चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
चाणक्यनीतिदर्पणः १०५
यदिच्छसि वशीकर्त्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१३॥
मं०छ०—चाहते वशै जो कीन, एक कर्म लोक तीन । पन्द्रहों के तों मुखान, जान तो बहार आन ॥१३॥
यदि तुम केवल एक काम से सारे संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो पन्द्रह मुखवाले राक्षस के सामने चरती हुई इन्द्रयरूपी गैयों को उधरसे हटा लो । ये पन्द्रह मुख कौन हैं—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । मुख, पाँव, लिंग और गुदा, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ। रूप, रस, गन्ध शब्द और स्पर्श, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं ॥१३॥
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥१४॥
सो०—प्रिय स्वभाव अनुकूल, योग प्रसंगे वचन पुनि । निजबल के समतूल, कोष जान पण्डित सोई ॥१४॥
जो मनुष्य प्रसंगानुसार बात, प्रकृति के अनुकूल प्रेम और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है ॥१४॥
एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः । कुणपं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥१५॥
सो०—वस्तु एक ही होय, तीनि तरह देखी गई । रति मृत माँसू सोय, कामी योगी कुकुर सो ॥१५॥
एक स्त्री के शरीर को तीन जीव तीन दृष्टि से देखते हैं—योगी
१०६ . चाणक्यनीतिदर्पणः
उसे बदबूदार मुर्दे के रूप में देखते हैं कामी उसे कामिनी समझता है और कुत्ता उसे मांसपिण्ड जानता है ॥१५॥
सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम् ।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१६॥
सो०--सिद्धौषध धौ धर्म, मैथुन कुवचन भोजनो ।
अपने घरको मर्म, चतुर नहीं प्रगठित करै ॥१६॥
बुद्धिमान् को चाहिए कि इन बातों को किसी से न जाहिर करे—अच्छी तरह तैयार की हुई औषधि, धर्म, अपने घर का दोष, दूषित भोजन और निंद्य किं वदन्ती बचन ॥१६॥
तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।
यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक् प्रवर्तते ॥१७॥
सो०- तौलौं मौने ठानि, कोकिलहू दिन काटते ।
जौलौं आनन्द खानि, सब को वाणी होत है ॥१७॥
कोयलें तब तक चुपचाप दिन बिता देती हैं जबतक कि वे सब लोगों के मनको आनन्दित करनेवाली वाणी नहीं बोलती हैं। १७।
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् ।
सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति ॥१८॥
सो०--धर्म धान्य धनज्ञानि, गुरु वच औषध पाँच यह ।
धार रक्षण अरु हित जानि, अन्यथा जीवन नाहिं यह ॥१८॥
धर्म, धन, अन्न, गुरु का वचन और औषधि इन वस्तुओं को सावधानी के साथ अपनावे और उनके अनुसार चले । जो ऐसा नहीं करता, वह नहीं जीता है ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०७
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥१९॥
सो०--तजौ दुष्ट सहवास, भजो साधु सङ्गम रुचिर । करौ पुण्य परकास, हरि सुमिरो जग नित्यहिं ॥१९॥
दुष्टों का साथ छोड़ दो, भले लोगों के समागम में रहो, अपने दिन और रात को पवित्र करके बिताओ और इस अनित्य संसार में नित्य ईश्वर का स्मरण करते रहो ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
*
अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनेः ॥१॥
दोहा--जासु चित्त सब जन्तु पर, गलित दया रस माह । तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह ॥१॥
जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ? ॥१॥
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥२॥
दोहा--एकौ अक्षर जो गुरु, शिष्यहिं देत जनाय । भूमि माहि धन नाहिं वह, जोदे अनृण कहाय ॥२॥
