भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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९४ चाणक्यनीतिदर्पणं।

दोहा—इच्छित सब सुख केहि मिलत, जब सब दैवाधीन यहि ते संतोषहिं शरण, चहैं चतुर कहँ कीन ॥१४॥

अपने मन के अनुसार सुख किसे मिलता है। क्योंकि संसार का सब काम दैव के अधीन है। इसलिये जितना सुख प्राप्त हो जाय, उतने में ही सन्तुष्ट रहो ॥१४॥

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१५॥

दोहा—जैसे धेनु हजार में, वत्स जाय लखि मात । तैसे ही किन्हें करम, करतहिं के ढिग जात ॥१५॥

जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी ही माँ के पास जाता है। उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ( भाग्य ) अपने स्वामी के ही पास जा पहुँचता है ॥१५॥

अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम् । जनो दहति संसर्गाद्वनं संगविवर्जनात् ॥१६॥

दोहा—अनथिर कारज ते न सुख, जन औ वन दुहुँ माहिं । जन तेहि दाहै, सङ्ग ते, वन असंग ते दाहि ॥१६॥

जिसका कार्य अव्यवस्थित रहता है उसे न समाज में सुख है, न वन में। समाज में वह संसर्ग से दुःखी रहता है तो वन में संसर्ग त्याग से दुखी रहेगा ॥१६॥

यत् खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१७॥