चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ८७
हैं ? कैसे तुम जीवत कहो मोसों मीत ! विष कृमिन्याय कर लीज निरधार है ॥ ९ ॥
कोई पथिक किसी नगर में जाकर किसी सज्जन से पूछता है हे भाई ! नगर में कौन बड़ा है ? उसने उत्तर दिया—बड़े तो ताड़ के पेड़ हैं। ( प्रश्न ) दाता कौन है ? (उत्तर) धोबी, जो सबेरे कपड़े ले जाता और शाम को वापस दे जाता है । ( प्रश्न ) यहाँ चतुर कौन है ? (उत्तर) पराई दौलत ऐंठने में यहाँ सभा चतुर हैं । (प्रश्न) तो फिर हे सखे ! तुम यहाँ जीते कैसे हो ? ( उत्तर ) उसी तरह जीता हूँ जैसे कि विष का कीड़ा विष में रहता हुआ भी जिन्दा रहता है ॥ ९ ॥
न विप्रपादोदकपंकजानि
न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि ।
स्वाहास्वधाकारविवर्जितानि
श्मशानतुल्यानिगृहाणि तानि ॥१०॥
दोहा—
विप्रचरण के उदक से, होत जहाँ नहिं कीच ।
वेद ध्वनि स्वाहा नहीं, वे गृह मर्घट नीच ॥
जिस घर में ब्राह्मणों के पैर धुलने से कीचड़ नहीं होता, जिसके यहाँ वेद और शास्त्रों की ध्वनि का गर्जन नहीं और जिस घर में स्वाहा स्वधा का कभी उच्चारण नहीं होता, ऐसे घरों को श्मशान के तुल्य समझना चाहिए ॥ १० ॥