवाले क्षत्रिय, उठो, स्वधर्म का आचरण करो, मोक्ष-धर्म का त्याग करो। बाणों व यज्ञों से संसार को जीतो और संसार से इन्द्र का पद प्राप्त करो ॥9॥ पन्था हि निर्यातुमयं यशस्यो यो वाहितः पूर्वतमैर्नरेन्द्रैः । जातस्य राजर्षिकुले विशाले भैक्षाकमश्लाघ्यमिदं प्रपत्तुम् ॥१३.१० (संसार से) निकलने का मार्ग यही है, यश देनेवाला मार्ग है, जिसपर पूर्व के राजा लोग चले थे। जो विशाल राजर्षि-कुल में उत्पन्न हुआ है, उसके लिए इस भिक्षा-वृत्ति का अवलम्बन करना श्लाघ्य नहीं ॥10॥ अथाद्य नोत्तिष्ठसि निश्चितात्मन् भव स्थिरो मा विमुचः प्रतिज्ञाम् । मयोद्यतो ह्येष शरः स एव यः शूर्पके मीनरिपौ विमुक्तः ॥१३.११ या यदि, हे स्थिरात्मन्, आज नहीं उठते हो, तो स्थिर हो जाओ, प्रतिज्ञा मत छोड़ो। मैंने यह वही तीर उठाया है, जो मछलियों के शत्रु (=मछुए) शूर्पक पर छोड़ा गया था ॥11 ॥⁵² स्पृष्टः स चानेन कथञ्चिदैडः सोमस्य नप्ताप्यभवद्विचित्तः । स चाभवच्छान्तनुरस्वतन्त्रः क्षीणे युगे किं बत दुर्बलोऽन्यः ॥१३.१२ इसके स्पर्श मात्र से चन्द्रमा के नाती ऐड़का भी चित्त विचलित हो गया और वह शान्तनु अपने वश में नहीं रहा, फिर (इस) क्षीण युग में दूसरे दुर्बल का क्या कहना? ॥12॥ तत्क्षिप्रमुत्तिष्ठ लभस्व सञ्ज्ञां बाणो ह्ययं तिष्ठति लेलिहानः । प्रियाविधेयेषु रतिप्रियेषु च चक्रवाकेष्विव नोत्सृजामि ॥१३.१३ इसलिए शीघ्र उठो, होश संभालो; क्योंकि बार-बार विनाश करनेवाला यह बाण तैयार है। इसे मैं उनपर नही छोड़ता जो चक्रवाकों के समान अपनी प्रियाओं के अनुकूल हैं और रति-प्रिय हैं।" ॥13॥ इत्येवमुक्तोऽपि यदा निरास्थो नैवासनं शाक्यमुनिर्विभेद । शरं ततोऽस्मै विससर्ज मारः कन्याश्च कृत्वा पुरतः सुतांश्च ॥१३.१४
⁵² - शूर्पक के लिए देखिए—सौ० आठ 44, और दस 53। बुद्धचरित 69
इस प्रकार कहे जानेपर भी जब शाक्य-मुनि ने न ध्यान दिया और न आसन तोड़ा, तब अपनी कन्याओं और पुत्रों को आगे कर मार ने उसके ऊपर तीर छोड़ा ॥14 ॥ तस्मिंस्तु बाणेऽपि स विप्रमुक्ते चकार नास्थां न धृतेश्चचाल । दृष्ट्वा तथैनं विषसाद मारश्चिन्तापरीतश्च शनैर्जगाद ॥१३.१५ किन्तु उस बाण के छोड़े जानेपर भी उसने न ध्यान दिया और न वह धैर्य से ही विचलित हुआ। उस प्रकार उसे देखकर, मार को विषाद हुआ और चिन्तित होकर उसने धीरे-धीरे कहा:- ॥15 ॥ शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव । न चिन्तयत्येष तमेव बाणं किं स्यादचित्तो न शरः स एषः ॥१३.१६ “जिससे विद्ध होकर महादेव भी शैलेन्द्र-पुत्री (पार्वती) के प्रति चलायमान हुआ, उसी बाण की यह चिन्ता नहीं कर रहा है। क्या इसे चित्त ही नहीं है या यह वह तीर ही नहीं है? ॥16 ॥ तस्मादयं नार्हति पुष्पबाणं न हर्षणं नापि रतेर्नियोगम् । अर्हत्ययं भूतगणैरसौम्यैः सन्त्रासनातर्जनताडनानि ॥१३.१७ इसलिए यह (मुनि) पुष्प-बाण, प्रसन्न करने, या रति-प्रयोग के योग्य नहीं। यह असौम्य भूतों द्वारा डराये, धमकाये और पीटे जाने योग्य है" ॥17 ॥ सस्मार मारश्च ततः स्वसैन्यं विघ्नं शमे शाक्यमुनेश्चिकीर्षन् । नानाश्रयाश्चानुचराः परीयुः शलद्रुमप्रासगदासिशस्ताः ॥१३.१८ तब शाक्य-मुनि की शान्ति में विघ्न करने की इच्छा से मार ने अपनी सेना का स्मरण किया और विविध रूपों में अनुचरगण उसके चारों ओर आ गये; उनके हाथों में त्रिशूल, वृक्ष, भाले, गदाएँ और तलवारें थीं ॥18 ॥ वराहमीनाश्वरखरोष्ट्रवक्त्रा व्याघ्रर्क्षसिंहद्विरदाननाश्च । एकेक्षणा नैकमुखास्त्रिशीर्षा लम्बोदराश्चैव पृषोदराश्च ॥१३.१९ सूअर, मछली, घोड़े, गधे, ऊँट, बाघ, रीच्छ, सिंह और हाथी के-से उनके मुख थे। वे एक आँखवाले थे, उनके अनेक मुख थे, तीन तीन शिर थे, उदर लम्बे थे, पेटों पर धब्बे थे ॥19 ॥ अजानुसक्था घटजानवश्च दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च । करङ्कवक्त्रा बहुमूर्त्तयश्च भग्नार्धवक्त्राश्च महामुखाश्च ॥१३.२० उनके घुटने व जाँघें नहीं थीं, या घड़ों के समान घुटने थे, दाँत ही उनके अस्त्र थे, नख ही हथियार थे, मस्तक-खप्पर ही मुँह थे, अनेक शरीर थे मुखों के आधे भाग भग्न थे, या बड़े-बड़े मुख थे ॥20 ॥ भस्मारुणा लोहितबिन्दुचित्राः खट्वाङ्गहस्ता हरिधूम्रकेशाः । लम्बस्रजो वारणलम्बकर्णाश्चर्माम्बराश्चैव निरम्बराश्च ॥१३.२१ वे भस्म से रङ्गे थे, लाल बिन्दुओं से रङ्ग-बिरङ्गे थे, उनके हाथों में खट्वाङ्ग (=खाट के अङ्ग या नर-पञ्जर) थे, केश वानर के समान धूम्रवर्ण थे, लम्बी (मुण्ड-) मालाएँ थीं, हाथी के समान लम्बे कान थे, वे चमड़े के कपड़े पहने हुए थे या वस्त्र-हीन थे ॥21 ॥ श्वेता र्धवक्त्रा हरितार्धकायास्ताम्राश्च धूस्रा हरयोऽसिताश्च । व्यालोत्तरासङ्गभुजास्तथैव प्रघुष्टघण्टाकुलमेखलाश्च ॥१३.२२ उनके आधे मुँह सफेद थे, आधे शरीर हरे थे, वे ताम्र-वर्ण व धूम्र-वर्ण थे, पीले व काले थे, उनकी भुँजाएँ साँपों से ढकी थीं, बजती घण्टियों से उनके कटि-सूत्र आकुल थे ॥22 ॥ तालप्रमाणाश्च गृहीतशूला दंष्ट्राकरालाश्च शिशुप्रमाणाः । उरभ्रवक्त्राश्च विहङ्गमाक्षा मार्जारवक्त्राश्च मनुष्यकायाः ॥१३.२३ वे तालवृक्ष के समान लम्बे थे और शूल पकड़े हुए थे, बच्चों के आकार के थे और दाढ़ों से भयानक लगते थे। भेड़ों के-से उनके मुँह थे और चिड़ियों की-सी आँखें थीं, बिलाड़ों के-से मुँह थे और मनुष्य के-से शरीर थे ॥23 ॥ प्रकीर्णकेशाः शिखिनोऽर्धमुण्डा रक्ताम्बरा व्याकुलवेष्टनाश्च । प्रहृष्टवक्त्रा भ्रुकुटीमुखाश्च तेजोहराश्चैव मनोहराश्च ॥१३.