भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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दीप्ति और धीरता में वह भूतलपर अवतीर्ण बाल-सूर्य के समान शोभित हुआ। उस प्रकार अत्यन्त दीप्तिमान् होनेपर भी, देखे जानेपर, वह चन्द्रमा के समान आँखें हर लेता था ॥12॥ स हि स्वगात्रप्रभयोज्वलन्त्या दीपप्रभां भास्करवन्मुमोष । महार्हजाम्बूनदचारुवर्णो विद्योतयामास दिशश्च सर्वाः ॥१.१३ अपने शरीर की जलती प्रभा से उसने भास्कर के समान दीप्त प्रभा को हर लिया। बहुमूल्य-सुवर्ण-सदृश सुन्दर वर्णवाले (बालक) ने सब दिशाओं को प्रकाशित किया ॥13॥ अनाकुलान्युब्जसमुद्गतानि निष्पेषवद्द्यायतविक्रमाणि । तथैव धीराणि पदानि सप्त सप्तर्षितारासदृशो जगाम ॥१.१४ सप्तर्षि-तारा के समान वह सात पग चला, उसने ये लम्बे और अविचल पग धैर्यपूर्वक सीधे उठाकर दृढ़ता के साथ रखे ॥14॥ बोधाय जातोऽस्मि जगद्धितार्थमन्त्या भवोत्पत्तिरियं ममेति । चतुर्दिशं सिंहगतिर्विलोक्य वाणीं च भव्यार्थकरीमुवाच ॥१.१५ और उस सिंह-गति ने चारों ओर देखकर भविष्यवाणी की— "जगत् के हित के लिए ज्ञान अर्जन करने के लिए मैं जन्मा हूँ, संसार में यह मेरी अन्तिम उत्पत्ति है" ॥15॥ खात्समुस्रुते चन्द्रमरीचिशुभ्रे द्वे वारिधारे शिशिरोष्णवीर्ये । शरीरसंस्पर्शसुखान्तराय निपेततुर्मूर्धनि तस्य सौम्ये ॥१.१६ चन्द्र-किरण-सदृश दो जल-धाराएँ, एक शीतल और दूसरी गर्म आकाश से स्रवित हुईं और शरीर स्पर्श कर सुख देने के लिए उसके सौम्य मस्तक पर गिरीं ॥16॥ श्रीमद्विताने कनकोज्जवलाङ्गे वैडूर्यपादे शयने शयानम् । यद्गौरवात्काञ्चनपद्महस्ता यक्षाधिपाः संपरिवार्य तस्थुः ॥१.१७ सुन्दर वितान से युक्त, सुवर्ण से उज्जवल, वैडूर्य मणि के पादवाले शयनपर वह पड़ा हुआ था। उसके गौरव के कारण यक्षपति-गण अपने हाथों में सुवर्ण कमल लिए हुए उसे चारों ओर घेरकर खड़े हुए ॥17॥ (अदृश्यरूपाश्च) दिवौकसः खे यस्य प्रभावात्प्रणतैः शिरोभिः । आधारयन् पाण्डरमातपत्रं बोधाय जेपुः परमाशिषश्च ॥१.१८ अदृश्य देवताओं ने उसके प्रभाव से शिर झुकाकर आकाश में श्वेत आतपत्र धारण किया और उसकी बुद्धत्व-प्राप्ति के लिए उत्तम आशीर्वाद दिये ॥18॥ महोरगा धर्मविशेषतर्षार्दुद्वेष्वतीतैषु कृताधिकाराः । यमव्यजन् भक्तिविशिष्टनेत्रा मन्दारपुष्पैः समवाकिरंश्च ॥१.१९ जिन्होंने अतीत के बुद्धों की सेवा की थी, उन बड़े-बड़े सर्पों ने धर्मविशेष की प्यास से उसके ऊपर व्यजन डुलाये और भक्ति के कारण अपनी विलक्षण आँखों से (देखते हुए) मन्दार फूल बरसाये ॥