चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ चाणक्यनीतिदर्पणः
यदि गुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथिवी में कोई ऐसा द्रव्य है ही नहीं जिसे देकर उस गुरु से उऋण हुआ जाय ॥२॥
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया ।
उपानद्मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम् ॥३॥
दोहा--खल काँटा इन दुहुन को, दोई अहँ उपाय ।
जूतन ते मुख तोड़ियो, रहिबो दूरी बचाय ॥३॥
दुष्ट मनुष्य और कण्टक, इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं । या तो उनके लिए पनही ( जूते ) का उपयोग किया जाय या उन्हें दूर ही से त्याग दे ॥३॥
कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं
बह्वाशिनंनिष्ठुरभाषिणं च ।
सूर्योदये वाऽस्तमिते शयानं ।
विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ॥४॥
दोहा--वसन दसन राखै मलिन, बहु भोजन कटु बैन ।
सोवै रवि पिछवतु जगत, तजै जो श्री हरि ऐन ॥४॥
मैले कपड़े पहननेवाला, मैले दाँतवाला, भुक्खड़, नीरस बातें करनेवाला और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय तक सोनेवाला यदि ईश्वर ही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती हैं ॥४॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च ।