चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
४४ चाणक्यनीतिदर्पणः
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥११॥
सोरठा—सत्य मातु पितु ज्ञान, सखा दया भ्राता धरम ।
तिया शांति सुत जान, क्षमा यही षट् बन्धु मम ॥११॥
कोई ज्ञानी किसी के प्रश्न का उत्तर देता हुआ कहता है कि सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है धर्म भाई है, दया मित्र है, शांति स्त्री है और क्षमा पुत्र है, ये ही मेरे छः बान्धव हैं ॥११॥
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥१२॥
सोरठा—है अनित्य यह देह, विभव सदा नाहिं थिर है ।
निकट मृत्यु नित हेय, चहिए कीन संग्रह धरम ॥१२॥
शरीर क्षणभंगुर है, धन भी सदा रहनेवाला नहीं है, मृत्यु बिल्कुल समीप विद्यमान है। इसलिए धर्म का संग्रह करो ।
निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः ।
पत्युत्साहयुता भार्या अहं कृष्ण ! रणोत्सवः ॥१३॥
दोहा—पति उत्सव युवतीन को, गौवन को नवघास ।
नेवत द्विजन को हे हरि, मोहिं उत्सव रणवास ॥१३॥
ब्राह्मण का उत्सव है निमन्त्रण, गौओं का उत्सव है नई घास । स्त्री का उत्सव है पति का आगमन, किन्तु हे कृष्ण ! मेरा उत्सव है युद्ध ॥१३॥
. चाणक्यनीतिदर्पणः ४९
मातृवत्परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पंडितः ॥१४॥ दोहा—पर धन माटी के सरिस, परतिय माता मेष । आपु सरीखे जगत सब, जो देखे सो देख ॥१४॥
जो मनुष्य परायी स्त्री को माता के समान समझता, पराया धन, मिट्टी के ढेले के समान और और अपने ही तरह सब प्राणियों के सुख-दुःख समझता वही पण्डित है ॥१४॥
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातृता रूपे सुन्दरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति भो राघवः ॥
कविता-धर्म माहिं रुचि मुख मीठी बानी दान वचन शक्ति मित्र संग नहिं ठगने बान है । वृद्धमाहिं नम्रता अरु मन में गम्भीरता शुद्ध है आचरण गुण विचार विमल हैं । शास्त्र का विशेष ज्ञान रूप भी सुहावन है शिवजी के भजन का सब काल ध्यान है । कहे पुष्पवन्त ज्ञानी राघव बीच मानों सब ओर इक ठौर कहिन को न मान है ॥१५॥
वशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं—हे राघव ! धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता, दान में उत्साह, मित्रों में निश्छल व्यवहार, गुरुजनों के समक्ष नम्रता, चित्त में गम्भीरता, आचार
९०
चाणक्यनीतिदर्पणः
में पवित्रता, शास्त्रों में विज्ञता, रूप में सुन्दरता और शिवजी में भक्ति, ये गुण केवल आप ही में हैं ॥१५॥
काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशीक्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः । कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः नैस्तांस्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमादीयते ॥१६॥
कवित्त—कल्पवृक्ष काठ अंचल सुमेरु चिन्तामणिन भी जाति पत्थर की जानिये। सूरुज में उष्णता अरु कलाहीन चन्द्रमा है सागरहू का जल खारो यह जानिये। कामदेव नष्टदेव अरु राजा बली दैत्यदेव कामधेनु गौ को भी पशु मानिये। उपमा श्रीराम की इन से कुछ तुलैना और कौन वस्तु जिसे उपमा बखानिये ॥१६॥
कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरु अचल है, चिन्तामणि पत्थर है, सूर्य की किरणें तीखी हैं, चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, समुद्र खारा है, कामदेव शरीर रहित है, बलि दैत्य है और कामधेनु पशु है। इसलिए इनके साथ तो मैं आपकी तुलना नहीं कर सकता। तब हे रघुपते ! किसके साथ आपकी उपमा दी जाय ? ॥१६॥
