चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ चाणक्यनीतिदर्पणः
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि ।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः ॥४॥
म०छ०-थोर तेल वारि माहिं । गुप्तहू खलानि माहिं ।
दान शास्त्र पात्रज्ञानि । ये बड़े स्वभाव आहि ॥४॥
जल में तेल, दुष्ट मनुष्य में कोई गुप्त बात, सुपात्र में थोड़ा भी दान और समझदार मनुष्य के पास शास्त्र, ये थोड़े होते हुए भी पात्र के प्रभाव से तुरन्त फैल जाते हैं ॥४॥
धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत् ।
सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥५॥
म०छ०-धर्म वीरता मशान । रोग माहिं जौन ज्ञान ।
जो रहे वही सदाइ । बन्ध को न मुक्त हांइ ॥५॥
कोई धार्मिक आख्यान सुनने पर, श्मशान में और रुग्णावस्था में मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि हमेशा रहे तो कौन मनुष्य मोक्षपद न प्राप्त कर ले ? ॥५॥
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।
तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ॥६॥
म०छ०-आदि चूकि अन्त शोक । जो रहे विचारि दोष ।
पूर्वही बनै जो बैस । कौन को मिले न ऐश ॥६॥
कोई बुरा काम करने पर पछतावे के समय मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि पहले ही से रहे तो कौन मनुष्य उन्नत न हो जाय ॥६॥