बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहेन खल्वेतदहं ब्रवीमि नैश्वर्यरोगेण न विस्मयेन । इमं हि दृष्ट्वा तव भिक्षुवेषं जातानुकम्पोऽस्म्यपि चागताश्रुः ॥१०.३२ स्नेह से मैं यह कह रहा हूँ, ऐश्वर्य के अनुराग से नहीं, विस्मय (औद्धत्य ?) से नहीं। आपका यह भिक्षु-वेष देखकर मुझे अनुकम्पा हो गई है, और आँसू आ गये हैं ॥३२॥ तद्भुङ्क्ष्व भिक्षाश्रमकाम कामान् कालेऽसि कर्ता प्रियधर्म धर्मम् । यावत्स्वंशप्रतिरूपरूपं न ते जराब्येत्यभिभूय भूयः ॥१०.३३ हे स्व-वंश-प्रतिबिम्ब, जबतक आपके रूप को दबाकर बुढ़ापा फिर नहीं आता, तबतक, हे भिक्षु-आश्रम के इच्छुक, कामोपभोग कीजिए। हे प्रियधर्म, समय पर धर्म कीजिएगा ॥३३॥ शक्नोति जीर्णः खलु धर्ममाप्तुं कामोपभोगेष्वगतिर्जरायाः । अतश्च यूनः कथयन्ति काममध्यस्य वित्तं स्थविरस्य धर्मम् ॥१०.३४ वृद्ध धर्म प्राप्त कर सकता है, कामोपभोग में बुढ़ापे की गति नहीं है। और इस कारण युवक के लिए काम, मध्य के लिए वित्त, और बूढ़े के लिए धर्म बताते हैं ॥३४॥ धर्मस्य चार्थस्य च जीवलोके प्रत्यर्थिभूतानि हि यौवनानि । संरक्ष्यमाणान्यपि दुर्ग्रहाणि कामा यतस्तेन यथा हरन्ति ॥१०.३५ जीव-लोक में धर्म और अर्थ का शत्रु यौवन है। यत्न करनेपर भी उसे पकड़ रखना कठिन है; क्योंकि काम अपने मार्ग से उसे ले जाते हैं ॥३५॥ वयांसि जीर्णानि विमर्शयन्ति धीराण्यवस्थाानपरायणानि । अल्पेन यत्नेन शमात्मकानि भवन्त्यगत्यैव च लज्जया च ॥१०.३६ वृद्धावस्था विचारवती धीर और स्थिरता परायण होती है। उपायहीनता और लज्जा के कारण अल्प यत्न से ही उसमें शान्ति मिलती है ॥३६॥ अतश्च लोलं विषयप्रधानं प्रमत्तमक्षान्तमदीर्घदर्शि । बहुच्छलं यौवनमभ्यतीत्य निस्तीर्य कान्तारमिवाश्वसन्ति ॥१०.३७ अतः चञ्चल, विषय-प्रधान, प्रमत्त (= प्रमादपूर्ण) असहनशील, अदीर्घ-दर्शी और अनेक छलों से युक्त यौवन को बिताकर लोग वैसे ही आश्वस्त होते हैं, जैसे जङ्गल को पार कर ॥३७॥ तस्मादधीरं चपलप्रमादि नवं वयस्तावदिदं व्यपैतु । कामस्य पूर्वं हि वयः शरव्यं न शक्यते रक्षितुमिन्द्रियेभ्यः ॥१०.३८ इसलिए अधीर, चपल और प्रमादपूर्ण यह नई वयस तबतक बीते; क्योकि कामदेव का लक्ष्य नई जवानी है, जिसकी इन्द्रियों से रक्षा नहीं की जा सकती ॥३८॥ अथौ चिकीर्षा तव धर्म एव यजस्व यज्ञं कुलधर्म एषः । यज्ञैरधिष्ठाय हि नागपृष्ठं ययौ मरुत्वानपि नाकपृष्ठम् ॥१०.३९⁴⁴ यदि आपको इच्छा कर्म करना ही है, तो यज्ञ कीजिए, यह आपका कुलधर्म है। यज्ञों द्वारा हाथी की पीठ पर चढ़कर इन्द्र भी स्वर्ग गया था ॥३९॥ सुवर्णकेयूरविदग्धबाहवो मणिप्रदीपोज्ज्वलचित्रमौलयः । नृपर्षयस्तां हि गतिं गता मखैः श्रमेण यामेव महर्षयो ययुः ॥१०.४० राजर्षि-गण, जिनकी भुजाएँ सुवर्ण केयूरों से बँधी थीं और जिनके रङ्ग-बिरङ्गे मुकुट मणि-प्रदीपों से उज्ज्वल थे, यज्ञों द्वारा उस गति को प्राप्त हुए, जिसको ही महर्षि-गण तपस्या द्वारा प्राप्त हुए।” ॥४०॥ इत्येवं मगधपतिर्वचो बभाषे यः सम्यग्वलभिदिव ब्रुवन् बभाषे । तच्छ्रुत्वा न स विचचाल राजसूनूः कैलासो गिरिरिव नैकचित्रसानुः ॥१०.४१ इस प्रकार मगध-राज ने वह वचन कहा। वह ठीक-ठीक बोलने में इन्द्र के समान शोभित हुआ। यह सुनकर वह राज-पुत्र विचलित नहीं हुआ, जैसे अनेक रङ्ग-बिरङ्गी चोटियों से युक्त कैलाश पर्वत (विचलित नहीं होता है) ॥४१॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते श्रेण्याभिगमनो नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ एकादश सर्ग काम-निन्दा अथैवमुक्तो मगधाधिपेन सुहृन्मुखेन प्रतिकूलमर्थम् । स्वस्थोऽविकारः कुलशौचशुद्धः शौद्धोदनिर्वाक्यमिदं जगाद ॥११.१ तब मगध-राज के द्वारा अपने मित्र-मुख से इस तरह प्रतिकूल बात कही जानेपर, अपने कुल की पवित्रता से पवित्र शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) ने शान्ति और धैर्यपूर्वक यह वचन कहा:- ॥१॥ नाश्चर्यमेतद्भवतो विधानं जातस्य हर्यङ्ककुले विशाले । यन्मित्रपक्षे तव मित्रकाम स्याद्वृत्तिरेषा परिशुद्धवृत्तेः ॥११.२ “आप विशाल हर्यङ्क-कुल में पैदा हुए हैं, अतः आपके लिए ऐसा कहना आश्चर्यजनक नहीं; हे मित्रेच्छु, मित्रों के प्रति आप शुद्धाचार का यह व्यवहार आश्चर्यजनक नहीं ॥२॥⁴⁵ असत्सु मैत्री स्वकुलानुरूपा न तिष्ठति श्रीरिव विक्लवेषु । पूर्वैः कृतां प्रीतिपरम्पराभिस्तामेव सन्तस्तु विवर्धयन्ति ॥११.३ ⁴⁴ - “नाक” की जगह “नाग” रक्खा गया है। नमुचि के वध के बाद, यज्ञ द्वारा ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्त होकर, इन्द्र स्वर्ग को लौटा था। ⁴⁵- हर्यङ्क = उस कुल के किसी राजा का नाम, या वह कुल जिसका चिह्न सिंह है। बुद्धचरित 55