बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिवेदन जिस पवित्र इक्ष्वाकु-वंश में दाशरथी राम का जन्म हुआ था, उसी में शौद्धोदनि सिद्धार्थ भी पैदा हुए थे। राम प्राग् ऐतिहासिक काल के हैं और सिद्धार्थ (= बुद्ध) आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले हुए थे। हजारों वर्षों से करोड़ों व्यक्ति प्रतिदिन राम और बुद्ध को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए अपने को पवित्र करते आ रहे हैं। राम ने कौटुम्बिक जीवन और सुराज्य का आदर्श उपस्थित किया, जब कि बुद्ध ने कुटुम्ब एवं राज-पाट को छोड़कर सत्य और सन्मार्ग का स्वयं दर्शन किया और लोगों को भी उसका उपदेश दिया। बुद्ध के परमभक्त साकेत-निवासी महाकवि अश्वघोष ने "बुद्धचरित" नामक बुद्ध का जीवनचरित लिखा है। "बुद्धचरित" एक उत्तम काव्य है, कलाकार की कृति है। इससे भी बढ़कर इसमें सन्मार्ग से भटके हुए लोगों के लिए कल्याणकारी सन्देश है। कवि के शब्दों में ही "मनुष्यों के हित व सुख के लिए, न कि विद्वता या काव्य-कौशल दिखाने के लिए यह काव्य रचा गया"। वास्तव में संस्कृत या पालि में बुद्ध की ऐसी सुन्दर जीवनी और दूसरी देखने में नही आती। अवश्य ही हमने "बुद्धचरित" की उपेक्षा की है। यही कारण है कि "बुद्धचरित" हमें अधूरा ही मिला और इसकी टीका एक भी उपलब्ध नही है। राष्ट्र-भाषा हिन्दी में इसका कोई अनुवाद न देखकर, मैंने यह अनुवाद करने की धृष्टता की है, जिसके लिए, आशा है, उदार विद्वान पाठक मुझे क्षमा करेंगे। सुमनजी के परामर्श एवं प्रेरणा से अनुवाद के साथ मूल संस्कृत भी दे दिया गया है। अनुवाद करने में डा० जॉन्स्टन-कृत अंग्रेजी अनुवाद से मुझे बड़ी सहायता मिली है। सातवें सर्ग तथा आठवें के शुरु का अनुवाद सुधांशुजी ने मेरे साथ बैठकर दोहरा देने की कृपा की है। पहले और चौदहवें सर्ग के अप्राप्त 100 श्लोकों के हिन्दी-अनुवाद का आधार है डा० जॉन्स्टन का अंग्रेजी अनुवाद, जो कि तिब्बती अनुवाद के आधार पर किया गया है और जो "बुद्धचरित" के द्वितीय भाग में पञ्जाब विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुआ है। अनुवाद के कुछ अंश "धर्मदूत", "प्राचीन भारत", "आरती" और "जीवन-साहित्य" में छप चुके हैं।
कठोतिया } 5-11-42 } सूर्यनारायण चौधरी
नोट बुद्धचरित प्रथम सर्ग के 1-7 व 25-40 श्लोक संस्कृत-मूल में प्राप्त न होने के कारण उनका उद्धाररूप अनुवाद श्री जौन्स्टन ने तिब्बती-पाठ के आधार पर किया गया था। मूल संस्कृत के जिन श्लोकों में शब्दों को लाल किया गया उन्हें चौधरीजी ने या E. B. Cowell के पाठ से लिया है या फिर डा० जॉन्स्टन के फुटनोट से। डा० जॉन्स्टन का बुद्धचरित पाठ Cowell के पाठ से किस प्रकार अन्तर में है इसके लिए सर्च करें KPS-3 E. H. Johnston Buddhacarita Sanskrit Text. जॉन्स्टन का बुद्धचरित संस्कृत-पाठ अभी तक E-Text में नही था उसे मैंने पहली बार E-Text में कर दिया है। संस्कृत श्लोकों को चार पादों में माना गया है– श्लोक की प्रथम पंक्ति का शुरुआती आधा भाग 'क' पाद और बाद का आधा भाग 'ख' पाद कहा है तथा द्वितीय पंक्ति का आधा भाग 'ग' पाद और बाद का आधा भाग 'घ' पाद कहा है। पुस्तक में प्रयुक्त सङ्केत इस प्रकार हैं– सौ० = सौन्दरनन्द। अ० को० = अभिधर्मकोष। बु० वा० = बुद्धवाणी।
के० पी० सिंह 23.8.2021
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