२४ उनके बाल बिखरे हुए थे, वे शिखा-धारी थे, अधमुण्डे थे, लाल वस्त्र पहने थे, उनकी पगड़ियाँ उलट- पुलटी थीं। उनके मुख उत्साहित थे, मुखों पर भृकुटी थी, वे तेज हरण करनेवाले थे और मन हरण करनेवाले थे ॥24 ॥ केचिद्व्रजन्तो भृशमाववल्गुरन्योऽन्यमापुप्लुविरे तथान्ये । चिक्रीडुराकाशगताश्च केचित्केचिच्च चेरुस्तरुमस्तकेषु ॥१३.२५ कोई-कोई जाते हुए जोरों से कूदते थे और दूसरे एक-दूसरे पर उछलते थे। कोई आकाश में जाकर खेलते थे और कोई वृक्ष-शिखरों पर चलते थे ॥25 ॥ ननर्त कश्चिद्भ्रमयंस्त्रिशूलं कश्चिद्वपुस्फूर्ज गदां विकर्षन् । हर्षेण कश्चिद्वृषवच्चनर्द कश्चित्प्रजज्वाल तनूरुहेभ्यः ॥१३.२६ कोई त्रिशूल घुमाता नाचता था, कोई गदा खींचता हुआ गरजता था। कोई हर्ष से साँड के समान गरजा और किसी के रोम से ज्वाला निकली ॥26 ॥ एवंविधा भूतगणाः समन्तात्तद्बोधिमूलं परिवार्य तस्थुः । जिघृक्षवश्चैव जिघांसवश्च भर्तुर्नियोगं परिपालयन्तः ॥१३.२७ इस प्रकार के भूत उस बोधि-वृक्ष के मूल को चारों से घेरकर खड़े हो गये। वे पकड़ना चाहते थे और हत्या करना चाहते थे, स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे ॥27 ॥ तं प्रेक्ष्य मारस्य च पूर्वरात्रे शाक्यर्षभस्यैव च युद्धकालम् । न द्यौश्चकाशे पृथिवी चकम्पे प्रजज्वलुश्चैव दिशः सशब्दाः ॥१३.२८ 70 अश्वघोष
३. सप्तम-नवम सर्ग: तपोवन-प्रवेश, बिम्बिसार-अभ्युद्गमन एवं काम-विगर्हण
रात्रि के आरम्भ में मार व शाक्य-ऋषभ का युद्ध-काल देखकर, आकाश चमका नही, पृथ्वी काँपी, एवं शब्द करती हुई दिशाएँ प्रज्वलित हुई ॥२८ ॥ विष्वग्ववौ वायुरुदीर्णवेगस्तारा न रेजुर्न बभौ शशाङ्कः । तमश्च भूयो विततान रात्रिः सर्वे च सञ्चुक्षुभिरे समुद्राः ॥१३.२९ खुले वेग से हवा चारों ओर बही, न तारे शोभित हुए और न चन्द्रमा। रात्रि ने और भी अन्धकार फैलाया और सब समुद्रों में क्षोभ हुआ ॥२९ ॥ महीभृतो धर्मपराश्च नागा महामुनेर्विघ्नममृष्यमाणाः । मारं प्रति क्रोधविवृत्तनेत्रा निःशश्वसुश्चैव जजृम्भिरे च ॥१३.३० और पृथ्वी को धारण करनेवाले धर्मपरायण नागों ने महामुनि का विघ्न नहीं सहा; मार के प्रति क्रोध से आँखें घुमाकर उन्होंने फुंकार किया और जँभाई ली ॥३० ॥ शुद्धाधिवासा विबुधर्षयस्तु सद्धर्मसिद्धयर्थमभिप्रवृत्ताः । मारेऽनुकम्पां मनसा प्रचक्रुर्वैराग्यभावात्तु न रोषमीयुः ॥१३.३१ किन्तु शुद्धाधिवास देवों ने, जो सद्धर्म की सिद्धि में लगे हुए थे, मार के ऊपर मन में अनुकम्पा की, राग- रहित होने के कारण उन्होंने क्रोध नही किया ॥३१ ॥ तद्बोधिमूलं समवेक्ष्य कीर्णं हिंसात्मना मारबलेन तेन । धर्मात्मभिर्लोकविमोक्षकामैर्बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षे ॥१३.३२ उस हिंसात्मक मार बल से उस बोधि-वृक्ष के मूल को भरा हुआ देखकर संसार का मोक्ष चाहनेवाले धर्मात्माओं ने अन्तरिक्ष में हाहाकार किया ॥३२ ॥ उपप्लुतं धर्मविधेस्तु तस्य दृष्ट्वा स्थितं मारबलं महर्षिः । न चुक्षुभे नापि ययौ विकारं मध्ये गवां सिंह इवोपविष्टः ॥१३.३३ वहाँ पर स्थित मार-बल उस धर्म-विधि में बाधक है, यह देखकर गौओं के बीच बैठे हुए सिंह के समान, महर्षि को न क्षोभ हुआ, न विकार (= भय) ॥३३ ॥ मारस्ततो भूतचमूसुदीर्णामाज्ञापयामास भयात तस्य । स्वैः स्वैः प्रभावैश्च सास्य सेना तद्धैर्यभेदाय मतिं चकार ॥१३.३४ तब खुली हुई भूत-सेना को मार ने उसे डराने की आज्ञा दी और उसकी उस सेना ने अपने अपने प्रभावों से उसका धैर्य भङ्ग करने का निश्चय किया ॥३४ ॥ केचिच्चलन्नैकविलम्बिजिह्वास्तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रा हरिमण्डलाक्षाः । विदारितास्याः स्थिरशङ्कुकर्णाः सन्त्रासयन्तः किल नाम तस्थुः ॥१३.३५ कुछ (भूत) उसे डराने की कोशिश करते हुए खड़े रहे; उनकी लटकती हुई अनेक जीभें हिल रही थीं, दाँतों के अग्रभाग तेज थे, आँखें सूर्य-मण्डल के समान थीं, मुँह खुले हुए थे और कान बर्छी के समान कठोर थे ॥३५ ॥ तेभ्यः स्थितेभ्यः स तथाविधेभ्यः रूपेण भावेन च दारुणेभ्यः । न विव्यथे नोद्विविजे महर्षिः क्रीडत्सुबालेष्व इवोद्धतेभ्यः ॥१३.३६ खड़े हुए वैसे उन (भूतों) से, जो रूप व भाव से दारुण थे, महर्षि को न व्यथा हुई न भय, जैसे खेल में उत्तेजित बालकों से (न व्यथा होती है, न भय) ॥३६ ॥ कश्चित्ततो रोषविवृत्तदृष्टिस्तस्मै गदामुद्यमयाञ्चकार । तस्तम्भ बाहुः सगदस्ततोऽस्य पुरन्दरस्येव पुरा सवज्रः ॥१३.३७ तब किसी ने रोष से आँखें घुमाकर उसके ऊपर गदा उठाई; किन्तु गदा-सहित उसकी बाहु वैसे ही स्तम्भित हो गई, जैसे प्राचीन समय में इन्द्र की वज्र-युक्त बाहु ॥३७ ॥ केचित्समुद्यम्य शिलास्तरुंश्च विषेहिरे नैव मुनौ विमोक्तुम् । पेतुः सवृक्षाः सशिलास्तथैव वज्रावभग्ना इव विन्ध्यपादाः ॥१३.३८ कतिपयों ने शिलाएँ व वृक्ष उठाये, किन्तु मुनि पर छोड़ न सके। वृक्षों व शिलाओं के साथ वे वैसे ही गिरे जैसे वज्र से भग्न हुए विन्ध्याचल के पाद ॥३८ ॥ कैश्चित्समुत्पत्य नभो विमुक्ताः शिलाश्च वृक्षाश्च परश्वधाश्च । तस्थुर्नभस्येव न चावपेतुः सन्ध्याभ्रपादा इव नैकवर्णाः ॥१३.३९ कतिपयों ने आकाश में उड़कर जो शिलाएँ, वृक्ष व कुठार छोड़े, वे गिरे नहीं, आकाश में ही रहे, जैसे संध्याकालीन बादलों के रङ्ग-बिरङ्गे टुकड़े हों ॥३९ ॥ चिक्षेप तस्योपरि दीप्तमन्यः कडङ्गरं पर्वतशृङ्गमात्रम् । यन्मुक्तमात्रं गगनस्थमेव तस्यानुभावाच्छतधा पफाल ॥१३.४० दूसरे ने उसके ऊपर पहाड़ की चोटी के बराबर जलता कुंदा फेंका; जैसे ही यह फेंका गया कि उस (मुनि) के प्रभाव से आकाश में ही इसके सौ टुकड़े हो गये ॥४० ॥ कश्चिज्ज्वलन्नर्क इवोदितः खादङ्गारवर्षं महदुत्ससर्ज । चूर्णानि चामीकरकन्दराणां कल्पात्यये मेरुरिव प्रदीप्तः ॥१३.४१ उदय होते सूर्य के समान जलते हुए किसी ने आकाश से अङ्गारों की झड़ी लगा दी, जैसे कल्प के अन्त में जलता हुआ मेरु पर्वत सुवर्ण-कन्दराओं के चूर्ण बरसा रहा हो ॥४१ ॥ तद्बोधिमूले प्रविकीर्यमाणमङ्गारवर्षं तु सविस्फुलिङ्गम् । मैत्रीविहारादृषिसत्तमस्य बभूव रक्तोत्पलपत्रवर्षः ॥१३.४२ उस बोधि-वृक्ष के मूल में स्फुलिङ्गों के साथ जो अङ्गार-वृष्टि की जा रही थी, वह ऋषि श्रेष्ठ के मैत्री में विहार करने के कारण (= सबके प्रति मैत्री-भाव रखने के कारण) लाल कमलों के पत्तों की वृष्टि (में परिणत) हो गई ॥४२ ॥ शरीरचित्तव्यसनातपैस्तैरेवंविधैस्तैश्च निपत्यमानैः । नैवासनाच्छाक्यमुनिश्चचाल स्वनिश्श्रयं बन्धुमिवोपगृह्य ॥१३.४३ बुद्धचरित 71
यद्यपि शरीर व मन के लिए ऐसी विपत्तियाँ व पीड़ाएँ दी जा रही थीं, तो भी अपने निश्चय का बन्धु के समान आलिङ्गन कर शाक्यमुनि आसन से विचलित नहीं हुआ ॥४३ ॥ अथापरे निर्जिगिलुर्मुखेभ्यः सर्पान्विजीर्णेभ्य इव द्रुमेभ्यः । ते मन्त्रबद्धा इव तत्समीपे न श्वश्रसुर्नोत्ससृपुर्न चेलुः ॥१३.४४ तब दूसरों ने अपने मुखों से, जैसे जीर्ण वृक्षों से, साँप उगले। वे (सर्प) मानो मन्त्र-बद्ध होकर उसके समीप न फुफकारे, न ऊपर उठे और न चले ॥४४ ॥ भूत्वापरे वारिधरा बृहन्तः सविद्युतः साशनिचण्डघोषाः । तस्मिन्द्रुमे तत्ससृजुरश्मवर्षं तत्पुष्पवर्षं रुचिरं बभूव ॥१३.४५ वज्र के प्रचण्ड घोष तथा बिजली से युक्त विशाल बादल बनकर दूसरों ने उस वृक्ष पर अश्म-वृष्टि की, जो रुचिर पुष्प-वृष्टि (में परिणत) हो गई ॥४५ ॥ चापेऽथ बाणो निहितोऽपरेण जज्वल तत्रैव न निष्पपात । अनीश्वरस्यात्मनि धूयमानो दुर्मर्षणस्येव नरस्य मन्युः ॥१३.४६ दूसरे ने धनुष पर बाण रखा, जो वहीं प्रज्वलित हुआ, छूटा नहीं, जैसे ऐश्वर्य-रहित क्रोधी मनुष्य का क्रोध अपने में ही बीजित होता है, वहीं धधकता है, निकलता नहीं ॥४६ ॥ पञ्चेषवोऽन्येन तु विप्रमुक्तास्तस्थुर्नभस्येव मुनौ न पेतुः । संसारभीरोर्विषयप्रवृत्तौ पञ्चेन्द्रियाणीव परीक्षकस्य ॥१३.४७ दूसरे के द्वारा छोड़े गये पाँच बाण आकाश में ही रहे, मुनि पर गिरे नहीं, जैसे विषय उपस्थित होनेपर संसार (= जन्म-चक्र) से डरनेवाले पारखी की पाँचों इन्द्रियाँ स्थिर रहती हैं, पतित नहीं होती हैं ॥४७ ॥ जिघांसयान्यः प्रससार रुष्टो गदां गृहीत्वाभिमुखो महर्षेः । सोऽप्राप्तकामो विवशः पपात दोषेष्विवानर्थकरेषु लोकः ॥१३.४८ दूसरा हत्या करने की इच्छा से रुष्ट हो गदा लेकर महर्षि के सामने दौड़ पड़ा; वह विफल-मनोरथ विवश होकर गिर पड़ा, जैसे (विफल मनोरथ) जगत् (विवश होकर) अनर्थकारी दोषों में गिरता है ॥४८ ॥ स्त्री मेघकाली तु कपालहस्ता कर्तुं महर्षेः किल चित्तमोहम् । बभ्राम तत्रानियतं न तस्थौ चलात्मनो बुद्धिरिवागमेषु ॥१३.४९ मेघ के समान काली स्त्री हाथ में कपाल लेकर महर्षि का चित्त-मोह करने के लिए वहाँ अनियन्त्रित होकर घूमी, खड़ी नहीं रही, जैसे चञ्चल मनवाले की बुद्धि (विविध) शास्त्रों में अनिश्चित होकर भटकती है, स्थिर नहीं होती है ॥४९ ॥ कश्चित्प्रदीप्तं प्रणिधाय चक्षुर्नेत्राग्निनाशीविषवद्दिधक्षुः । तत्रैव नासीनमृषिं ददर्श कामात्मकः श्रेय इवोपदिष्टम् ॥१३.५० किसी ने जलती आँखें (उसकी ओर) स्थिर करके आँखों की अग्नि से साँप के समान उसे जलाना चाहा; किन्तु वहीं पर बैठे हुए ऋषि को देखा नहीं, जैसे कामात्मा पुरुष बताये हुए कल्याण को नहीं देखता है ॥५० ॥ गुर्वी शिलामुद्यमयंस्तथान्यः शश्राम मोघं विहतप्रयत्नः । निःश्रेयसं ज्ञानसमाधिगम्यं कायक्लमैरधर्ममिवाप्सुकामः ॥१३.५१ भारी शिला को उठाये हुए दूसरे ने व्यर्थ श्रम किया, उसका प्रयत्न नष्ट हुआ, जैसे ज्ञान व समाधि से प्राप्य धर्म को शारीरिक क्लेशों से पाने की इच्छा करनेवाला व्यर्थ श्रम करता है, उसका प्रयत्न नष्ट होता है ॥५१ ॥ तरक्षुसिंहाकृतयस्तथान्ये प्रणेदुरुच्चैर्महतः प्रणादान् । सत्त्वानि यैः सङ्कुचुः समन्ताद्बभ्राहाता द्यौः फलतीति मत्वा ॥१३.५२ तेंदुए और सिंह की आकृतिवाले दूसरों ने जोरों से महा-गर्जन किये, जिनसे जीव (डर के मारे) चारों-ओर सिकुड़ गये, यह समझकर कि वज्र से आहत होकर आकाश फट रहा है ॥५२ ॥ मृगा गजाश्चार्त्तरवान् सृजन्तो विदुद्रुवुश्चैव निलिल्यिरे च । रात्रौ च तस्यामहनीव दिग्भ्यः खगा रुवन्तः परिपेतुरात्ताः ॥१३.५३ मृग और हाथी आर्त-नाद करते हुए दौड़कर छिप गये और पक्षीगण आर्त होकर उस रात को दिन की तरह बोलते हुए चारों ओर घूमे ॥५३ ॥ तेषां प्रणादैस्तु तथाविधैस्तैः सर्वेषु भूतेष्वपि कम्पितेषु । मुनिर्न तत्रास न सङ्कोच रवैर्गरुत्मनिव वायसानाम् ॥१३.५४ किन्तु उनके वैसे उन शब्दों से सब जीवों के काँपने पर भी मुनि न डरा, न सिकुड़ा, जैसे कौओं के शब्दों से गरुड़ न डरता है, न सिकुड़ता है ॥५४ ॥ भयावहेभ्यः परिषद्गणेभ्यो यथा यथा नैव मुनिर्बिभाय । तथा तथा धर्मभृतां सपत्नः शोकाच्च रोषाच्च ससाद मारः ॥१३.५५ भय-प्रद परिषद्-गणों से जैसे-जैसे मुनि नहीं डरा, वैसे-वैसे धर्म-पालकों के शत्रु मार को शोक और रोष से ग्लानि हुई ॥५५ ॥ भूतं ततः किञ्चिददृश्यरूपं विशिष्टभूतं गगनस्थमेव । दृष्ट्वैष द्रुग्धमवैररुष्टं मारं बभाषे महता स्वरेण ॥१३.५६ तब अदृश्यरूप किसी विशिष्ट जीव ने आकाश से ही ऋषि के प्रति द्रोही व बिना वैर के ही रुष्ट हुए मार को देखकर गम्भीर स्वर में कहा - ॥५६ ॥ मोघं श्रमं नार्हसि मार कर्तुं हिंस्रात्मतामुत्सृज गच्छ शर्म । नैष त्वया कम्पयितुं हि शक्यो महागिरिर्मेरुरिवानिलेन ॥१३.५७ 72 अश्वघोष