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्म मित्रं मृतस्य च ॥
दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घरमें नारी मित्र । रोगिहिं औषधि मित्र है, मरे धर्म ही मित्र ॥१७॥
प्रवास में विद्या हित करती है, घर में स्त्री है, रोगग्रस्त
चाणक्यनीतिदर्पणः ९१
पुरुष का हित औषधि से होता है और धर्म मरे का उपकार करता है ॥१७॥
विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम् । अनृतं द्यूतकारेभ्यःस्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम् ॥१८॥
दोहा–राजसुत से विनय अरु, बुध से सुन्दर बात । झूठ जुआरिन से कपट, स्त्री से सीखी जात ॥१८॥
मनुष्य को चाहिए कि विनय (तहजीब) राजकुमारों से, अच्छी-अच्छी बातें पण्डितों से, झुठाई जुआरियों से और छल-कपट स्त्रियों से सीखे ॥ १८ ॥
अनालोक्यं व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः । आर्तः स्त्रीसर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति ॥१६॥
दोहा–बिन विचार खर्चा करे, झगरे बिनहिं सहाय । आतुर सब तिय में रहै, सोई बेगि नसाय ॥१९॥
बिना समझे-बूझे खर्च करनेवाला अनाथ झगड़ालू, और सब तरह की स्त्रियों के लिए बेचैन रहनेवाला मनुष्य देखते-देखते चौपट हो जाता है ॥१९॥
नाऽऽहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥२०॥
दोहा–नहिं आहार चिन्तहिं सुमति, चिन्तहिं धर्म हिं एक । होहिं साथ ही जनम के, नरहिं अहार अनेक ॥२०॥
विद्वान् को चाहिए कि वह भोजनकी चिन्ता न किया
९२ चाणक्यनीतिदर्पणः
करे। चिन्ता करे केवल धर्म की क्योंकि आहार तो मनुष्य के पैदा होने के साथ ही नियत हो जाया करता है ॥२०॥
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणे तथा ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखीभवेत् ॥२१॥
**दोहा—**लेन देन धन अन्न के, विद्या पढ़ने माहिं ।
भोजन सखा विवाह में, तजै लाज सुख ताहिं ॥२१॥
जो मनुष्य धन तथा धान्य के व्यवहार में, पढ़ने-लिखने में, भोजन में और लेन-देन में निर्लज्ज होता है, वही सुखी रहता है ॥२१॥
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥२२॥
**दोहा—**एक एक जल बुन्द के, परत घटहु भरि जाय ।
सब विद्या धन धर्म को, कारण यही कहाय ॥२२॥
धीरे-धीरे एक-एक बूँद पानी से घड़ा भर जाता है । यही बात विद्या, धर्म और धन के लिए लागू होती है । तात्पर्य यह कि उपयुक्त वस्तुओं के संग्रह में जल्दी न करे । करता चले धीरे-धीरे कभी पूरा हो ही जायगा ॥२२॥
वयसः परिणामेऽपि यः खलः खल एव सः ।
सम्पक्वमपि माधुर्य नापयातीन्द्रवारुणम् ॥२३॥
**दोहा—**बीत गयेहू उमिर के, खल खलहीं रहि जाय ।
पकेहू मिठाई गुण कहूँ, नाहिं इन्द्रारू पाय ॥२३॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ९३
अवस्था के ढल जाने पर भी जो खल है वह खल ही बना रहता है क्योंकि अच्छी तरह पका हुआ इन्द्रायन मीठा-पन को नहीं प्राप्त होता ॥२३॥
इति चाणक्ये द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
मुहूर्त्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा ।
न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना ॥ १ ॥
दोहा—वरु जीवै मुहूर्त्त भर, करिके शुचि सत्कर्म ।
नहिं भरि कल्पहु लोक दुहुँ, करत विरोध अधर्म ॥१॥
मनुष्य यदि उज्ज्वल कर्म करके एक दिन भी जिन्दा रहे तो उसका जीवन सफल है। इसके बदले इहलोक और परलोक इन दोनों के विरुद्ध कार्य करके कल्प भर जिवे तो वह जीना अच्छा नहीं है ॥१॥
