चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १०३
दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना बसुन्धरा ॥७॥
म०छ०--दान नय विनय नगीच शूरता विज्ञान बीच । कीजिये अचर्ज नाहिं, रत्न ढेर भूमि माहिं ॥७॥
दान, तप, वीरता, विज्ञान और नीति, इनके विषय में कभी किसी को विस्मित होना ही नहीं चाहिये । क्योंकि पृथ्व्री में बहुत से रत्न भरे पड़े हैं ॥७॥
दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः । यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥८॥
म०छ०--दूरहू बसै नगीच, जासु जौन चित्त बीच । जो न चित्त जासु पूर । है समीपहूँ सो दूर ॥८॥
जो (मनुष्य) जिसके हृदय में स्थान किये है, वह दूर रहकर भी दूर नहीं है । जो जिसके हृदय में नहीं रहता, वह समीप रहने पर भी दूर है ॥८॥
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम् । व्याधो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ॥६॥
म०छ०--जाहिते चहे सुपास, मीठी बोली तासु पास । व्याध मारिबे मृगान, मंत्र गावती सुगान ॥९॥
मनुष्य को चाहिए कि जिस किसी से अपना भला चाहता हो उससे हमेशा मीठी बातें करे । क्योंकि बहेलिया जब हिरन का शिकार करने जाता है तो बड़े मीठे स्वर से गाता है ॥९॥