चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ चाणक्यनीतिदर्पणः
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥११॥
सोरठा—सत्य मातु पितु ज्ञान, सखा दया भ्राता धरम ।
तिया शांति सुत जान, क्षमा यही षट् बन्धु मम ॥११॥
कोई ज्ञानी किसी के प्रश्न का उत्तर देता हुआ कहता है कि सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है धर्म भाई है, दया मित्र है, शांति स्त्री है और क्षमा पुत्र है, ये ही मेरे छः बान्धव हैं ॥११॥
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥१२॥
सोरठा—है अनित्य यह देह, विभव सदा नाहिं थिर है ।
निकट मृत्यु नित हेय, चहिए कीन संग्रह धरम ॥१२॥
शरीर क्षणभंगुर है, धन भी सदा रहनेवाला नहीं है, मृत्यु बिल्कुल समीप विद्यमान है। इसलिए धर्म का संग्रह करो ।
निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः ।
पत्युत्साहयुता भार्या अहं कृष्ण ! रणोत्सवः ॥१३॥
दोहा—पति उत्सव युवतीन को, गौवन को नवघास ।
नेवत द्विजन को हे हरि, मोहिं उत्सव रणवास ॥१३॥
ब्राह्मण का उत्सव है निमन्त्रण, गौओं का उत्सव है नई घास । स्त्री का उत्सव है पति का आगमन, किन्तु हे कृष्ण ! मेरा उत्सव है युद्ध ॥१३॥