१०८ चाणक्यनीतिदर्पणः
यदि गुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथिवी में कोई ऐसा द्रव्य है ही नहीं जिसे देकर उस गुरु से उऋण हुआ जाय ॥२॥
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया ।
उपानद्मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम् ॥३॥
दोहा--खल काँटा इन दुहुन को, दोई अहँ उपाय ।
जूतन ते मुख तोड़ियो, रहिबो दूरी बचाय ॥३॥
दुष्ट मनुष्य और कण्टक, इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं । या तो उनके लिए पनही ( जूते ) का उपयोग किया जाय या उन्हें दूर ही से त्याग दे ॥३॥
कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं
बह्वाशिनंनिष्ठुरभाषिणं च ।
सूर्योदये वाऽस्तमिते शयानं ।
विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ॥४॥
दोहा--वसन दसन राखै मलिन, बहु भोजन कटु बैन ।
सोवै रवि पिछवतु जगत, तजै जो श्री हरि ऐन ॥४॥
मैले कपड़े पहननेवाला, मैले दाँतवाला, भुक्खड़, नीरस बातें करनेवाला और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय तक सोनेवाला यदि ईश्वर ही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती हैं ॥४॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च ।
चाणक्यनीतिदर्पण। १०९
तं चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते ।
ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः ॥५॥
दोहा--तजहिं तीय हित मीत औ, सेवक धन जब नाहिं ।
धन आये बहुरैं सबै धन वन्धू जग माहिं ॥५॥
निर्धन मित्र को मित्र, स्त्री, सेवक और सगे सम्बन्धी छोड़ देते हैं और वही जब फिर धनी हो जाता है तो वे लोग फिर उसके साथ हो लेते हैं । मतलब यह, संसार में धन ही मनुष्य का बन्धु है ॥५॥
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति ॥६॥
दोहा--करि अनिति धन जोरेऊ, दशे वर्ष ठहराय ।
ग्यारहवें के लागते, जड़ौ मूलते जाय ॥६॥
अन्याय से कमाया हुआ धन केवल दस वर्ष तक टिकता है, ग्यारहवाँ वर्ष लगने पर वह मूल धन के साथ नष्ट हो जाता है ॥६॥
अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् ।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकरभूषणम् ॥७॥
दोहा--खोटो भल समरथ पँह, भलौ खोट लहि नीच ।
विषौ भयो भूषण शिवहिं, अमृत राहु कँह मीच ॥७॥
अयोग्य कार्य भी यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति कर गुजरे तो वह उसके लिए योग्य हो जाता है और नीच प्रकृति का मनुष्य यदि उत्तम काम भी करता है तो वह उसके करने से
११० चाणक्यनीतिदर्पणः
अयोग्य सावित हो जाता है। जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया और विष भी शिवजीके कण्ठका शृङ्गार हो गया ॥७॥
तद्भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं
तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।
सा प्राज्ञता या न करोति पापं
दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः ॥८॥
दोहा—द्विज उबरैउ भोजन सोई, पर सो मैत्री सोय।
जेहि न पाप वह चतुरता, धर्म दम्भ बिनुसोय ॥८॥
वही भोजन भोजन है, जो ब्राह्मणों के जीम लेने के बाद बचा हो, वही, प्रेम, प्रेम है जो स्वार्थ वश अपने ही लोगों में न किया जाकर औरों पर भी किया जाय। वही विज्ञता (समझदारी) है कि जिसके प्रभाव से कोई पाप न हो सके और वही धर्म है कि जिसमें आडम्बर न हो ॥८॥
मणिलुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः ॥६॥
दोहा—मणि लोटत रहु पाँव तर, काँच रह्यो शिर नाय।
लेत देत मणिही रहे, काँच काँच रहि जाय ॥९॥
वैसे मणि पैरों तले लुढ़के और काँच माथे पर रखा जाय तो इसमें उन दोनों के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। पर जब वे दोनों बाजार में बिकने आवेंगे और उनका क्रय-विक्रय होने लगेगा तब काँच-काँच ही रहेगा और मणि मणि ही ॥९॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १११