गते शोको न कर्त्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्त्तमानेन कालेन प्रवर्त्तन्ते विचक्षणाः ॥ २ ॥
दोहा—गत वस्तुहिं सोचै नहीं, गुनै न होनी हार ।
कार्य करहिं परवीन जन, आय परे अनुसार ॥२॥
जो बात बीत गयी उसके लिए सोच न करो। और न
९४ | चाणक्यनीतिदर्पणः
आगे होनेवाली के ही लिए चिन्ता करो। समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिन्ता करते हैं ॥२॥
स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता ।
ज्ञातयः स्नान-पानाभ्यां वाक्यदानेन पंडिताः ॥३॥
दोहा—
देव सत्पुरुष औ पिता, करहिं सुभाव प्रसाद ।
स्नानपान लहि बन्धु सब, पंडित पाय सुवाद ॥३॥
देवता, भलेमानुष और बाप ये तीन स्वभाव देखकर प्रसन्न होते हैं। भाई वृन्द स्नान और पान से तथा वाक्य पालन से पण्डित लोग खुश होते हैं ॥३॥
आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि च सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥४॥
दोहा—
आयुर्बल धन कर्म औ, विद्या मरण बनाय ।
पाँचो रहते गर्भ में, जीवन के रचि जाय । ४॥
आयु, कर्म, सम्पत्ति, विद्या और मरण ये पाँच बातें तभी तय हो जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥४॥
अहो बत ! विचित्राणि चरितानि महात्मनाम् ।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च ॥५॥
दोहा—
अचरज चरित विचित्र अति, बड़े जनन के आहि ।
जो तृण सम सम्पति मिले, तासु भार नै जाहिं ॥५॥
अहो ! महात्माओं के चरित्र भी विचित्र होते हैं। वैसे तो ये लक्ष्मी को तिनके की तरह समझते हैं। और जब वह आ ही जाती हैं तो इनके भार से दबकर नम्र हो जाते हैं ॥५॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ९५
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ॥ ६॥
दोहा–जाहि प्रीति भय ताहिको, प्रीति दुःख को पात्र ।
प्रीति मूल दुख त्यागि के, बसै तब सुख मात्र ॥६॥
जिसके हृदय में स्नेह (प्रीति) है, उसको भय है। जिसके पास स्नेह है, उसको दुःख है। जिसके हृदय में स्नेह है, उसी के पास तरह-तरह के दुःख रहते हैं, जो इसे त्याग देता है वह सुख से रहता
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा–पहिलहिं करत उपाय जो, परैंहु तुरत जेहि सूझ ।
दुहुन बढ़त सुख मरत जो, होनी गुणत असूझ ॥७॥
जो मनुष्य भविष्य में आनेवाली विपत्तिसे होशियार है और जिसकी बुद्धि समय पर काम कर जाती है ये दो मनुष्य आनन्द से आगे बढ़ते जाते हैं। इनके विपरीत जो भाग्य में लिखा होगा वह होगा, जो यह सोचकर बैठनेवाले हैं, उनका नाश निश्चित है।
राज्ञधर्मणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ ८ ॥
दोहा–नृप धरमी धरमी प्रजा, पाप पाप मति जान ।
सम्मत सम भूपति तथा, परगट प्रजा पिछान ॥८॥
१. 'राज्ञि धर्मिणि' इत्यपि पाठः ।
९६ चाणक्यनीतिदर्पणः
राजा यदि धर्मात्मा होता है तो उसकी प्रजा भी धर्मात्मा होती है, राजा पापी होता है तो उसकी प्रजा भी पापी होती है। सम राजा होता है तो प्रजा भी सम ही होती है। कहने का भाव यह कि सब राजा का ही अनुसरण करते हैं। जैसा राजा होगा, उसकी प्रजा भी वैसी ही होगी ॥८॥
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ ९ ॥
दोहा--जीवन ही समुझैँ मरेउ, मनुजहिं धर्म विहीन । नहिं संशय निरजीव सो, मरेउ धर्म जेहि कीन ॥९॥
धर्मविहीन मनुष्य को मैं जीते मुर्दे की तरह मानता हूँ। जो धर्मात्मा था, पर मर गया तो वह वास्तव में दीर्घजीवी था ॥९॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥१०॥
