चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १०५
यदिच्छसि वशीकर्त्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१३॥
मं०छ०—चाहते वशै जो कीन, एक कर्म लोक तीन । पन्द्रहों के तों मुखान, जान तो बहार आन ॥१३॥
यदि तुम केवल एक काम से सारे संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो पन्द्रह मुखवाले राक्षस के सामने चरती हुई इन्द्रयरूपी गैयों को उधरसे हटा लो । ये पन्द्रह मुख कौन हैं—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । मुख, पाँव, लिंग और गुदा, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ। रूप, रस, गन्ध शब्द और स्पर्श, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं ॥१३॥
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥१४॥
सो०—प्रिय स्वभाव अनुकूल, योग प्रसंगे वचन पुनि । निजबल के समतूल, कोष जान पण्डित सोई ॥१४॥
जो मनुष्य प्रसंगानुसार बात, प्रकृति के अनुकूल प्रेम और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है ॥१४॥
एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः । कुणपं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥१५॥
सो०—वस्तु एक ही होय, तीनि तरह देखी गई । रति मृत माँसू सोय, कामी योगी कुकुर सो ॥१५॥
एक स्त्री के शरीर को तीन जीव तीन दृष्टि से देखते हैं—योगी