चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १०० | चाणक्यनीतिदर्पणः |
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युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः ।
साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥२०॥
दोहा—सात सिन्धु कल्पान्त चलु, मेरु चलै युग अन्त ।
परे प्रयोजन ते कबहुँ, नहिं चलते हैं सन्त ॥२०॥
युग का अन्त हो जाने पर सुमेरु पर्वत डिग जाता है । कल्प का अन्त होने पर सातो सागर भी चंचल हो उठते हैं, पर सज्जन लोग स्वीकार किये हुये मार्ग से विचलित नहीं होते ॥२०॥
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंख्या विधीयते ॥२१॥
म०छ०--अन्न बारि चारु बोल तीनि रत्न भू अमोल ।
मूढ़ लोग के पषान टूक रत्न के पषान ॥२१ ॥
सच पूछो तो पृथिवी भर में तीन ही रत्न हैं--अन्न, जल और मीठी-मीठी बातें । लेकिन बेवकूफ लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं ॥२१॥
इति चाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।
दारिद्र्य-रोग-दुःखानि बन्धनव्यसनानि च ॥१॥