दोहा--धर्म, अर्थ, अरु, मोक्ष, न एको है जासु । अजाकंठ कुचके सरिस, व्यर्थ जन्म ह तासु ॥१०॥
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसके पास नहीं है, तो बकरी के गले में लटकने-वाले स्तनों के समान उसका जन्म ही निरर्थक है ॥१०॥
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना । अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥११॥
७ चाणक्यनीतिदर्पणः ९७
दोहा-और अगिन यश दुसह सो, जरि जरि दुर्जन नीच । आप न तैसी करि सकैं, तब तिहिं निन्दहिं बीच ॥११॥
नीच प्रकृति के लोग औरों के यशरूपी अग्नि से जलते रहते हैं उस पद तक तो पहुँचने की सामाथ्र्य उनमें रहती नहीं। इसलिए वे उसकी निन्दा करने लग जाते हैं ॥११॥
बन्धाय विषयासङ्गं मुक्त्यै निर्विषयं मनः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥१२॥
दोहा-विषय सङ्ग परिबन्ध है, विषय हीन निर्वाह । बंध मोक्ष इन दुहुंन को, कारण मनै न आन ॥१२॥
विषयों में मन का, लगाना ही बन्धन है और विषयों से मन को हटाना ही मुक्ति है । भाव यह कि मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का हेतु है ॥१२॥
देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥१३॥
दोहा-ब्रह्मज्ञान सो देह को, विगत भये अभिमान । जहाँ जहाँ मन जात है, तहाँ समाधिहिं जान ॥१३॥
परमात्मज्ञान से मनुष्य का जब देहाभिमान गल जाता है तो फिर जहाँ कहीं भी उसका मन जाता है तो उसके लिए सर्वत्र समाधि ही है ॥१३॥
ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् । दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत् ॥१४॥
९४ चाणक्यनीतिदर्पणं।
दोहा—इच्छित सब सुख केहि मिलत, जब सब दैवाधीन यहि ते संतोषहिं शरण, चहैं चतुर कहँ कीन ॥१४॥
अपने मन के अनुसार सुख किसे मिलता है। क्योंकि संसार का सब काम दैव के अधीन है। इसलिये जितना सुख प्राप्त हो जाय, उतने में ही सन्तुष्ट रहो ॥१४॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१५॥
दोहा—जैसे धेनु हजार में, वत्स जाय लखि मात । तैसे ही किन्हें करम, करतहिं के ढिग जात ॥१५॥
जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी ही माँ के पास जाता है। उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ( भाग्य ) अपने स्वामी के ही पास जा पहुँचता है ॥१५॥
अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम् । जनो दहति संसर्गाद्वनं संगविवर्जनात् ॥१६॥
दोहा—अनथिर कारज ते न सुख, जन औ वन दुहुँ माहिं । जन तेहि दाहै, सङ्ग ते, वन असंग ते दाहि ॥१६॥
जिसका कार्य अव्यवस्थित रहता है उसे न समाज में सुख है, न वन में। समाज में वह संसर्ग से दुःखी रहता है तो वन में संसर्ग त्याग से दुखी रहेगा ॥१६॥
यत् खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१७॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ९९
दोहा—जिमि खोदत ही ते मिले, भूतल के मधि वारि ।
तैसेहि सेवा के किये, गुरु विद्या मिलि धारि ॥१७.।
जैसे फावड़े से खोदने पर पृथ्वी से जल निकल आता है । उसी तरह किसी गुरु के पास विद्यमान विद्या उसकी सेवा करने से प्राप्त हो जाती है ॥१७ ॥
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथाऽपि सुधियश्चार्या सुविचार्यैव कुर्वते ॥१८॥
दोहा—फलसिधि कर्म अधीन है, बुद्धि कर्म अनुसार ।
तौहू सुमति महान जन, करम करहिं सुविचार ॥१८॥