“हे मार तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं करना चाहिए, हिंसा-भाव छोड़ो और शान्त हो जाओ; क्योंकि तुम इसे कँपा नहीं सकते, जैसे हवा से महापर्वत मेरु नहीं कँपाया जा सकता ॥57॥ अप्युष्णभावं ज्वलनः प्रजह्यादपो द्रवत्वं पृथिवी स्थिरत्वम् । अनेककल्पाचितपुण्यकर्मा न त्वेव जह्याद्व्यवसायमेषः ॥१३.५८ अग्नि उष्णता छोड़ दे, पानी द्रवत्व छोड़ दे, पृथिवी स्थिरता छोड़ दे; किन्तु यह, जिसने अनेक कल्पों में पुण्य एकत्र किये हैं, अपना निश्चय न छोड़ेगा ॥58॥ यो निश्चयो ह्यस्य पराक्रमश्च तेजश्च यच्चा च दया प्रजासु । अप्राप्य नोत्थास्यति तत्त्वमेष तमांस्यहत्वेव सहस्ररश्मिः ॥१३.५९ क्योंकि इसका जो निश्चय है, जो पराक्रम है, जो तेज है और जीवों के प्रति जो दया है, (उससे तो यही जान पड़ता है कि) तत्त्व को प्राप्त किये यह नहीं उठेगा जैसे अन्धकार को नष्ट किये बिना सूर्य नहीं उगता है ॥59॥ काष्ठं हि मथ्नन् लभते हुताशं भूमिं खन्विन्दति चापि तोयम् । निर्बन्धिनः किञ्चन नास्त्यसाध्यं न्यायेन युक्तं च कृतं च सर्वम् ॥१३.६० काठ को रगड़नेवाल (आदमी) अग्नि प्राप्त करता है और पृथिवी को खोदनेवाला जल प्राप्त करता है। हठी (=आग्रही) के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। उचित तरीके के साथ करने पर सब कुछ किया जा सकता है ॥60॥ तल्लोकमार्तं करुणायमानो रोगेषु रागादिषु वर्तमानम् । महाभिषङ् नार्हति विघ्नमेष ज्ञानौषधार्थं परिखिद्यमानः ॥१३.६१ राग आदि रोगों में पड़े हुए आर्त जगत के ऊपर करुणा करनेवाला महावैद्य ज्ञानरूप औषध के लिए कष्ट उठा रहा है, इसलिए यह विघ्न के योग्य नहीं है ॥61॥ हृते च लोके बहुभिः कुमार्गैः सन्मार्गमन्विच्छति यः श्रमेण । स दैशिकः क्षोभयितुं न युक्तं सुदेशिकः सार्थ इव प्रनष्टे ॥१३.६२ अनेक कुमार्गों द्वारा संसार का अपहरण होनेपर जो श्रमपूर्वक सन्मार्ग को खोज रहा है उस उपदेशक (=पथ-प्रदर्शक) को क्षुब्ध करना ठीक नहीं ॥62॥ सत्त्वेषु नष्टेषु महान्धकारे ज्ञानप्रदीपः क्रियमाण एषः । आर्यस्य निर्वापयितुं न साधु प्रज्वाल्यमानस्तमसीव दीपः ॥१३.६३ महा-अन्धकार में जीवों के भटकने पर यह ज्ञान-प्रदीप हो रहा है; अँधेरे में जलाये जाते दीप के समान उसे निर्वापित करना (=शान्त करना, मार डालना, बुझाना) आर्य के लिए ठीक नहीं ॥63॥ दृष्ट्वा च संसारमये महौघे मग्नं जगत्पारमविन्दमानम् । यश्चेदमृत्तारयितुं प्रवृत्तः कश्चिन्तयेत्तस्य तु पापमार्यः ॥१३.६४ जन्म-चक्ररूपी महाबाढ़ में डूबा हुआ जगत् पार नहीं पा रहा है, यह देखकर इसे उबारने में जो लगा हुआ है उसके प्रति पाप-कर्म की चिन्ता कौन आर्य पुरुष करेगा? ॥64॥ क्षमाशिखो धैर्यविगाढमूलश्चारित्रपुष्पः स्मृतिबुद्धिशाखः । ज्ञानद्रुमो धर्मफलप्रदाता नोत्पाटनं ह्यर्हति वर्धमानः ॥१३.६५ यह बढ़ता हुआ ज्ञान-वृक्ष–क्षमा ही जिसकी जटा है, धैर्य ही जिसका गहरा मूल है, चरित्र ही जिसके फूल हैं, स्मृति व बुद्धि ही जिसकी शाखाएँ हैं और जो धर्मरूपी फल देता है–काटा जाने योग्य नहीं ॥65॥ बद्धां दृढैश्चेतसि मोहपाशैर्यस्य प्रजां मोक्षयितुं मनीषा । तस्मिन् जिघांसा तव नोपपन्ना श्रान्ते जगद्बन्धनमोक्षहेतोः ॥१३.६६ मन में मोह के दृढ़ बन्धनों के बँधे हुए जीवों को यह मुक्त करना चाहता है; जगत् का बन्धन खोलने के लिए श्रम करनेवाले उस मुनि को मार डालने की तुम्हारी इच्छा उचित नहीं ॥66॥ बोधाय कर्माणि हि यान्यनेन कृतानि तेषां नियतोऽद्य कालः । स्थाने तथास्मिन्नुपविष्ट एष यथैव पूर्वे मुनयस्तथैव ॥१३.६७ इसने बुद्धत्व के लिए जो कर्म किये, उनके पकने का आज नियत समय है। इस स्थान पर यह उसी प्रकार बैठा हुआ है, जिस प्रकार पूर्व के मुनि बैठे थे ॥67॥ एषा हि नाभिर्वसुधातलस्य कृत्स्नेन युक्ता परमेण धाम्ना । भूमेरतोऽन्योऽस्ति हि न प्रदेशो वेशं समाधेर्विषहेत योऽस्य ॥१३.६८ यह भूतल की नाभि है, जो समस्त उत्तम प्रभाव से युक्त है; क्योंकि इस भूमि के अतिरिक्त दूसरा स्थान नहीं, जो इसकी समाधि का वेग सह सके ॥68॥ तन्मा कृथाः शोकमुपेहि शान्तिं मा भून्महिम्ना तव मार मानः । विश्रम्भितुं न क्षममध्रुवा श्रीश्चले पदे किं मदमभ्युपैषि ॥१३.६९ इसलिए शोक मत करो, शान्त हो जाओ; हे मार, अपनी महिमा का अभिमान मत करो। चपल श्री पर विश्वास करना उचित नहीं; अपनी स्थिति अस्थिर होनेपर क्यों मद कर रहे हो?” ॥69॥⁵³ ततः स संश्रुत्य च तस्य तद्वचो महामुनेः प्रेक्ष्य च निष्प्रकम्पताम् । जगाम मारो विमना हतोद्यमः शरैरजस्रैश्चेतसि यैर्विहन्यते ॥१३.७० तब उसकी यह बात सुनकर और महामुनि की स्थिरता देखकर विफल-प्रयत्न मार, उदास होकर अपने उन तीरों के साथ, जिनसे लोगों का चित्त घायल किया जाता है, चला गया ॥70॥ गतप्रहर्षा विफलीकृतश्रमा प्रविद्धपाषाणकडङ्गरद्रुमा । दिशः प्रदुद्राव ततोऽस्य सा चमूर्हताश्रयेव द्विषता द्विषच्चमूः ॥१३.७१ 53. “विस्मय” के स्थान में “किं मद” रक्खा गया है। बुद्धचरित 73
वाम पृष्ठ (Left Column)
