भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 132 में से

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७ चाणक्यनीतिदर्पणः ९७

दोहा-और अगिन यश दुसह सो, जरि जरि दुर्जन नीच । आप न तैसी करि सकैं, तब तिहिं निन्दहिं बीच ॥११॥

नीच प्रकृति के लोग औरों के यशरूपी अग्नि से जलते रहते हैं उस पद तक तो पहुँचने की सामाथ्र्य उनमें रहती नहीं। इसलिए वे उसकी निन्दा करने लग जाते हैं ॥११॥

बन्धाय विषयासङ्गं मुक्त्यै निर्विषयं मनः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥१२॥

दोहा-विषय सङ्ग परिबन्ध है, विषय हीन निर्वाह । बंध मोक्ष इन दुहुंन को, कारण मनै न आन ॥१२॥

विषयों में मन का, लगाना ही बन्धन है और विषयों से मन को हटाना ही मुक्ति है । भाव यह कि मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का हेतु है ॥१२॥

देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥१३॥

दोहा-ब्रह्मज्ञान सो देह को, विगत भये अभिमान । जहाँ जहाँ मन जात है, तहाँ समाधिहिं जान ॥१३॥

परमात्मज्ञान से मनुष्य का जब देहाभिमान गल जाता है तो फिर जहाँ कहीं भी उसका मन जाता है तो उसके लिए सर्वत्र समाधि ही है ॥१३॥

ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् । दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत् ॥१४॥

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