यद्यपि प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार ही फल प्राप्त होता है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है । फिर भी बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ-बूझ कर ही कोई काम करते हैं ॥१८॥
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाऽभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते ॥१९॥
दोहा—एक अक्षरदातुहु गुरुहि, जो नर वन्दे नाहिं ।
जन्म सैकड़ों श्वान ह्वै, जनै चण्डालन माहिं ॥१९॥
एक अक्षर देनेवाले को भी जो मनुष्य अपना गुरु नहीं मानता तो वह सैकड़ों बार कुत्ते की योनि में रह-रह कर अन्त में चाण्डाल होता है ॥१९॥
| १०० | चाणक्यनीतिदर्पणः |
|---|
युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः ।
साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥२०॥
दोहा—सात सिन्धु कल्पान्त चलु, मेरु चलै युग अन्त ।
परे प्रयोजन ते कबहुँ, नहिं चलते हैं सन्त ॥२०॥
युग का अन्त हो जाने पर सुमेरु पर्वत डिग जाता है । कल्प का अन्त होने पर सातो सागर भी चंचल हो उठते हैं, पर सज्जन लोग स्वीकार किये हुये मार्ग से विचलित नहीं होते ॥२०॥
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंख्या विधीयते ॥२१॥
म०छ०--अन्न बारि चारु बोल तीनि रत्न भू अमोल ।
मूढ़ लोग के पषान टूक रत्न के पषान ॥२१ ॥
सच पूछो तो पृथिवी भर में तीन ही रत्न हैं--अन्न, जल और मीठी-मीठी बातें । लेकिन बेवकूफ लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं ॥२१॥
इति चाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।
दारिद्र्य-रोग-दुःखानि बन्धनव्यसनानि च ॥१॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०१
म०छ०--निर्धनत्व दुःख बन्ध और विपत्ति सात ।
है स्वकर्म वृक्ष जात ये फलैं धरैक गात ॥१॥
मनुष्य अपने द्वारा पल्लवित अपराध रूपी वृक्ष के ये ही फल फलते हैं--दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन ( कैद ) और व्यसन ॥१॥
पुनर्वित्तम्पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही ।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥२॥
म०छ०--फेरि वित्त फेरि मित्त, फेरि तो धराहु नित्त ।
फेरि फेरि सर्व एह, ये मानुषी मिलै न देह ॥२॥
गया हुआ धन वापस मिल सकता है, रूठा हुआ मित्र भी राजी किया जा सकता है, हाथ से निकली हुई स्त्री भी फिर वापस आसकती है और छीनी हुई जमीन भी फिर मिल सकती है, पर गया हुआ यह शरीर वापस नहीं मिल सकता ॥२॥
बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।
वर्षन्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥३॥
म०छ०--एक ह्वै अनेक लोग वीर्य शत्रु जीत योग ।
मेघ धारि बारि जेत घास ढेर बारि देत ॥३॥
बहुत प्राणियों का सङ्गठित बल शत्रु को परास्त कर देता है, प्रचण्ड वेग के साथ बरसते हुए मेघ को सङ्गठन के बल से क्षुद्र तिनके हरा देते हैं ॥३॥
१०२ चाणक्यनीतिदर्पणः
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि ।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः ॥४॥
म०छ०-थोर तेल वारि माहिं । गुप्तहू खलानि माहिं ।
दान शास्त्र पात्रज्ञानि । ये बड़े स्वभाव आहि ॥४॥
जल में तेल, दुष्ट मनुष्य में कोई गुप्त बात, सुपात्र में थोड़ा भी दान और समझदार मनुष्य के पास शास्त्र, ये थोड़े होते हुए भी पात्र के प्रभाव से तुरन्त फैल जाते हैं ॥४॥
धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत् ।
सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥५॥
