चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ चाणक्यनीतिदर्पणः
माटिहि बास कछु फूलन धार पावै ।
माटी सुवास कहुँ फूल नहिं बसावै ॥ ७ ॥
सत्संग से दुष्ट सज्जन हो जाते हैं । पर सज्जन उनके संग से दुष्ट नहीं होते । जैसे फूल की सुगंधि को मिट्टी अपनाती है, पर फूल मिट्टी की सुगन्धि को नहीं अपनाते ॥ ७ ॥
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थीभूता हि साधवः ।
कालेन फलते तीर्थं सद्यः साधुसमागमः ॥८॥
दोहा—साधू दर्शन पुण्य है, साधु तीर्थ के रूप ।
काल पाय तीरथ फलै, तुरतहिं साधु अनूप ॥ ८ ॥
सज्जनों का दर्शन बड़ा पुनीत होता है । क्योंकि साधुजन तीर्थ के समान रहते हैं । बल्कि तीर्थ तो कुछ समय बाद फल देते हैं पर सज्जनों का संत्संग तत्काल फलदायक है ॥ ८ ॥
विप्राऽस्मिन्नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणां गणः
को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि ।
को दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोऽपि दक्षो जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे विष कृमि न्यायेन जीवाम्यहम् ।
कवित्त—कहौ या नगर में महान् है कौन ? विप्र ! तारन के वृक्षन के कतार के कतार हैं । दाता कहो कौन है ? रजक देत साँझ आनि धोय शुभ वस्त्र को जो देत सकार है । दक्ष कहौ कौन है ? प्रत्यक्ष सबही हैं दक्ष हरने को कुशल परायो धनदार हैं