चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ११५
उर्व्यांकोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्भ्यां धृतो लीलया तेन त्वां दिवि भूतले च सततं गोवर्धनी गीयसे । त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते किंवा केशव भाषणेन बहुनापुण्यैर्यशो लभ्यते॥१६॥
स०--कोउभूमिकेमाँहिलघूपर्व्वतकरधार केनामतुम्हारोपऱ्या है । भूतलस्वर्गकेबीच सभीनेजोगिरिधरधारी प्रसिद्ध कियो है । तिहूँ लोक के धारक तुमको धरा कुच अग्र कहो यहको गिनतीहै । ताते बहु कहना हैजो वृथा यशलाभहरे निज-पुण्य मिलती है ।
रुक्मिणी-भगवान् से कहती हैं हे केशव ! आपने एक छोटे से पहाड़ को दोनों हाथों से उठा लिया, इसीलिये स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में गोवर्धनधारी कहे जाने लगे । लेकिन तीनों लोकों को धारण करनेवाले आपको मैं अपने कुचों के अगले भाग से ही उठा लेती हूँ, फिर भी उसकी कोई गिनती नहीं होती । हे नाथ ! बहुत कुछ कहने से कोई प्रयोजन नहीं, यही समझ लीजिये कि बड़े पुण्य से यश प्राप्त होता है ।
इति चाणक्ये पञ्चदशोऽध्यायः
अथ षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥१॥