चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ९५
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ॥ ६॥
दोहा–जाहि प्रीति भय ताहिको, प्रीति दुःख को पात्र ।
प्रीति मूल दुख त्यागि के, बसै तब सुख मात्र ॥६॥
जिसके हृदय में स्नेह (प्रीति) है, उसको भय है। जिसके पास स्नेह है, उसको दुःख है। जिसके हृदय में स्नेह है, उसी के पास तरह-तरह के दुःख रहते हैं, जो इसे त्याग देता है वह सुख से रहता
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा–पहिलहिं करत उपाय जो, परैंहु तुरत जेहि सूझ ।
दुहुन बढ़त सुख मरत जो, होनी गुणत असूझ ॥७॥
जो मनुष्य भविष्य में आनेवाली विपत्तिसे होशियार है और जिसकी बुद्धि समय पर काम कर जाती है ये दो मनुष्य आनन्द से आगे बढ़ते जाते हैं। इनके विपरीत जो भाग्य में लिखा होगा वह होगा, जो यह सोचकर बैठनेवाले हैं, उनका नाश निश्चित है।
राज्ञधर्मणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ ८ ॥
दोहा–नृप धरमी धरमी प्रजा, पाप पाप मति जान ।
सम्मत सम भूपति तथा, परगट प्रजा पिछान ॥८॥
१. 'राज्ञि धर्मिणि' इत्यपि पाठः ।