चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ | चाणक्यनीतिदर्पणः
आगे होनेवाली के ही लिए चिन्ता करो। समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिन्ता करते हैं ॥२॥
स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता ।
ज्ञातयः स्नान-पानाभ्यां वाक्यदानेन पंडिताः ॥३॥
दोहा—
देव सत्पुरुष औ पिता, करहिं सुभाव प्रसाद ।
स्नानपान लहि बन्धु सब, पंडित पाय सुवाद ॥३॥
देवता, भलेमानुष और बाप ये तीन स्वभाव देखकर प्रसन्न होते हैं। भाई वृन्द स्नान और पान से तथा वाक्य पालन से पण्डित लोग खुश होते हैं ॥३॥
आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि च सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥४॥
दोहा—
आयुर्बल धन कर्म औ, विद्या मरण बनाय ।
पाँचो रहते गर्भ में, जीवन के रचि जाय । ४॥
आयु, कर्म, सम्पत्ति, विद्या और मरण ये पाँच बातें तभी तय हो जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥४॥
अहो बत ! विचित्राणि चरितानि महात्मनाम् ।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च ॥५॥
दोहा—
अचरज चरित विचित्र अति, बड़े जनन के आहि ।
जो तृण सम सम्पति मिले, तासु भार नै जाहिं ॥५॥
अहो ! महात्माओं के चरित्र भी विचित्र होते हैं। वैसे तो ये लक्ष्मी को तिनके की तरह समझते हैं। और जब वह आ ही जाती हैं तो इनके भार से दबकर नम्र हो जाते हैं ॥५॥