चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ९१
पुरुष का हित औषधि से होता है और धर्म मरे का उपकार करता है ॥१७॥
विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम् । अनृतं द्यूतकारेभ्यःस्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम् ॥१८॥
दोहा–राजसुत से विनय अरु, बुध से सुन्दर बात । झूठ जुआरिन से कपट, स्त्री से सीखी जात ॥१८॥
मनुष्य को चाहिए कि विनय (तहजीब) राजकुमारों से, अच्छी-अच्छी बातें पण्डितों से, झुठाई जुआरियों से और छल-कपट स्त्रियों से सीखे ॥ १८ ॥
अनालोक्यं व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः । आर्तः स्त्रीसर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति ॥१६॥
दोहा–बिन विचार खर्चा करे, झगरे बिनहिं सहाय । आतुर सब तिय में रहै, सोई बेगि नसाय ॥१९॥
बिना समझे-बूझे खर्च करनेवाला अनाथ झगड़ालू, और सब तरह की स्त्रियों के लिए बेचैन रहनेवाला मनुष्य देखते-देखते चौपट हो जाता है ॥१९॥
नाऽऽहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥२०॥
दोहा–नहिं आहार चिन्तहिं सुमति, चिन्तहिं धर्म हिं एक । होहिं साथ ही जनम के, नरहिं अहार अनेक ॥२०॥
विद्वान् को चाहिए कि वह भोजनकी चिन्ता न किया