चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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चाणक्यनीतिदर्पणः
में पवित्रता, शास्त्रों में विज्ञता, रूप में सुन्दरता और शिवजी में भक्ति, ये गुण केवल आप ही में हैं ॥१५॥
काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशीक्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः । कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः नैस्तांस्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमादीयते ॥१६॥
कवित्त—कल्पवृक्ष काठ अंचल सुमेरु चिन्तामणिन भी जाति पत्थर की जानिये। सूरुज में उष्णता अरु कलाहीन चन्द्रमा है सागरहू का जल खारो यह जानिये। कामदेव नष्टदेव अरु राजा बली दैत्यदेव कामधेनु गौ को भी पशु मानिये। उपमा श्रीराम की इन से कुछ तुलैना और कौन वस्तु जिसे उपमा बखानिये ॥१६॥
कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरु अचल है, चिन्तामणि पत्थर है, सूर्य की किरणें तीखी हैं, चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, समुद्र खारा है, कामदेव शरीर रहित है, बलि दैत्य है और कामधेनु पशु है। इसलिए इनके साथ तो मैं आपकी तुलना नहीं कर सकता। तब हे रघुपते ! किसके साथ आपकी उपमा दी जाय ? ॥१६॥
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्म मित्रं मृतस्य च ॥
दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घरमें नारी मित्र । रोगिहिं औषधि मित्र है, मरे धर्म ही मित्र ॥१७॥
प्रवास में विद्या हित करती है, घर में स्त्री है, रोगग्रस्त