भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः ९३

अवस्था के ढल जाने पर भी जो खल है वह खल ही बना रहता है क्योंकि अच्छी तरह पका हुआ इन्द्रायन मीठा-पन को नहीं प्राप्त होता ॥२३॥

इति चाणक्ये द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मुहूर्त्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा ।
न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना ॥ १ ॥

दोहा—वरु जीवै मुहूर्त्त भर, करिके शुचि सत्कर्म ।
नहिं भरि कल्पहु लोक दुहुँ, करत विरोध अधर्म ॥१॥

मनुष्य यदि उज्ज्वल कर्म करके एक दिन भी जिन्दा रहे तो उसका जीवन सफल है। इसके बदले इहलोक और परलोक इन दोनों के विरुद्ध कार्य करके कल्प भर जिवे तो वह जीना अच्छा नहीं है ॥१॥

गते शोको न कर्त्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्त्तमानेन कालेन प्रवर्त्तन्ते विचक्षणाः ॥ २ ॥

दोहा—गत वस्तुहिं सोचै नहीं, गुनै न होनी हार ।
कार्य करहिं परवीन जन, आय परे अनुसार ॥२॥

जो बात बीत गयी उसके लिए सोच न करो। और न