चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें. चाणक्यनीतिदर्पणः ४९
मातृवत्परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पंडितः ॥१४॥ दोहा—पर धन माटी के सरिस, परतिय माता मेष । आपु सरीखे जगत सब, जो देखे सो देख ॥१४॥
जो मनुष्य परायी स्त्री को माता के समान समझता, पराया धन, मिट्टी के ढेले के समान और और अपने ही तरह सब प्राणियों के सुख-दुःख समझता वही पण्डित है ॥१४॥
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातृता रूपे सुन्दरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति भो राघवः ॥
कविता-धर्म माहिं रुचि मुख मीठी बानी दान वचन शक्ति मित्र संग नहिं ठगने बान है । वृद्धमाहिं नम्रता अरु मन में गम्भीरता शुद्ध है आचरण गुण विचार विमल हैं । शास्त्र का विशेष ज्ञान रूप भी सुहावन है शिवजी के भजन का सब काल ध्यान है । कहे पुष्पवन्त ज्ञानी राघव बीच मानों सब ओर इक ठौर कहिन को न मान है ॥१५॥
वशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं—हे राघव ! धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता, दान में उत्साह, मित्रों में निश्छल व्यवहार, गुरुजनों के समक्ष नम्रता, चित्त में गम्भीरता, आचार