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥१०॥
दोहा—बहुत विघ्न कम काल है, विद्या शास्त्र अपार । जल से जैसे हंस पय, लीजै सार निसार ॥१०॥
शास्त्र अनन्त हैं, बहुत सी विद्यायें हैं, थोड़ा सा समय 'जीवन' है और उसमें बहुत से विघ्न हैं । इसलिये समझदार मनुष्य को उचित है जैसे हंस सबको छोड़कर पानी से दूध केवल लेता है, उसी तरह जो अपने मतलब की बात हो, उसे ले ले बाकी सब छोड़ दे ॥१०॥
दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा च गृहमागतम् । अनर्चयित्वा यो भुङ्क्ते स वै चाण्डाल उच्यते ॥११॥
दोहा—दूर देश से राह थकि, बिनु कारज घर आय । तेहि बिनु पूजे खाय जो, चाण्डाल कहलाय ॥११॥
जो दूर से आ रहा हो इन अभ्यागतों की सेवा किये बिना जो भोजन कर लेता है उसे चाण्डाल कहना चाहिए ॥११॥
पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेक॒शः । आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१२॥
दोहा—पढ़े चारहूँ वेदहुँ, धर्म शास्त्र बहु बाद । आपुहिं जानै नाहिं ज्यों, करिद्धिहिं व्यञ्जन स्वाद ॥१२॥
११२ चाणक्यनीतिदर्पणः
कितने लोग चारो वेद और बहुत से धर्मशास्त्र पढ़ जाते हैं, पर वे आपको नहीं समझ पाते, जैसे कि कलछुल पाक में रहकर भी पाक का स्वाद नहीं जान सकती ॥१२॥
धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे ।
तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ॥१३॥
दोहा—भवसागर में धन्य है, उलटी यह द्विज नाव ।
नीचे रहि तर जात सब, ऊपर रहि बुड़ि जाय ॥१३॥
यह द्विजमयी नौका धन्य है, कि जो इस संसाररूपी सागरमें उलटे तौर पर चलती है । जो इससे नीचे (नम्र) रहते हैं, वे तर जाते हैं और जो ऊपर (उद्धत) रहते, वे नीचे चले जाते हैं ॥१३॥
अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनाम् ।
अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः ॥
भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः ।
परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ॥१४॥
दोहा—सुधा धाम औषधिपति, छवि युत अमीय शरीर ।
तऊ चंद्र रविढिग मलिन, पर घर कौन गम्भीर ॥१४॥
यद्यपि चन्द्रमा अमृत का भण्डार है, ओषधियों का स्वामी है; स्वयं अमृतमय है और कान्तिमान् है । फिर भी जब वह सूर्य के मण्डल में पड़ जाता है तो किरण रहित हो जाता है । पराये घर जाकर भला कौन ऐसा है कि जिसकी लघुता न साबित होती हो ॥१४॥
८ चाणक्यनीतिदर्पणः ११३
अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः । विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते ॥१५॥
दो०—वह अलि नलिनी पति मधुप, तेहिरस मद अलसान । परि विदेश विधिवश करै, फूल रसा बहु मान ॥१५॥
यह एक भौंरा है, जो पहले कमलदल के ही बीचमें कमलिनी का वास लेता रहता था संयोगवश वह अब परदेश जा पहुँचा है, वहाँ वह कौरैया के पुष्परस को ही बहुत समझता है ॥१५॥
पीतः क्रुद्धेनतातश्चरणतलहता वल्लभो येन रोषा- दाबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे । गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिनसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासदाहंद्विजकुलनिलयंज्ञातयुक्तंत्यजामि
स०--क्रोध से तात पियो चरणन से स्वामी हतो जिन रोषते छाती । बालसे वृद्धभये तक मुख में भारति वैरिणी धारे संघाती ॥ मम वासको पुष्प सदा उन तोड़त शिवजीकी पूजा होत प्रभाति। ताते दुख मान सदैव हरी मैं ब्राह्मण कुलको त्याग चित्लाती ॥ ब्राह्मण अधिकांश दरिद्र दिखाई देते हैं, कवि कहता है कि इस विषय पर किसी प्रश्नोत्तर के समय लक्ष्मीजी भगवान् से कहती हैं—जिसने क्रुद्ध होकर मेरे पिता को पीलिया, मेरे स्वामी को लात से मारा, बाल्यकाल ही से जो रोज ब्राह्मण लोग वैरिणी (सरस्वती)
