भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

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[Left Column]

अपने कुल में (पूर्वजों द्वारा) पालित मैत्री असज्जनों के पास नही रहती, जैसे (अपने कुल में पालित) लक्ष्मी विह्वलों के पास नहीं रहती; किन्तु सज्जन पूर्वजों द्वारा की गई उसी (मैत्री) को प्रीतिपरम्परा से बढ़ाते हैं ॥3॥

ये चार्थकृच्छ्रेषु भवन्ति लोके समानकार्याः सुहृदां मनुष्याः । मित्राणि तानीति परैमि बुद्ध्या स्वस्थस्य वृद्धौष्विह को हि न स्यात् ॥११.४ धन कम होनेपर संसार में जो मनुष्य मित्रों के काम में हाथ बँटाते हैं, अपनी बुद्धि से मैं उन्हीं को मित्र समझता हूँ; क्योंकि जो स्वस्थ है (=अच्छी अवस्था में है) उसकी बढ़ती में कौन (साथ) नहीं रहेगा? ॥4॥

एवं च ये द्रव्यमवाप्य लोके मित्रेषु धर्मे च नियोजयन्ति । अवाप्तसाराणि धनानि तेषां भ्रष्टानि नान्ते जनयन्ति तापम् ॥११.५ इस प्रकार संसार में धन पाकर जो लोग मित्रों और धर्म में लगाते हैं, उनके धन सारवान् हैं, नष्ट होनेपर अन्त में वे (धन) ताप नहीं पैदा करते ॥5॥

सुहृत्तया चार्यतया च राजन् खल्वेष यो मां प्रति निश्चयस्ते । अत्रानुनेष्यामि सुहृत्तयैव ब्रूयामहं नोत्तरमन्यदत्र ॥११.६ मित्रता और आर्यता (सज्जनता, उदारता) से, हे राजन्, मेरे प्रति आपका जो यह निश्चय हुआ है, इसमें मित्रता से ही अनुनय करूँगा, इसमें दूसरा उत्तर नहीं दूँगा ॥6॥

अहं जरामृत्युभयं विदित्वा मुमुक्षया धर्ममिमं प्रपन्नः । बन्धून् प्रियानश्रुमुखान्विहाय प्रागेव कामानशुभस्य हेतून् ॥११.७ जरा और मृत्यु का भय जानकर मोक्ष की इच्छा से मैं इस धर्म की शरण में, अश्रु-मुख प्रिय बन्धुओं को छोड़कर, अशुभ के कारण-स्वरूप काम को तो पहले ही (छोड़कर), आया हूँ ॥7॥

नाशीविषेभ्यो हि तथा बिभेमि नैवाशनिभ्यो गगनाच्च्युतेभ्यः । न पावकेभ्योऽनिलसंहितेभ्यो यथा भयं मे विषयेभ्य एव ॥११.८ सर्पों से मैं उतना नहीं डरता, न आकाश से गिरे वज्रों से, न हवा से मिली आग से, जितना कि विषयों से डरता हूँ ॥8॥

कामा ह्यनित्याः कुशलार्थचौरा रिक्ताश्च मायासदृशाश्च लोके । आशास्यमाना अपि मोहयन्ति चित्तं नृणां किं पुनरात्मसंस्थाः ॥११.९ काम अनित्य है, कुशलरूप धन के चोर हैं, खाली हैं और संसार में माया के समान हैं। उनकी चिन्ता करनेपर भी वे मनुष्यों के चित्त मूढ़ करते हैं, फिर अपने में उनके स्थित रहनेपर क्या कहना? ॥9॥

कामाभिभूता हि न यान्ति शर्म त्रिविष्टपे किं बत मर्त्यलोके । कामैः सतृष्णस्य हि नास्ति तृप्तिरिन्धनैर्वातसखस्य वह्नेः ॥११.१०


[Right Column]

जो काम से अभिभूत हैं वे, मर्त्य-लोक में क्या, स्वर्ग में भी शान्ति नहीं पाते। तृष्णावान् को काम से तृप्ति नहीं होती, जैसे हवा का साथ पाकर आग को इन्धन से (तृप्ति नहीं होती) ॥10॥

