भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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बुद्धचरित प्रथम सर्ग भगवान् का जन्म [ऐक्ष्वाक इक्ष्वाकुसमप्रभावः शाक्येष्वशक्येषु विशुद्धवृत्तः । प्रियः शरच्चन्द्र इव प्रजानां नाम बभूव राजा] ॥1.1¹ इक्ष्वाकु-वंश में शुद्धोदन नामक राजा हुआ। वह अजेय शाक्यों का अधिपति था। इक्ष्वाकु के समान प्रभावशाली था। उसका आचरण पवित्र था। अपनी प्रजा के लिए वह शरच्चन्द्र के समान प्रिय था ॥1॥ [तस्येन्द्रकल्पस्य बभूव पत्नी] दीप्त्या नरेन्द्रस्य समप्रभावा । [पद्मेव लक्ष्मीः पृथिवीव धीरा मायेति नाम्नानुपमेव माया] ॥1.2 उस इन्द्र-तुल्य राजा के शची-सदृश रानी थी, जिसकी दीप्ति राजा की शक्ति के समान थी। वह पद्मा के समान सुन्दरी और पृथ्वी के सदृश धीर थी। अनुपम माया के समान होने के कारण उसका नाम महामाया हुआ ॥2॥ सार्धं तयाऽसौ विजहार राजा नाचिन्तयद्वैश्रवणस्य लक्ष्मीम् । [ततश्च विद्येव समाधियुक्ता गर्भं दधे पापविवर्जिता सा] ॥1.3² अपनी रानी के साथ विहार करते हुए उस नरपति ने मानो वैश्रवण (कुबेर) के परम ऐश्वर्य का उपभोग किया। तब वह निष्पाप (रानी) गर्भवती हुई, जैसे समाधि-युक्त विद्या फलवती होती है ॥3॥ प्राग्गर्भधानान्मनुजेन्द्रपत्नी सितं ददर्श द्विपराजमेकं । स्वमे विशन्तं वपुरात्मनः सा [न तन्निमित्तं समवाप तापं] ॥1.4 गर्भधारण करने से पूर्व उसने स्वप्न में एक श्वेत गज-राज को अपने शरीर में प्रवेश करते देखा; किन्तु इससे उसे कुछ कष्ट नही हुआ ॥4॥ [सा तस्य देवप्रतिमस्य देवी गर्भेण वंशश्रियमुद्वहन्ती] । श्रमं न लभे न शुचं न मायां गन्तुं वनं सा निभृतं चकाङ्क्ष ॥1.5 उस देव-तुल्य राजा की रानी माया ने अपने गर्भ में अपने वंश की श्री को धारण किया। श्रम, शोक और माया से मुक्त होकर और विशुद्ध होकर, उसने पावन वन (जाने) की इच्छा की ॥5॥ 1- प्रथम सात श्लोक अप्राप्त हैं। इन श्लोकों के जो अंश [ ] कोष्ठ के अन्तर्गत हैं वे जॉन्स्टन-कृत मूलोद्धार हैं और शेष की रचना अनुवाद के आधार पर हमने की है। 1 'ग' के अन्त में जॉन्स्टन के 'प्रजाम्यः' के स्थान में हमने 'प्रजानां' कर दिया है। 2- क-या 'प्रियासहायो विजहार राजा' क-ख या 'सार्धं तयाऽसौ नृपतिश्च रेमे भेजे यथा वैश्रवणस्य लक्ष्मी।' 4 अश्वघोष [सा लुम्बिनीं नाम वनान्तभूमिं चित्रद्रुमां चैत्ररथाभिरामां] । ध्यानानुकूलां विजनामियेव तस्यां निवासाय नृपं बभाषे ॥1.6 ध्यान के योग्य एकान्त वन की इच्छा से, उसने विविध वृक्षों से युक्त चैत्ररथ उपवन के समान सुन्दर लुम्बिनी वन में चलकर रहने के लिए राजा से कहा ॥6॥ [आर्याशयां तां] प्रवणं च धर्मे [विज्ञाय कौतूहलहर्षपूर्णः । शिवात् पुरात् भूमिपतिर्जगाम तत्प्रीतये नापि विहारहेतोः] ॥1.7³ भूपति ने कुतूहल और आनन्द के साथ उसकी धार्मिकता से उसका उत्तम आशय जानकर, उसे प्रसन्न करने के लिए, न कि विहार करने के लिए, उस सुन्दर नगर को छोड़ा ॥7॥ तस्मिन्वने श्रीमत्ति राजपत्नी प्रसूतिकालं समवेक्षमाणा । शय्यां वितानोपहितां प्रपेदे नारीसहस्रैरभिनन्द्यमाना ॥1.8 उस सुन्दर वन में प्रसव-काल समीप देखकर रानी ने वितान-युक्त शय्या का आश्रय लिया। उस समय हजारों स्त्रियों ने उसका अभिनन्दन किया ॥8॥ ततः प्रसन्नश्च बभूव पुष्यस्तस्याश्च देव्या व्रतसंस्कृतायाः । पार्श्वात्सुतो लोकहिताय जज्ञे निर्वेदनं चैव निरामयं च ॥1.9 तब पुष्य नक्षत्र प्रसन्न हुआ और व्रत से पवित्र हुई रानी के पार्श्व से लोक-हित के लिए पुत्र उत्पन्न हुआ; रानी को न पीडा हुई और न रोग ॥9॥ ऊरोर्यथौर्वस्य पृथोश्च हस्तान्मान्धातुरिन्द्रप्रतिमस्य मूर्ध्नः । कक्षीवतश्चैव भुजांसदेशात्तथाविधं तस्य बभूव जन्म ॥1.10 जैसे और्व का जन्म जाँघ से, पृथु का हाथ से, इन्द्र-तुल्य मान्धाता का मस्तक से, कक्षीवान् का काँख से, वैसे ही उसका जन्म (पार्श्व से) हुआ ॥10॥ क्रमेण गर्भादभिनिःसृतः सन् बभौ च्युतः खादिव योन्यजातः । कल्पेष्वनेकेषु च भावितात्मा यः सम्प्रजानन्सुषुवे न मूढः ॥1.11 काल-क्रम से गर्भ से निकलने पर, वह आकाश से गिरे के समान शोभित हुआ; (क्योंकि) वह जन्म मार्ग से उत्पन्न नही हुआ था। अनेक कल्पों में उसने अपने को पवित्र कर लिया था; अतः वह जागरूक होकर (स्मृति-संप्रजन्य के साथ) जन्मा, मूढ़ (मूर्ख, बेसुध) होकर नही ॥11॥ दीप्त्या च धैर्येण च यो रराज बालो रविर्भूममिवावतीर्णः । तथातिदीप्तोऽपि निरीक्ष्यमाणो जहार चक्षूंषि यथा शशाङ्कः ॥1.12 3- ग-पा० 'भूमिपतिः प्रतस्थे' ।

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