चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ चाणक्यनीतिदर्पणः
करे। चिन्ता करे केवल धर्म की क्योंकि आहार तो मनुष्य के पैदा होने के साथ ही नियत हो जाया करता है ॥२०॥
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणे तथा ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखीभवेत् ॥२१॥
**दोहा—**लेन देन धन अन्न के, विद्या पढ़ने माहिं ।
भोजन सखा विवाह में, तजै लाज सुख ताहिं ॥२१॥
जो मनुष्य धन तथा धान्य के व्यवहार में, पढ़ने-लिखने में, भोजन में और लेन-देन में निर्लज्ज होता है, वही सुखी रहता है ॥२१॥
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥२२॥
**दोहा—**एक एक जल बुन्द के, परत घटहु भरि जाय ।
सब विद्या धन धर्म को, कारण यही कहाय ॥२२॥
धीरे-धीरे एक-एक बूँद पानी से घड़ा भर जाता है । यही बात विद्या, धर्म और धन के लिए लागू होती है । तात्पर्य यह कि उपयुक्त वस्तुओं के संग्रह में जल्दी न करे । करता चले धीरे-धीरे कभी पूरा हो ही जायगा ॥२२॥
वयसः परिणामेऽपि यः खलः खल एव सः ।
सम्पक्वमपि माधुर्य नापयातीन्द्रवारुणम् ॥२३॥
**दोहा—**बीत गयेहू उमिर के, खल खलहीं रहि जाय ।
पकेहू मिठाई गुण कहूँ, नाहिं इन्द्रारू पाय ॥२३॥