११४ चाणक्यनीतिदर्पण।
को अपने मुख विवर में आसन दिये रहते हैं, शिवजी को पूजने के लिये जो रोज मेरा घर (कमल) उजाड़ा करते हैं, इन्हीं कारणों से नाराज होकर हे नाथ ! मैं सदैव ब्राह्मण का घर छोड़े रहती हूँ-वहाँ जाती ही नहीं ॥१६॥
बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्। दारुभेदनिपुणोऽपिषण्डङ्घ्रिनिष्क्रियोभवति पंकजकोशे
दोहा-बन्धन बहु तेरे अहें, प्रेमबन्धन कछु और । कठौ काटन में निपुण, बँध्यो कमल महँ भौर ॥१७॥
वैसे तो बहुत से बन्धन हैं, पर प्रेम की डोर का बन्धन कुछ और ही है। काठको काटने में निपुण भ्रमर कमलदल को काटने में असमर्थ होकर उसमें बँध जाता है ॥१७॥
छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धं वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम। यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥१८॥
दोहा---कटे न चन्दन महक तजु, वृद्ध न खेल गजेश । ऊख न पेरे मधुरता, शील न सकुल कलेश ॥१८॥
काटे जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, बूढ़ा हाथी भी खेलवाड़ नहीं छोड़ता, कोल्हू में पेरे जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती, ठीक इसी प्रकार कुलीन पुरुष निर्धन होकर भी अपना शील और गुण नहीं छोड़ता ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११५
उर्व्यांकोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्भ्यां धृतो लीलया तेन त्वां दिवि भूतले च सततं गोवर्धनी गीयसे । त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते किंवा केशव भाषणेन बहुनापुण्यैर्यशो लभ्यते॥१६॥
स०--कोउभूमिकेमाँहिलघूपर्व्वतकरधार केनामतुम्हारोपऱ्या है । भूतलस्वर्गकेबीच सभीनेजोगिरिधरधारी प्रसिद्ध कियो है । तिहूँ लोक के धारक तुमको धरा कुच अग्र कहो यहको गिनतीहै । ताते बहु कहना हैजो वृथा यशलाभहरे निज-पुण्य मिलती है ।
रुक्मिणी-भगवान् से कहती हैं हे केशव ! आपने एक छोटे से पहाड़ को दोनों हाथों से उठा लिया, इसीलिये स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में गोवर्धनधारी कहे जाने लगे । लेकिन तीनों लोकों को धारण करनेवाले आपको मैं अपने कुचों के अगले भाग से ही उठा लेती हूँ, फिर भी उसकी कोई गिनती नहीं होती । हे नाथ ! बहुत कुछ कहने से कोई प्रयोजन नहीं, यही समझ लीजिये कि बड़े पुण्य से यश प्राप्त होता है ।
इति चाणक्ये पञ्चदशोऽध्यायः
अथ षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥१॥
११६ चाणक्यनीतिदर्पणः
क०—कबहूँ ना मैंने हरि पदको ध्यान धरा जो मुक्ति पद दाता शास्त्र बीच में कह्यो है । स्वर्ग के भी द्वारको खोलता है बलसे उस धर्म का भी संचय नहीं ही कियो है । नारिन के पुष्ट कुच स्वप्न में न देखे ऐसो खोटो जन्म हमहीं को आय यह मिल्यो है । माता के यौवन छेदन कुठार भये यही हमरो नाम धरा मंहिं बस तुल्यो है ।
किसी मुमूर्षु बूढ़े का पश्चात्ताप है कि संसार के बन्धन को तोड़ने के लिये न मैंने ईश्वर के चरणों का ध्यान किया, न स्वर्ग के दरवाजे तोड़ने की सामर्थ्य रखनेवाले धर्म का ही उपार्जन किया और न कामिनी के कठोर कुच तथा जाँघ का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया। जीवन व्यर्थ ही चला गया । हम अपनी माता के यौवन को काटने के लिए कुल्हाड़े ही बने और कुछ नहीं ॥१॥
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः ।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः ॥२॥
दोहा—बोले हैं कोइ और से, चितवत हैं कहिं और ।
मन में चिन्ता अन्य की, न स्त्री रति इक ठौर ॥२॥