तब उसकी वह सेना, जिसका आनन्द दूर हो गया था, जिसका श्रम विफल कर दिया गया था, जिसके पत्थर कुन्दे और वृक्ष बिखरे पड़े थे, चारों-ओर वैसे भी भाग गई जैसे शत्रु-द्वारा नायक के मारे जानेपर विपक्षी सेना (भाग जाती है) ॥71 ॥ द्रवति सपरिपक्षे निर्जिते पुष्पकेतौ जयति जिततमस्के नीरजस्के महर्षौ । युवतिरिव सहासा द्यौश्चकाशे सचन्द्रा सुरभि च जलगर्भं पुष्पवर्षं पपात ॥१३.७२ जब अपने पक्ष के साथ पराजित होकर, मार भाग गया और जब (अज्ञानरूपी) अन्धकार को जीतनेवाला निर्मल (= राग-रहित) महर्षि विजयी हुआ, तब चन्द्रयुक्त आकाश हँसती युवती के समान शोभित हुआ और सुगन्धित जल-पूर्ण पुष्प-वृष्टि हुई ॥72 ॥ तथापि पापीयसि निर्जिते गते दिशः प्रसेदुः प्रबभौ निशाकरः । दिवो निपेतुर्भुवि पुष्पवृष्टयो रराज योषेव विकल्मषा निशा ॥१३.७३ उस प्रकार वह पापी जब हारकर चला गया, तब दिशाएँ प्रसन्न हुईं, चन्द्रमा शोभित हुआ, आकाश से पृथ्वी पर पुष्प-वृष्टि हुई और निष्पाप स्त्री के समान निर्मल रात्रि की शोभा हुई ॥73 ॥$^{54}$ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते मारविजयो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥१३ ॥
चतुर्दश सर्ग
बुद्धत्व-प्राप्ति
ततो मारबलं जित्वा धैर्येण च शमेन च । परमार्थं विजिज्ञासुः स दध्यौ ध्यानकोविदः ॥१४.१ तब धैर्य और शान्ति से मार की सेना को जीतकर परमार्थ जानने की इच्छा से उस ध्यान-पटु ने ध्यान किया ॥1 ॥ सर्वेषु ध्यानविधिषु प्राप्य चैश्वर्यमुत्तमम् । सस्मार प्रथमे यामे पूर्वजन्मपरम्पराम् ॥१४.२ और ध्यान-विधियों पर उत्तम स्वामित्व (= अधिकार) प्राप्त कर प्रथम पहर में पूर्व-जन्मों की परम्परा का स्मरण किया ॥2 ॥ अमुत्राहमयं नाम च्युतस्तस्मादिहागतः । इति जन्मसहस्राणि सस्माराऽनुभवन्निव ॥१४.३ “वहाँ मैं वह था, वहा से गिरकर यहाँ आया” इस तरह हजारों जन्मों को मानो अनुभव करते हुए स्मरण किया ॥3 ॥
$^{54}$ - यह श्लोक चीनी अनुवाद में नही है। कुछ लोग इसे प्रक्षिप्त बताते हैं। कीथ ने “संस्कृत साहित्य के इतिहास” में “अश्वघोष की शैली व भाषा” के अन्तर्गत इसे उद्धृत किया है।
74 अश्वघोष
दक्षिण पृष्ठ (Right Column)
स्मृत्वा जन्म च मृत्युं च तासु तासूत्पत्तिषु । ततः सत्त्वेषु कारुण्यं चकार करुणात्मकः ॥१४.४ तब उन जन्मों में उत्पत्ति व मौत का स्मरण कर करुणात्मक ने जीवों पर करुणा की ॥4 ॥ कृत्वेह स्वजनोत्सर्गं पुनरन्यत्र च क्रियाः । अत्राणः खलु लोकोऽयं परिभ्रमति चक्रवत् ॥१४.५ वहाँ स्वजनों को छोड़, अन्यत्र (जन्म लेकर) कर्म करता है; इस तरह अवश्य ही यह संसार रक्षा-रहित है और पहिए के समान घूमता रहता है ॥5 ॥ इत्येवं स्मरतस्तस्य बभूव नियतात्मनः । कदलीगर्भनिःसारः संसार इति निश्चयः ॥१४.६ इस प्रकार स्मरण करते उस निश्चितात्मा को यह निश्चय हुआ–“कदली गर्भ (= केले के पेड़ के भीतरी भाग) के समान संसार असार है” ॥6 ॥ द्वितीये त्वागते यामे सोऽद्वितीयपराक्रमः । दिव्यं लेभे परं चक्षुः सर्वचक्षुष्मतां वरः ॥१४.७ दूसरा पहर आनेपर अद्वितीय पराक्रमवाले ने, जो सब दृष्टिवालों में श्रेष्ठ था, परम दिव्य चक्षु पाया ॥7 ॥ ततस्तेन स दिव्येन परिशुद्धेन चक्षुषा । ददर्श निखिलं लोकमादर्श इव निर्मले ॥१४.८ तब उस अत्यन्त शुद्ध दिव्य चक्षु से उसने समस्त जगत् को इस तरह देखा, जैसे निर्मल दर्पण में देख रहा हो ॥8 ॥ सत्त्वानां पश्यतस्तस्य निकृष्टोत्कृष्टकर्मणाम् । प्रच्युतिं चोपपत्तिं च ववृधे करुणात्मता ॥१४.९ निकृष्ट व उत्कृष्ट कर्मवाले जीवों का पतन व जन्म देखते हुए उसकी करुणा बढ़ी ॥9 ॥ इमे दुष्कृतकर्माणः प्राणिनो यान्ति दुर्गतिम् । इमेऽन्ये शुभकर्माणः प्रतिष्ठन्ते त्रिविष्टपे ॥१४.१० ये पाप-कर्मवाले प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते है, ये दूसरे शुभ-कर्मवाले स्वर्ग में स्थान पाते हैं ॥10 ॥ उपपन्नाः प्रतिभये नरके भृशदारुणे । अमी दुःखैर्बहुविधैः पीड्यन्ते कृपणं बत ॥१४.११ अत्यन्त दारुण व भयावह नरक में उत्पन्न होकर ये (पापी) अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित होते हैं ॥11 ॥ पाय्यन्ते कथितं केचिदग्निवर्णमयोरसम् । आरोप्यन्ते रुवन्तोऽन्ये निष्टप्तस्तम्भमायसम् ॥१४.१२
कुछ लोगों को पिघले हुए लोहे का पानी, जो आग के रङ्ग का होता है, पिलाया जाता है; चिल्लाते हुए दूसरों को लोहे के तपे खम्भे पर चढ़ाया जाता है ॥12॥ पच्यन्ते पिष्टवत्केचिदयस्कुम्भीष्ववाङ्मुखाः । दह्यन्ते करुणं केचिद्दीप्तेष्वङ्गारराशिषु ॥१४.१३ कोई-कोई लोहे के कड़ाहों में औंधे-मुख, पुए के समान, पकाये जाते हैं; कोई-कोई जलते अङ्गारों के ढेर पर कष्टपूर्वक जलाये जाते हैं ॥13॥ केचित्तीक्ष्णैरयोदंष्ट्रैर्भक्ष्यन्ते दारुणैः श्वभिः । केचिद्गृध्रैरयस्तुण्डैर्वायसैरायसैरि्व ॥१४.१४ कोई-कोई लोहे के दाँतवाले तीक्ष्ण व दारुण कुत्तों द्वारा भक्षित होते हैं; कोई-कोई लोहे की ढीठ चोंचों (=चञ्चुओं) द्वारा, मानो लोहे के चने कौओं द्वारा खाये जाते हैं ॥14॥ केचिद्दाहपरिश्रान्ताः शीतच्छायाभिकाङ्क्षिणः । असिपत्त्रवनं नीलं बद्धा इव विशन्त्यमी ॥१४.१५ कोई-कोई दाह से थककर शीतल छाया की आकाङ्क्षा करते हैं; वे नीले असि पत्र-वन में (=तलवारों के वन में) बन्दी के समान प्रवेश करते हैं ॥15॥ पाट्यन्ते दारुवत्केचित्कुठारैर्बद्धबाहवः । दुःखेदपि न विपद्यन्ते कर्मभिर्धारितासवः ॥१४.१६ कुछ, जिनकी भुजाएँ बँधी रहती हैं, कुठारों द्वारा लकड़ी के समान काटे जाते हैं। दुःख में भी उनका अन्त नहीं होता है; कर्मों से उनके प्राण धारण किये जाते हैं ॥16॥ सुखं स्यादिति यत्कर्म कृतं दुःखनिवृत्तये । फलं तस्येदमवशैर्दुःखमेवोपभुज्यते ॥१४.१७ “सुख होगा” इस आशा से दुःख-निवृत्ति के लिए उन्होंने जो कर्म किया था उसका यह दुःखमय फल ही वे बेचारे भोगते हैं ॥17॥ सुखार्थमशुभं कृत्वा य एते भृशदुःखिताः । आस्वादः स किमेतेषां करोति सुखमन्वपि ॥१४.१८ सुख पाने के लिए अशुभ (कर्म) करके जो ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं, क्या (अशुभ का) यह आस्वाद थोड़ा-सा भी सुख इन्हें देता है? ॥