भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः १०१

म०छ०--निर्धनत्व दुःख बन्ध और विपत्ति सात ।
है स्वकर्म वृक्ष जात ये फलैं धरैक गात ॥१॥

मनुष्य अपने द्वारा पल्लवित अपराध रूपी वृक्ष के ये ही फल फलते हैं--दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन ( कैद ) और व्यसन ॥१॥

पुनर्वित्तम्पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही ।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥२॥

म०छ०--फेरि वित्त फेरि मित्त, फेरि तो धराहु नित्त ।
फेरि फेरि सर्व एह, ये मानुषी मिलै न देह ॥२॥

गया हुआ धन वापस मिल सकता है, रूठा हुआ मित्र भी राजी किया जा सकता है, हाथ से निकली हुई स्त्री भी फिर वापस आसकती है और छीनी हुई जमीन भी फिर मिल सकती है, पर गया हुआ यह शरीर वापस नहीं मिल सकता ॥२॥

बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।
वर्षन्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥३॥

म०छ०--एक ह्वै अनेक लोग वीर्य शत्रु जीत योग ।
मेघ धारि बारि जेत घास ढेर बारि देत ॥३॥

बहुत प्राणियों का सङ्गठित बल शत्रु को परास्त कर देता है, प्रचण्ड वेग के साथ बरसते हुए मेघ को सङ्गठन के बल से क्षुद्र तिनके हरा देते हैं ॥३॥