स्त्रियाँ बातें दूसरे से करती हैं, नखड़े के साथ देखती हैं, किसी दूसरे की ओर, मन में सोचती हैं किसी और को, स्त्रियों का प्रेम एक जगह रहता ही नहीं है ॥२॥
यो मोहान्मन्यते मूढ़ो रक्तेयं मयि कामिनी ।
स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडाशकुन्तवत् ॥३॥
दोहा--जो मूरख ऐसे गिनत, कामिनी का मोहि ध्यान ।
नाचे वाके बस पर्यो, क्रीड़ा पक्षि समान ॥३॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११७
जो मूर्ख यह सोचता है कि अमुक स्त्री मेरे पर मुग्ध है, वह उसके वशीभूत होकर खिलौने की चिड़िया के समान नाचता रहता है ॥३॥
कोऽर्थान्प्राप्यनगर्वितोविषयिणःकस्याऽपदोऽस्तंगताः स्त्रीभिःकस्यनखंडितंभुविमनःको नाम राज्यप्रियः? कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्? को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथि?॥४॥
स०-धनसे किसको नहिं गर्व भयो किसकामकि दुःख समूहनसा । किसके मन खण्डित नाहिं किए जग काहि न राजहिं प्यारकसा । को काल के गाल में नाहिं पर्यो को याचक गौरव मानलहा । दुर्जन के वश में पड़के सुख मारग माहिं जा कौन घमा ।
धन प्राप्त कर किसको गर्व नहीं हुआ ? संसार में कौन ऐसा विषयी पुरुष है कि जिसकी विपत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, कौन ऐसा है जिसका मन स्त्रियों के द्वारा खण्डित न हो गया हो, कौन ऐसा है जो राजा का प्रिय है, कौन ऐसा है जो काल की दृष्टि से बच गया है, कौन ऐसा मनुष्य है जो किसी के यहाँ माँगने के लिए जाकर भी गौरव को प्राप्त हुआ हो, और कौन ऐसा है कि जो दुष्टों की दुष्टता में फँसकर भी कुशलपूर्वक दुनियाँ का रास्ता तै कर गया है ॥४॥
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी । तथाऽपितृष्णारघुनंदनस्यविनाशकालेविपरीतबुद्धिः।
दोहा-रचो न देख्यो नहिं सुन्यो, नहीं कनक मृग गात । तऊ राम तृष्णा स्वमति, नाशकाल फिरि जात ॥५॥
११४ चाणक्यनीतिदर्पणः
न कभी किसी ने बनाया न कभी किसी के मुख से सुवर्णमय मृग होने की बात ही सुनी गयी । फिर भी रामचन्द्रजी को लोभ हो ही गया । जब विनाशकाल उपस्थित हो जाता है तब समझदारों की भी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥५॥
गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः ।
प्रासादशिखरस्थोऽपि किंकाकः गरुडायते ?॥६॥
सो०--गुण से पाय बड़ाय, नहिं ऊँचे बैठक टँगे ।
बैठि ऊँच घर जाय, कहाँ काग होवे गरुड़ ॥६॥
मनुष्य अपने गुणों से उत्तम बनता है, ऊँचे आसन पर बैठ जाने से नहीं । क्या भव्यभवन के शिखर पर बैठकर कौआ कौए से गरुड़ हो जायगा ॥६॥
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः ।
पूर्णेन्दुः कि तथा वंद्यो निष्कलङ्को यथा कृशः ।७।
सो०--सब थल गुणहि पुजाय, नहीं महतिहूँ संपदा ।
बन्दि कि तस विधु जाय, पूर चीन अकलंक जस ॥७॥
गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, धन चाहे जितना हो वह सब जगह नहीं पुजायेगा । जिस तरह कि द्वितीया के दुर्बल चन्द्रमा की वन्दना की जाती है उस तरह पूर्ण चन्द्रमा की वन्दना नहीं की जाती है ॥७॥
परमोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत् ।
इन्द्रोऽपिलघुतां याति स्वयं प्रख्यापितर्गुणः ॥८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११९
दोहा--औरन के वर्णन किये, गुणहु हीन गुणवान ।
इन्द्रौ लघुताई लहै, निज मुख किये बखान ॥८॥
दूसरे मनुष्य जिसके गुणों की प्रशंसा करें वह गुणहीन होता हुआ भी गुणी हो जाता है । और अपने मुँह अपने गुणों का बखान करने से तो इन्द्र भी छोटे ही मानें जायेंगे ।८॥
विवेकिनमनुप्राप्ता गुणाः यान्ति मनोज्ञताम् ।
सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ॥६॥