म०छ०-धर्म वीरता मशान । रोग माहिं जौन ज्ञान ।
जो रहे वही सदाइ । बन्ध को न मुक्त हांइ ॥५॥
कोई धार्मिक आख्यान सुनने पर, श्मशान में और रुग्णावस्था में मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि हमेशा रहे तो कौन मनुष्य मोक्षपद न प्राप्त कर ले ? ॥५॥
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।
तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ॥६॥
म०छ०-आदि चूकि अन्त शोक । जो रहे विचारि दोष ।
पूर्वही बनै जो बैस । कौन को मिले न ऐश ॥६॥
कोई बुरा काम करने पर पछतावे के समय मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि पहले ही से रहे तो कौन मनुष्य उन्नत न हो जाय ॥६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०३
दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना बसुन्धरा ॥७॥
म०छ०--दान नय विनय नगीच शूरता विज्ञान बीच । कीजिये अचर्ज नाहिं, रत्न ढेर भूमि माहिं ॥७॥
दान, तप, वीरता, विज्ञान और नीति, इनके विषय में कभी किसी को विस्मित होना ही नहीं चाहिये । क्योंकि पृथ्व्री में बहुत से रत्न भरे पड़े हैं ॥७॥
दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः । यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥८॥
म०छ०--दूरहू बसै नगीच, जासु जौन चित्त बीच । जो न चित्त जासु पूर । है समीपहूँ सो दूर ॥८॥
जो (मनुष्य) जिसके हृदय में स्थान किये है, वह दूर रहकर भी दूर नहीं है । जो जिसके हृदय में नहीं रहता, वह समीप रहने पर भी दूर है ॥८॥
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम् । व्याधो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ॥६॥
म०छ०--जाहिते चहे सुपास, मीठी बोली तासु पास । व्याध मारिबे मृगान, मंत्र गावती सुगान ॥९॥
मनुष्य को चाहिए कि जिस किसी से अपना भला चाहता हो उससे हमेशा मीठी बातें करे । क्योंकि बहेलिया जब हिरन का शिकार करने जाता है तो बड़े मीठे स्वर से गाता है ॥९॥
१०४ | चाणक्यनीतिदर्पणः
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः ।
सेव्यतां मध्यभागेन राजवह्निगुरुस्त्रियः ॥१०॥
म०छ०--अति पास नाश हेत, दूरहू ते फल न हेत ।
सेवनीय मध्य भाग, गुरु, भूप नारि आग ॥१०॥
राजा, अग्नि, गुरु और स्त्रियाँ--इनके पास अधिक रहने पर विनाश निश्चित है और दूर रहा जाय तो कुछ मतलब नहीं निकलता । इसलिए इन चारों की आराधना ऐसे करे कि न ज्यादा पास रहे न ज्यादा दूर ॥१०॥
अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पो राजकुलानि च ।
नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥११॥
म०छ०--अग्नि सर्प मूर्ख नारि, राजवंश और वारि ।
यत्न साथ सेवनीय, सद्य ये हरैं छ जीय ॥११॥
आग, पानी, मूर्ख, नारी और राज-परिवार इनकी यत्न के साथ आराधना करै । क्योंकि ये सब तुरन्त प्राण लेने वाले जीव हैं ॥११॥
स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्मः स जीवति ।
गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ॥१२॥
म०छ०--जीवतो गुणी जो होय, या सुधर्म युक्त जीव ।
धर्म और गुणी न जासु, जीवनो सुव्यर्थ तासु ॥१२॥
जो गुणी है, उसका जीवन सफल है या जो धर्मात्मा है, उसका जन्म सार्थक है । इसके विपरीत गुण और धर्म से विहीन जीवन निष्प्रयोजन है ॥१२॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०५
यदिच्छसि वशीकर्त्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१३॥
मं०छ०—चाहते वशै जो कीन, एक कर्म लोक तीन । पन्द्रहों के तों मुखान, जान तो बहार आन ॥१३॥
