चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ९९
दोहा—जिमि खोदत ही ते मिले, भूतल के मधि वारि ।
तैसेहि सेवा के किये, गुरु विद्या मिलि धारि ॥१७.।
जैसे फावड़े से खोदने पर पृथ्वी से जल निकल आता है । उसी तरह किसी गुरु के पास विद्यमान विद्या उसकी सेवा करने से प्राप्त हो जाती है ॥१७ ॥
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथाऽपि सुधियश्चार्या सुविचार्यैव कुर्वते ॥१८॥
दोहा—फलसिधि कर्म अधीन है, बुद्धि कर्म अनुसार ।
तौहू सुमति महान जन, करम करहिं सुविचार ॥१८॥
यद्यपि प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार ही फल प्राप्त होता है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है । फिर भी बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ-बूझ कर ही कोई काम करते हैं ॥१८॥
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाऽभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते ॥१९॥
दोहा—एक अक्षरदातुहु गुरुहि, जो नर वन्दे नाहिं ।
जन्म सैकड़ों श्वान ह्वै, जनै चण्डालन माहिं ॥१९॥
एक अक्षर देनेवाले को भी जो मनुष्य अपना गुरु नहीं मानता तो वह सैकड़ों बार कुत्ते की योनि में रह-रह कर अन्त में चाण्डाल होता है ॥१९॥