चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ चाणक्यनीतिदर्पणः
राजा यदि धर्मात्मा होता है तो उसकी प्रजा भी धर्मात्मा होती है, राजा पापी होता है तो उसकी प्रजा भी पापी होती है। सम राजा होता है तो प्रजा भी सम ही होती है। कहने का भाव यह कि सब राजा का ही अनुसरण करते हैं। जैसा राजा होगा, उसकी प्रजा भी वैसी ही होगी ॥८॥
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ ९ ॥
दोहा--जीवन ही समुझैँ मरेउ, मनुजहिं धर्म विहीन । नहिं संशय निरजीव सो, मरेउ धर्म जेहि कीन ॥९॥
धर्मविहीन मनुष्य को मैं जीते मुर्दे की तरह मानता हूँ। जो धर्मात्मा था, पर मर गया तो वह वास्तव में दीर्घजीवी था ॥९॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥१०॥
दोहा--धर्म, अर्थ, अरु, मोक्ष, न एको है जासु । अजाकंठ कुचके सरिस, व्यर्थ जन्म ह तासु ॥१०॥
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसके पास नहीं है, तो बकरी के गले में लटकने-वाले स्तनों के समान उसका जन्म ही निरर्थक है ॥१०॥
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना । अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥११॥