यदि तुम केवल एक काम से सारे संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो पन्द्रह मुखवाले राक्षस के सामने चरती हुई इन्द्रयरूपी गैयों को उधरसे हटा लो । ये पन्द्रह मुख कौन हैं—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । मुख, पाँव, लिंग और गुदा, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ। रूप, रस, गन्ध शब्द और स्पर्श, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं ॥१३॥
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥१४॥
सो०—प्रिय स्वभाव अनुकूल, योग प्रसंगे वचन पुनि । निजबल के समतूल, कोष जान पण्डित सोई ॥१४॥
जो मनुष्य प्रसंगानुसार बात, प्रकृति के अनुकूल प्रेम और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है ॥१४॥
एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः । कुणपं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥१५॥
सो०—वस्तु एक ही होय, तीनि तरह देखी गई । रति मृत माँसू सोय, कामी योगी कुकुर सो ॥१५॥
एक स्त्री के शरीर को तीन जीव तीन दृष्टि से देखते हैं—योगी
१०६ . चाणक्यनीतिदर्पणः
उसे बदबूदार मुर्दे के रूप में देखते हैं कामी उसे कामिनी समझता है और कुत्ता उसे मांसपिण्ड जानता है ॥१५॥
सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम् ।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१६॥
सो०--सिद्धौषध धौ धर्म, मैथुन कुवचन भोजनो ।
अपने घरको मर्म, चतुर नहीं प्रगठित करै ॥१६॥
बुद्धिमान् को चाहिए कि इन बातों को किसी से न जाहिर करे—अच्छी तरह तैयार की हुई औषधि, धर्म, अपने घर का दोष, दूषित भोजन और निंद्य किं वदन्ती बचन ॥१६॥
तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।
यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक् प्रवर्तते ॥१७॥
सो०- तौलौं मौने ठानि, कोकिलहू दिन काटते ।
जौलौं आनन्द खानि, सब को वाणी होत है ॥१७॥
कोयलें तब तक चुपचाप दिन बिता देती हैं जबतक कि वे सब लोगों के मनको आनन्दित करनेवाली वाणी नहीं बोलती हैं। १७।
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् ।
सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति ॥१८॥
सो०--धर्म धान्य धनज्ञानि, गुरु वच औषध पाँच यह ।
धार रक्षण अरु हित जानि, अन्यथा जीवन नाहिं यह ॥१८॥
धर्म, धन, अन्न, गुरु का वचन और औषधि इन वस्तुओं को सावधानी के साथ अपनावे और उनके अनुसार चले । जो ऐसा नहीं करता, वह नहीं जीता है ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०७
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥१९॥
सो०--तजौ दुष्ट सहवास, भजो साधु सङ्गम रुचिर । करौ पुण्य परकास, हरि सुमिरो जग नित्यहिं ॥१९॥
दुष्टों का साथ छोड़ दो, भले लोगों के समागम में रहो, अपने दिन और रात को पवित्र करके बिताओ और इस अनित्य संसार में नित्य ईश्वर का स्मरण करते रहो ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
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अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनेः ॥१॥
दोहा--जासु चित्त सब जन्तु पर, गलित दया रस माह । तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह ॥१॥
जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ? ॥१॥
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥२॥
दोहा--एकौ अक्षर जो गुरु, शिष्यहिं देत जनाय । भूमि माहि धन नाहिं वह, जोदे अनृण कहाय ॥२॥