दो०--पहुँच विवेकी पुरुष पहँ, अति शोभा गुण पाव ।
धनी रत्न छवि तब कहै, जब लहि कनक जड़ाव ॥
गुण जब किसी समझदार मनुष्य के पास जाते हैं तभी सुन्दर लगते हैं । रत्न सोने के अलंकार में जड़ दिया जाता है, तभी जँचता है ॥९॥
गुणैःसर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः ।
अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ॥१०॥
दोहा--गुण में विष्णु समान हूँ, बिनु अवलम्बहि नाहि ।
हाय अमोले मणि तऊ, कनक अवलम्बहिं चाहि ॥१०॥
कोई गुण में चाहे विष्णु भगवान् के समान ही क्यों न हो पर आश्रय के बिना अकेला रहकर वह भी दुखी ही होता है । मणि कितना ही बेशकीमती क्यों न हो, जब तक कि वह सोने के किसी जेवर में नहीं जड़ा जाता तबतक बेकार ही रहता है ॥१०॥
अतिक्लेशेन ये अर्था धर्मस्याऽतिक्रमेण तु ।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था न भवन्तु मे ॥११॥
१२० चाणक्यनीतिदर्पणः
दोहा—अति क्लेश करि धर्म तजि, अथवा परि अरि पाँय । जो मिलती संपत्ति सो, मेरे पास न आव ॥११॥
ज्यादा तकलीफ उठाकर, धर्म छोड़कर या शत्रु से नीचा देखकर धन प्राप्त होता हो तो, ऐसा धन मुझे नहीं चाहिए ॥११॥
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला । या तु वेश्येव सामान्यापथिकैरपि भुज्यते ॥१२॥
दोहा--जो सुतिया सम एक रत, तेहि सम्पति करु काह । जो वेश्या सम होय तेहि, भोगहिं चलती राह ॥१२॥
उस धन से क्या हो सकता है जो बहू की तरह घर के भीतर बन्द रहे अथवा उस धन से भी कुछ नहीं हो सकता जो लावारिसी तौर से वेश्या की तरह पड़ा हो और रास्ते चलनेवाले ऐरे गैरे भी उसे भोगें ॥१२॥
धने जीवितव्येषु स्त्री चाहारकर्मसु । अतृप्ताः प्राणिनस्सर्वे याता यास्यन्तियान्तिच।१३।
दोहा--धन जीवन जो अन्न सो, सब अतृप्त जगमाहिं । सब अतृप्तही चलि गये, और सबन चलि जाहिं ॥१३॥
धन, जीवन, स्त्री और भोजन इन चार चीजों से संसार के सभी प्राणी हमेशा अतृप्त रहे हैं । सब इनसे अतृप्त होकर ही चले गये, जायेंगे और चले जा रहे हैं ।
क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञमहोमबलिक्रियाः । न क्षीयन्ते पात्रदानमभयं यत्तु देहिनाम् ॥१४॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२१
सबहि दान नसि जात है, यज्ञ होम बलिदान ।
पर नहि नसत सुपात्र को, दियो दान शुभजान ॥१४॥
वैसे यह होम और बलिदान आदि दान समय बीतने पर नष्ट हो जाते हैं, पर सत्पात्रको दिया हुआ दान और सर्व-साधारण को दिया दान नष्ट नहीं होता है ॥१४॥
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न सो धूतो मामयंयाचयिष्यति ॥१५॥
दोहा--तृण सो लघु है तूल, यहि से है लघु याचकहिं ।
वायुहि ते केहि ना उड़्यो, डरत जो याचहि ताहि ॥१५॥
सबसे हल्की चीज है तृण, तृण से भी हल्की है रुई, रुई से भी हल्का है याचक (माँगने वाला) अब प्रश्न यह होता है कि इतने हल्के जीव को वायु क्यों न उड़ा ले गया तो कहते हैं कि वायु ने उसे इसलिए नहीं उड़ाया कि मेरे पास भी आकर कुछ माँग न बैठे ॥१५॥
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात् ।
प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने दिने ॥१६॥
दोहा--मर जानों है बहु भलो, अपमानित हो नाहि ।
प्राण त्यागना क्षणिक दुःख, मान भंग निशिरात ॥
मानभंग करके जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है । क्योंकि प्राण त्याग का दुःख थोड़ी देर के लिए होता है और मानभंग का क्लेश तो दिनों दिन होता रहता है ॥१६॥
१२२ चाणक्यनीतिदर्पणः
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रता ? ॥१७॥
मीठी बातें करने से सभी लोग प्रसन्न रहते हैं। ऐसी दशा में मीठी ही बातें करनी चाहिए। बात बोलने में कौन कमी है। १७।
संसारकूटवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे ।