जगत्यनर्थो न समोऽस्ति कामैर्मोहाच्च तेष्वेव जनः प्रसक्तः । तत्त्वं विदित्वैवमनर्थभीरुः प्राज्ञः स्वयं कोऽभिलषेदनर्थम् ॥११.११ जगत् में काम (=विषय) के समान अनर्थ (बुराई, विपत्ति) नहीं और मोह से आदमी उसी में आसक्त होता है। तत्त्व को जानकर अनर्थ से डरनेवाला कौन बुद्धिमान् स्वयं अनर्थ की अभिलाषा करे? ॥11॥

समुद्रवस्त्रामापि गामवाप्य पारं जिगीषन्ति महार्णवस्य । लोकस्य कामैर्न वितृप्तिरस्ति पतद्भिरम्भोभिरिवार्णवस्य ॥११.१२ समुद्र-वसना पृथिवी को भी पाकर लोग महासागर के पार जीतने की इच्छा करते हैं। संसार का काम (- उपभोग) से तृप्ति नहीं होती, जैसे गिरती जल राशि से महासागर की (तृप्ति नहीं होती) ॥12॥

देवेन वृष्टेऽपि हिरण्यवर्षे द्वीपान्समग्रांश्चतुरोऽपि जित्वा । शक्रस्य चार्धासनमप्यवाप्य मान्धातुरासीद्विषयेष्वतृप्तिः ॥११.१३ देव द्वारा सुवर्ण-वृष्टि की जानेपर भी, चारों समग्र द्वीपों को जीतकर भी और इन्द्र का आधा आसन पाकर भी, मान्धाता को विषयों में तृप्ति नहीं हुई ॥13॥

भुक्त्वापि राज्यं दिवि देवतानां शतक्रतौ वृत्रभयात्प्रनष्टे । दर्पान्महर्षीनपि वाहयित्वा कामेष्वतृप्तो नहुषः पपात ॥११.१४ वृत्र के भय से इन्द्र के छिपनेपर, स्वर्ग में देवताओं का राज्य भोगकर भी, दर्प से महर्षियों द्वारा भी (अपने को) वहन कराकर, नहुष (स्वर्ग से) गिर पड़ा, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥14॥

ऐडश्च राजा त्रिदिवं विगाह्य नीत्वापि देवीं वशमुर्वशीं ताम् । लोभादृषिभ्यः कनकं जिहीर्षुर्जगाम नाशं विषयेष्वतृप्तः ॥११.१५ और, राजा ऐड (इडा का पुत्र पुरूरवा) स्वर्ग में प्रवेश कर, उस देवी उर्वशी को वश में लाकर भी, लोभवश ऋषियों से सुवर्ण हरण करने की इच्छा से नाश को प्राप्त हुआ, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥15॥

बलेर्महेन्द्रं नहुषं महेन्द्रादिन्द्रं पुनर्यै नहुषादुपैयुः । स्वर्गे क्षितौ वा विषयेषु तेषु को विश्वसेद्भाग्यकुलाकुलेषु ॥११.१६ जो विषय बलि से महेन्द्र के पास, महेन्द्र से नहुष के पास, फिर नहुष से (महा-) इन्द्र के पास गये, भाग्य से परेशान रहनेवाले उन विषयों में, स्वर्ग में या पृथिवी पर, कौन विश्वास करे? ॥16॥

चीराम्बरा मूलफलाम्बुभक्षा जटा वहन्तोऽपि भुजङ्गदीर्घाः । यैर्नान्यकार्या मुनयोऽपि भग्नाः कः कामसञ्ज्ञान्मृगयेत शत्रून् ॥११.१७ वल्कल-वस्त्र पहननेवाले, जल-फल-मूल भक्षण करनेवाले, साँप से समान लक्ष्मी जटा धारण करनेवाले मुनि लोग भी, जिन्हें (तप आदि के अतिरिक्त) दूसरा काम नहीं था, जिनके द्वारा भग्न किए गये, उन कामसंज्ञक शत्रुओं की कौन खोज करे? ॥17॥


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56 अश्वघोष