18॥ हसद्भिर्यत्कृतं कर्म कलुषं कलुषात्मभिः । एतत्परिणते काले क्रोशद्भिरनुभूयते ॥१४.१९ पापात्मा हँसते हुए जो पाप-कर्म करते हैं, समय पकने पर (उसका) यह (फल) वे रोते हुए अनुभव करते हैं ॥19॥ यद्येव पापकर्माणः पश्येयुः कर्मणां फलम् । वमेयुरुष्णं रुधिरं मर्मस्वभिहता इव ॥१४.२० यदि पाप-कर्म करनेवाले पाप-कर्मों का ऐसा फल देखें, तो मर्मस्थल में घायल हुए के समान उष्ण रुधिर वमन करें ॥20॥ इमेऽन्ये कर्मभिश्चित्रैश्चित्तविस्पन्दसम्भवैः । तिर्यग्योनौ विचित्रायामुपपन्नास्तपस्विनः ॥१४.२१ ये दूसरे बेचारे चित्त की चञ्चलता से होनेवाले विविध कर्मों के कारण पशु-पक्षियों की विविध योनि में उत्पन्न होते हैं, ॥21॥ मांसत्वग्बालदन्तार्थं वैरादपि मदादपि । हन्यन्ते कृपणं यत्र बन्धूनां पश्यतामपि ॥१४.२२ जहाँ मांस त्वचा बाल व दाँत के लिए, या वैर व मद से भी, और बन्धुओं के देखते रहने पर भी, वे दीनतापूर्वक मार जाते हैं ॥22॥ अशक्नुवन्तोऽप्यवशाः क्षुतर्षश्रमपीडिताः । गोऽश्वभूताश्च वाह्यन्ते प्रतोदक्षतमूर्तयः ॥१४.२३ और बैल-घोड़े होनेपर, भूख प्यास व थकावट की पीड़ा से विवश व अशक्त होनेपर भी, वे अङ्कुशों से क्षत- शरीर (घायल) होते हुए हाँके जाते हैं ॥23॥ वाह्यन्ते गजभूताश्च बलीयांसोऽपि दुर्बलैः । अङ्कुशक्लिष्टमूर्धानस्ताडिताः पादपार्ष्णिभिः ॥१४.२४ और हाथी होकर, बलवान् होनेपर भी, दुर्बलों द्वारा अङ्कुशों से मस्तकों पर क्लेश पाते हुए तथा पाँवों व एड़ियों से ताड़ित होते हुए हाँके जाते हैं ॥24॥ सत्स्वप्यन्येषु दुःखेषु दुःखं यत्र विशेषतः । परस्परविरोधाच्च पराधीनतयैव च ॥१४.२५ अन्य दुःखों के रहने पर भी वहाँ (पशु पक्षियों की योनि में) परस्पर-विरोध और पराधीनता के कारण विशेष दुःख है ॥25॥ खस्थाः खस्थैर्हि बाध्यन्ते जलस्था जलचारिभिः । स्थलस्थाः स्थलसंस्थैश्च प्राप्य चैवेतरेतरैः ॥१४.२६ आकाश-वासी आकाश-वासियों द्वारा, जल-चारी जल-चारियों द्वारा, स्थल-वासी स्थल-वासियों द्वारा परस्पर पीड़ित होते हैं ॥26॥ उपपन्नास्तथा चेमे मात्सर्याक्रान्तचेतसः । पितृलोके निरालोके कृपणं भुञ्जते फलम् ॥१४.२७
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उसी प्रकार ये, जिनके चित्त परस्पर द्वेष से आक्रान्त रहते हैं आलोक-रहित प्रेत-लोक में उत्पन्न होकर दीनतापूर्वक कर्म-फल भोगते हैं ॥27 ॥ सूचीछिद्रोपममुखाः पर्वतोपमकुक्षयः । क्षुत्तर्षजनितैर्दुःखैः पीड्यन्ते दुःखभागिनः ॥१४.२८ सूई के छेद के समान मुखवाले और पर्वत के समान पेटवाले ये दुःख-भागी भूख-प्यास से उत्पन्न दुःखों से पीड़ित होते हैं ॥28 ॥ आशया समतिक्रान्ता धार्यमाणाः स्वकर्मभिः । लभन्ते न ह्यमी भोक्तुं प्रविद्धान्यशुचीन्यपि ॥१४.२९ आशा द्वारा अतिक्रमण किये जानेपर (अर्थात् निराश होनेपर) भी वे अपने कर्मों द्वारा धारण किये जाते हैं; फेंकी गई अपवित्र वस्तु भी खाने को वे नहीं पाते ॥29 ॥ पुरुषो यदि जानीत मात्सर्यस्येदृशं फलम् । सर्वथा शिबिवद्दद्याच्छरीरावयवानपि ॥१४.३० पुरुष यदि द्वेष का ऐसा फल जानता, तो सब प्रकार से शिवि के सामने अपने शरीर के अवयव भी दान कर देता ॥30 ॥ इमेऽन्ये नरकप्रख्ये गर्भसञ्ज्ञेऽशुचिह्रदे । उपपन्ना मनुष्येषु दुःखमर्च्छन्ति जन्तवः ॥१४.३१ ये दूसरे जन्तु नरकतुल्य गर्भ-नामक अपवित्र सरोवर में उत्पन्न होकर मनुष्यों के बीच दुःख पाते हैं ॥31 ॥
▪ शुरु में जन्म-घड़ी में ही तीक्ष्ण हाथों से पकड़े जाते हुए, मानो तेज तलवारों से काटे जाते हुए, वे खूब रोते हैं ॥32 ॥⁵⁵ ▪ स्वजन उन्हें प्यार करते हैं, उनका पालन-पोषण व रक्षा करते हैं, अत्यन्त सावधानी से संवर्धन करते हैं, और पीछे दुःख से महादुःख में जाते हुए वे अपने ही विविध कर्मों से कलुषित ही होते हैं ॥33 ॥ ▪ और इस अवस्था में तृष्णा से आक्रान्त मूर्ख “यह करना है और वह करना है” इस तरह अधिकाधिक चिन्ता करते हुए, निरन्तर बहती धारा में बहते रहते हैं ॥34 ॥ ▪ ये दूसरे, जिन्होंने पुण्य संचय किये हैं, स्वर्ग में जन्म लेते हैं और काम की ज्वालाओं से इस तरह जलते हैं जैसे आग में जल रहे हों ॥35 ॥ ▪ और विषयों में अतृप्त ही वे वहाँ से गिरते हैं, उनकी आँखें ऊपर लगी रहती हैं, वे निस्तेज रहते हैं और अपनी मालाओं के मुरझाने से दुःखी होते हैं ॥36 ॥ ▪ जब अप्सराओं के प्रेमी असहाय होकर गिरते हैं, तब वे करुणापूर्वक उन्हें देखती हैं और अपने हाथों से उनके वस्त्र पकड़ती हैं ॥37 ॥ ▪ विमानों से दीनतापूर्वक गिरते हुए प्रेमियों को पकड़ने की कोशिश करते समय, कुछ अप्सराएँ ऐसे देख पड़ती हैं जैसे झूलती हुई मोती की लड़ियों के साथ वे पृथ्वी पर गिर रही हों ॥38 ॥ ▪ दूसरी भाँति भाँति की मालाएँ व गहने पहनकर, अपने प्रेमियों के दुःख में पड़ने से शोकित होकर, सहानुभूतिपूर्वक चञ्चल आँखों से उनका अनुसरण करती हैं। ॥39 ॥ ▪ उन गिरनेवालों के प्रति प्रेम होने से अप्सराएँ हाथों से छाती पीटती हैं और मानो महा-पीड़ा से पीड़ित होकर उनमें आसक्त रहती हैं ॥40 ॥ ▪ स्वर्ग में रहनेवाले “हा, चैत्ररथ वन! हा दिव्य सरोवर! हा मन्दाकिनी! हा प्रेयसी!” इस तरह विलाप करते हुए आर्त होकर पृथ्वी पर गिरते हैं ॥41 ॥⁵⁶ ▪ यह देखते हुए कि उतने परिश्रम से प्राप्त होनेवाला स्वर्ग अनिश्चित व क्षणिक है और इससे वियोग होनेपर ऐसा दुःख होता है, ॥42 ॥ ▪ जगत् में यह नियम विशेष रूप से ध्रुव है; जगत् का यह स्वभाव है और तो भी लोग इसे ऐसा नहीं देखते ॥43 ॥ ▪ दूसरे, जिन्होंने काम (-वासना) से अपने को अलग रखा है, अपने मन में निश्चय करते हैं कि उनका निवास शाश्वत है; तो भी वे स्वर्ग से दीनतापूर्वक गिरते हैं ॥44 ॥ ▪ नरकों में अत्यन्त कष्ट है, पशुओं के बीच परस्पर भक्षण होता है, प्रेतों के बीच भूख-प्यास का दुःख है, मनुष्यों के बीच तृष्णाओं का दुःख है ॥45 ॥ ▪ प्रेम-मुक्त स्वर्गों में पुनर्जन्म का दुःख बहुत है। निरन्तर भ्रमणशील जीवलोक के लिए निश्चय ही कहीं भी शान्ति नहीं ॥46 ॥ ▪ संसार-चक्र की यह धारा निराधार है और मरणशील है। इस तरह चारों ओर से घिरे हुए जीव कहीं विश्राम-भूमि नहीं पाते हैं ॥47 ॥ ▪ इस तरह दिव्य दृष्टि से उसने पाँच जीव-लोकों का निरीक्षण किया और जीवन में कुछ भी सारवान् नही पाया, जैसे काटे जानेपर केले के पेड़ में कुछ सार नही मिलता है ॥48 ॥ ▪ रात्रि का तीसरा पहर समीप आने पर, उस उत्तम ध्यान-ज्ञ ने जगत् के सच्चे स्वभाव के बारे मे ध्यान कियाः- ॥49 ॥
⁵⁵- अध्याय 14 श्लोक 31 के बाद के पूरे अध्याय तिब्बती पाठ से जौन्स्टन ने English में अनुवाद किये जिनका हिन्दी अनुवाद सूर्यनारायण चौधरीजी द्वारा किया गया। ⁵⁶_ हा चैत्ररथ हा वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये। इत्यार्था विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥-सौ० ग्यारह 50 । 76 अश्वघोष
▪ "अहो! जीवित प्राणी केवल थकावट पाते हैं, बार-बार जन्म लेते हैं, बूढ़े होते हैं, मरकर चले जाते हैं और फिर जन्म लेते हैं ॥50 ॥ ▪ और मनुष्य की दृष्टि काम व मोहान्धकार से ढकी रहती है और अपनी अन्धता की अधिकता से वह इस महादुःख से निकलने का मार्ग नही जानता है" ॥51 ॥ ▪ इस तरह विचार कर उसने अपने मन में सोचा, "सचमुच में यह क्या है, जिसका अस्तित्व जरा-मरण का कारण है?" ॥52 ॥ ▪ सत्य की गहराई तक प्रवेश कर उसने समझा कि जन्म होने से जरा-मरण की उत्पत्ति होती है ॥53 ॥ ▪ उसने देखा कि शिर होनेपर ही शिर-दर्द सम्भव है, क्योंकि वृक्ष का जन्म होनेपर ही यह काटकर गिराया जा सकता है ॥54 ॥ ▪ तब उसने फिर सोचा, "यह जन्म किससे होता है?" तब उसने ठीक-ठीक देखा कि कर्मभव से जन्म होता है ॥55 ॥ ▪ अपनी दिव्य दृष्टि से उसने देखा कि प्रवृत्ति (= जीवन) कर्म से होती है, न कि स्रष्टा से या प्रकृति से या आत्मा से या अकारण ही ॥56 ॥ ▪ जैसे बाँस की पहली गिरह बुद्धिमानी से काटनेपर सब तेजी से ठीक हो जाता है (अर्थात् शेष बाँस अच्छी तरह चीरा जाता है), वैसे ही उसका ज्ञान उचित क्रम से बढ़ा ॥57 ॥ ▪ तब ऋषि ने भव का कारण निश्चित करने में अपना मन लगाया। तब उसने देखा कि भव का कारण उपादान में पाया जाता है ॥58 ॥⁵⁷ ▪ जीवन के विविध शील-व्रतों, काम, आत्मवाद और असम्यक् दृष्टि ग्रहण करने से यह कर्म (उपादान) होता है, जैसे जलावन ग्रहण करने से अग्नि उत्पन्न होती है ॥59 ॥ ▪ तब उसने सोचा- “उपादान किस कारण से होता है?" तब उसने पहचाना कि उपादान का प्रत्यय (= कारण) तृष्णा में है ॥60 ॥ ▪ जैसे हवा का साथ पाकर थोड़ी सी आग से जङ्गल प्रज्वलित हो जाता है, वैसे ही तृष्णा से काम आदि महापाप होते हैं ॥61 ॥ ▪ तब उसने सोचा- "तृष्णा किससे होती है?" तब उसने निश्चय किया कि तृष्णा का कारण वेदना है ॥62 ॥⁵⁸ ▪ वेदनाओं से अभिभूत होकर मनुष्य उसकी तृप्ति के उपाय चाहते हैं; क्योंकि प्यास के अभाव में किसी को जल में आनन्द नही आता (और प्यास लगनेपर ही पानी की चाह होती है) ॥63 ॥ ⁵⁷. उपादान = भोग-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करनेवाले की तात्कालिक अवस्था-अ० को०। ⁵⁸. वेदना = इन्द्रियों और विषयों के स्पर्श से होनेवाली अनुभूति; चक्षु-स्पर्श, श्रोत-स्पर्श, घ्राण-स्पर्श, जिह्वा- स्पर्श, काय-स्पर्श और मन-स्पर्श से उत्पन्न होनेवाली वेदना। ▪ तब उसने फिर ध्यान किया- "वेदना का स्रोत क्या है?" उसने, जिनसे वेदना का अन्त कर दिया था, देखा कि वेदना का कारण स्पर्श में है ॥64 ॥ ▪ स्पर्श की व्याख्या है, "वस्तु, इन्द्रिय और मन का संयोग" जिससे वेदना वैसे ही उत्पन्न होती है, जैसे दो अरणियों और जलावन के संयोग से आग पैदा होती है ॥65 ॥ ▪ तब उसने सोचा कि स्पर्श का भी कारण है। इसपर उसने जाना कि कारण छः आयतनों (= काय, मन, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण और रसना) में है ॥66 ॥ ▪ अन्धा वस्तुओं को नही देखता है, क्योंकि उसकी आँखें मन के साथ उन (वस्तुओं) का संयोग नही करती; दृष्टि होनेपर संयोग होता है। इसलिए छः आयतनों के होनेपर स्पर्श होता है ॥67 ॥ ▪ फिर उसने छः आयतनों का कारण जानने का निश्चय किया। तब उस कारण-ज्ञ ने नामरूप को कारण जाना ॥68 ॥ ▪ जैसे अङ्कुर का अस्तित्व होनेपर ही पत्ते व तने का अस्तित्व होता है, वैसे ही नाम-रूप का अस्तित्व होनेपर ही छः आयतन होते हैं ॥69 ॥ ▪ तब उसने सोचा- "नाम-रूप का क्या कारण है?" इसपर उसने, जो ज्ञान के उस पार तक पहुँच चुका था, इसका कारण विज्ञान (= सञ्ज्ञा, चेतना) में देखा ॥70 ॥ ▪ विज्ञान का उदय होनेपर नाम-रूप उत्पन्न होता है। बीज का विकास पूरा होनेपर अङ्कुर शारीरिक रूप धारण करता है ॥71 ॥ ▪ फिर उसने सोचा- "विज्ञान किससे पैदा होता है?" तब उसने जाना कि नाम-रूप का आश्रय लेकर यह पैदा होता है ॥72 ॥ ▪ तब निमित्त-नैमित्तिक का क्रम समझने के बाद उसने इसपर विचार किया; उसका मन उसके द्वारा स्थिर किये गये विचारों में विचरा और दूसरी बातों की ओर नही गया ॥73 ॥ ▪ विज्ञान प्रत्यय है जिससे नाम-रूप पैदा होता है। और नाम-रूप आधार है जिसपर विज्ञान आश्रित है ॥74 ॥ ▪ जैसे (जल में) नाव आदमी को ढोती है (और स्थल पर आदमी नाव को ढोता है), वैसे ही विज्ञान व नाम-रूप एक दूसरे के कारण हैं ॥75 ॥ ▪ जैसे तपा हुआ लोहा तृण को प्रज्वलित करता है और प्रज्वलित तृण लोहे को तपाता है, वैसे ही उनका पारस्परिक कार्य-कारण सम्बन्ध है ॥76 ॥ ▪ इस तरह उसने समझा कि विज्ञान से नाम-रूप का उदय होता है, नाम-रूप से आयतन पैदा होते हैं और आयतनों से स्पर्श का उदय होता है ॥77 ॥ ▪ उसने जाना कि स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से उपादान, और वैसे ही उपादान से भव उत्पन्न होता है ॥78 ॥ बुद्धचरित 77