19॥ तथागतोत्पादगुणेन तुष्टाः शुद्धाधिवासाश्च विशुद्धसत्त्वाः । देवा ननन्दुर्गितगेऽपि रागे मग्नस्य दुःखै जगतो हिताय ॥१.२० तथागत के जन्म से सन्तुष्ट होकर, विशुद्ध स्वभाववाले शुद्धाधिवास देव, स्वयं राग-रहित होनेपर भी, दुःखमय जगत् का (भावी) हित सोचकर, प्रसन्न हुए ॥20॥ यस्य प्रसूतौ गिरिराजकीला वाताहता नौरिव भूश्चचाल । सचन्दना चोत्पलपद्मगर्भा पपात वृष्टिर्गगनादनभ्रात् ॥१.२१ उसके जन्म में यह पृथ्वी, जो गिरिराज-रूप कील से स्थिर है, वायु से आहत नाव की भाँति काँपी। मेघ- रहित आकाश से चन्दन-सुवासित वृष्टि हुई, जिसमे लाल नीले कमल गिरे ॥21॥ वाता ववुः स्पर्शसुखा मनोज्ञा दिव्यानि वासांस्यवपातयन्तः । सूर्यः स एवार्थ्यधिकं चकाशे जज्वल सौम्यार्चिरनीरतोऽग्निः ॥१.२२ स्पर्श से सुख देनेवाली मनोहर वायु दिव्य वस्त्रों की वृष्टि करती हुई बहने लगी। वही सूर्य अत्यधिक चमका। बिना सुलगाये ही आग सौम्य शिखाओं के साथ प्रज्वलित हुई ॥22॥ प्रागुत्तरे चावसथप्रदेशे कूपः स्वयं प्रादुरभूत्सिताम्बुः । अन्तः पुराण्यागतविस्मयानि यस्मिन् क्रियास्तीर्थ इव प्रचक्रुः ॥१.२३ आवास-भूमि की उत्तर-पूर्व दिशा में स्वच्छ जल के कूप का आप ही आप प्रादुर्भाव हुआ, जहाँ विस्मित अन्तःपुर-वासियों ने उसी प्रकार क्रियाएँ कीं, जिस प्रकार तीर्थ में ॥23॥ धर्मार्थिभिर्भूतगणैश्च दिव्यैस्तद्दर्शनार्थं वनमापुपूरे । कौतूहलेनैव च पादपेभ्यः पुष्पाण्यकालेऽ(प्यवपातयद्भिः) ॥१.२४ उसके दर्शन के लिए धर्माभिलाषी दिव्य प्राणियों से वह वन भर गया। कुतूहल-वश उन्होंने पेड़ों से अकाल में भी (फूले) फूल गिराये ॥24॥ भूतैरसौम्यैः (परित्यक्तहिंसे-) र्नाकारि पीडा स्वगणे परे वा । लोके हि सर्वाश्च विना प्रयासं रुजो नराणां शमयां बभूवुः ॥1.25⁴ उस समय विघ्नकारी प्राणी एकत्र हुए और उन्होंने एक दूसरे को क्लेश नही दिया। मानव-जाति के जो कुछ रोग थे सब अनायस ही दूर हो गये ॥25॥ कलं प्रणेदुः मृगपक्षिणश्च शान्ताम्बुवाहाः सरितो बभूवुः । दिशः प्रसेदुविमले निरभ्रे विहायसे दुन्दुभयो निनेदुः ॥1.26 मृग और पक्षी ऊँचे स्वर से बोले नहीं और नदियाँ नीरव जल के साथ बहीं। दिशाएँ स्वच्छ हो गई और आकाश निरभ्र होकर चमका। गगन में देव दुन्दुभियाँ बजीं ॥26॥ 4- मूल के अप्राप्त श्लोक 25-40 ग तक की पद्य-बद्ध रचना अनुवाद के आधार पर हमने की है। बुद्धचरित 5