सुभाषितं च सुस्वादः संगतिः सज्जने जने ॥१८॥
इस संसार रूपी कूटवृक्ष के दो अमृत-फल हैं, एक तो अच्छी-अच्छी बातें और दूसरे सज्जनों की संगति ॥१८॥
जन्मजन्मनि चाभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः ।
तेनैवाऽभ्यासयोगेन देही वाऽभ्यस्यते पुनः ॥१९॥
दान, अध्ययन और तप ये जन्म-जन्म के अभ्यास से होते हैं और प्राणी बार-बार इसी का अभ्यास करता रहता है ॥१९॥
पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥२०॥
जो विद्या कण्ठ में न रहकर पुस्तक में लिखी पड़ी है जो धन अपने हाथ में न रहकर पराये हाथ में पड़ा है अतएव आवश्यकता पड़ने पर अपने काम नहीं आसकती, वह विद्या न विद्या है और न वह धन-धनही है ॥२०॥
इति चाणक्ये षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२३
अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
पुस्तकं प्रत्ययाधीतं नाऽधीतं गुरुसन्निधौ ।
सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ॥१॥
जिस पण्डित ने गुरु के पास न पढ़कर पुस्तक ही से विद्या प्राप्त कर ली है । ऐसे लोग सभा में नहीं शोभते जैसे व्यभिचारी से गर्भवती स्त्री है ॥१॥
कृते प्रतिकृतिं कुर्यात् हिंसने प्रतिहिंसनम् ।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दौष्ट्यं समाचरेत् ॥२॥
उपकारी के प्रति उपकार, हिंसक के प्रति हिंसा करने में कोई दोष नहीं है, दुष्ट के साथ दुष्टता करनी ही चाहिये ॥२॥
यद्दूरं यद्दुराराध्यं यच्च दूरैर्व्यवस्थितम् ।
तत्सवैं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥३॥
जो वस्तु दूर है, जिसके लिए कठिन आराधना की आवश्यकता पड़ती है और जो अपने से दूर है, वह सब वस्तुयें भी तपस्या से साध्य हो सकती हैं । क्योंकि तपस्या सबसे प्रबल चीज है ॥३॥
लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः?
सत्यं यत्तपसा च किं शुचिमनो यद्यस्तितीर्थेन किम्?
सौजन्यं यदि किं गुणैःसुमहिमा यद्यस्ति किंमण्डनैः?
सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ॥४॥
जिसके पासमें लोभ है तो फिर और अवगुण की क्या आवश्यकता ? यदि चुगली करने की आदत है तो और पापों की
१२४ चाणक्यनीतिदर्पणः
क्या जरूरत ? यदि सच्चाई है तो और तपकी क्या आवश्यकता ? यदि मन शुद्ध है तो तीर्थ करने की क्या जरूरत ? यदि सुजनता है तो और गुणों की जरूरत नहीं, यदि अपना प्रभाव है तो शृङ्गार की कोई आवश्यकता नहीं, यदि अपने पास अच्छी विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता और यदि अपयश विद्यमान ह तो मरने की क्या जरूरत है ॥४॥
पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शंखो भिक्षाटनं कुर्यान्नदत्तमुपतिष्ठते ॥५॥
जिसका बाप रत्नाकार (रत्नोंका खजाना समुद्र) और लक्ष्मी जिसकी सगी बहन है, शंख भी यदि भीख माँगता फिरे तो इसका यही मतलब है कि बिना दिये कुछ किसी को मिलता नहीं ॥५॥
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः । व्याधितो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ॥६॥
अशक्त साधु होता है, ब्रह्मचारी निर्धन होता है, रोगी देवताका भक्त होता है और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता हुआ करती है ॥६॥
नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा । न गायत्र्याः परो मन्त्रः न मातुर्दैवतं परम् ॥७॥
अन्न और जल के समान कोई दान नहीं होता, एकादशी की तरह कोई तिथि नहीं होती, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं होता और माता से बढ़कर कोई देवता नहीं होता ॥७॥
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाः विषं मुखे । वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ॥८॥