▪ भव से जन्म होता है, जन्म से जरा-मरण का उदय उसने जाना। उसने ठीक ठीक समझा कि प्रत्ययों से संसार उत्पन्न होता है ॥79॥ ▪ तब उसे यह दृढ़ निश्चय हुआ कि जन्म-विनाश से जरा-मरण का निरोध होता है, भव-विनाश से स्वयं जन्म नष्ट होता है और उपादान के निरोध से भव बन्द हो जाता है ॥80॥ ▪ फिर तृष्णा-निरोध से उपादान का निरोध होता है; यदि वेदना का अस्तित्व नही, तो तृष्णा का अस्तित्व नही; स्पर्श का नाश होने से वेदना पैदा नही होती; छः आयतनों का अस्तित्व नही होनेपर स्पर्श का नाश होता है ॥81॥ ▪ उसी प्रकार नाम-रूप का सम्यक् निरोध होनेपर छः आयतन भी नष्ट हो जाते है; और विज्ञान का निरोध होने से नाम-रूप का निरोध होता है; और संस्कारों का निरोध होने से विज्ञान का निरोध होता है ॥82॥ ▪ उसी प्रकार महर्षि ने समझा कि अविद्या के सर्वथा अभाव से संस्कारों का निरोध होता है। इसलिए उसने ज्ञेय को उचित रीति से जाना और वह संसार के सामने बुद्ध होकर खड़ा हुआ ॥83॥ ▪ उस नर-श्रेष्ठ ने भव के ऊपर से नीचे तक कहीं आत्मा को नही देखा और परम ज्ञान के अष्टाङ्गिक मार्ग द्वारा, जो शुरू होकर जल्द ही इष्ट स्थान को पहुँचता है, शान्ति को प्राप्त किया, जैसे जलावन के जलनेपर अग्नि (शान्ति को प्राप्त करती है) ॥84॥ ▪ तब पूर्णता प्राप्त करनेपर उसके मन में यह विचार हुआ- "मैंने यह पूर्ण मार्ग प्राप्त किया है, जिसपर भली-बुरी बातों को जाननेवाले पूर्व के महर्षि-वंश परमार्थ के लिए चले थे" ॥85॥ ▪ चौथे पहर के उस क्षण में जब उषा का आगमन हुआ और जब सब चराचर शान्त थे, महर्षि ने अविनाशी पद प्राप्त किया, उत्तम नायक ने सर्वज्ञता प्राप्त की ॥86॥ ▪ जब बुद्ध होकर उसने इस सत्त्व को जाना, तब मदिरा से माती कामिनी के समान पृथ्वी काँपी, सिद्ध-सङ्घों के साथ दिशाएँ दीप्त हुईं और आकाश में बड़ी बड़ी दुन्दुभियाँ बजीं ॥87॥ ▪ सुख देनेवाली हवा धीरे-धीरे बही, देव ने अनभ्र आकाश से जल-वृष्टि की और वृक्षों ने मानो उसका सम्मान करने के लिए, असमय में फल-फूल गिराये ॥88॥ ▪ उस समय, जैसे स्वर्ग में, मान्दारव फूल, सुवर्ण व वैदूर्य के कमल व कुमुद आकाश से गिरे और उससे शाक्य-ऋषि का स्थान भर गया ॥89॥ ▪ उस क्षण किसी को क्रोध नही हुआ, कोई बीमार नही था, किसी ने पाप-मार्ग का आश्रय नही किया, किसी ने मन में मद नही किया; जगत् इस तरह शान्त हुआ, जैसे उसने पूर्णता प्राप्त की हो ॥90॥ ▪ मोक्ष में प्रवृत्त देव-सङ्घ प्रसन्न हुए, नीचे के लोकों में रहनेवाले जीव भी आनन्दित हुए। धर्म-प्रिय सङ्घ की समृद्धि से धर्म का चारों ओर प्रचार हुआ और जगत्, काम व अज्ञानरूप अन्धकार के ऊपर उठा ॥91॥ ▪ इक्ष्वाकु-वंश के ऋषि, जो पहले मनुष्यों के शासक थे, राजर्षि व महर्षि उनकी सिद्धि से आनन्दित व विस्मित होकर अपने दिव्य विमानों में उनका सम्मान करते हुए खड़े हुए ॥92॥ ▪ अदृश्य जीव-समूहों के महर्षिगण ने ऊँचे स्वर से उनकी स्तुति की और जीव-समूह इस तरह आनन्दित हुआ, जैसे उसकी बढ़ती हो रही हो। किन्तु मार वैसे ही निराश हुआ, जैसे किसी महाविपत्ति से पूर्व (निराशा होती है) ॥93॥ ▪ तब सात दिनों तक, शारीरिक क्लेश से मुक्त होकर, निरन्तर निश्चल आँखों से अपने ही चित्त को देखते हुए वह बैठे रहे। "इस स्थान पर मैंने मुक्ति पाई" इस तरह चिन्तन करते हुए उसने अपनी हार्दिक अभिलाषा पूरी की ॥94॥ ▪ तब ऋषि ने, जो कार्य-कारण का सिद्धान्त समझ चुके थे और जो अनात्मवाद की पद्धति में दृढ़तापूर्वक स्थिर थे, अपने को जगाया और महाकरुणा से युक्त होकर, जगत् को उसकी शान्ति के लिए अपनी बुद्ध-दृष्टि से देखा ॥95॥ ▪ जगत् मिथ्या विचारों और व्यर्थ प्रयत्नों में नष्ट हो रहा है, इसकी काम-वासनाएँ अधिक हैं, और मोक्ष-धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है, यह देखकर उसने अविचल रहने का निश्चय किया ॥96॥ ▪ तब अपनी पहली प्रतिज्ञा याद कर उसने शान्ति का उपदेश देने का निश्चय किया। इसपर उसने अपने मन में सोचा कि किस प्रकार कुछ लोगों की काम-वासना अधिक है और दूसरों की कम ॥97॥ ▪ तब सुगत के मन ने शान्ति का उपदेश करने के लिए निश्चय किया है, यह जानकर स्वर्ग में रहनेवाले दो प्रधान देवों ने जगत् का हित चाहा और वे चमकते हुए उनके समीप गये ॥98॥ ▪ पाप-परित्याग द्वारा अपना लक्ष्य सिद्ध कर और उत्तम धर्म को अपना उत्तम साथी समझकर वह बैठे हुए थे; उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी स्तुति की और जगत् के हित के लिए ये वचन उनसे कहे:- ॥99॥ ▪ "अहो! क्या संसार इस सौभाग्य के योग्य नही कि आपका चित्त जीवों के प्रति करुणा अनुभव करे? संसार मे विविध योग्यताओं के प्राणी हैं, कुछ की काम-वासना अधिक है, कुछ की काम-वासना कम है ॥100॥ ▪ हे मुनि, आपने स्वयं भव-सागर पार कर लिया है, अब दुःख में डूब रहे जगत् को उबारिये, और जैसे कोई बड़ा सेठ धन दान करता है वैसे ही दूसरों को भी आप अपने गुण दीजिए ॥101॥ 78 अश्वघोष