चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १०७
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥१९॥
सो०--तजौ दुष्ट सहवास, भजो साधु सङ्गम रुचिर । करौ पुण्य परकास, हरि सुमिरो जग नित्यहिं ॥१९॥
दुष्टों का साथ छोड़ दो, भले लोगों के समागम में रहो, अपने दिन और रात को पवित्र करके बिताओ और इस अनित्य संसार में नित्य ईश्वर का स्मरण करते रहो ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
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अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनेः ॥१॥
दोहा--जासु चित्त सब जन्तु पर, गलित दया रस माह । तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह ॥१॥
जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ? ॥१॥
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥२॥
दोहा--एकौ अक्षर जो गुरु, शिष्यहिं देत जनाय । भूमि माहि धन नाहिं वह, जोदे अनृण कहाय ॥२॥