चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ चाणक्यनीतिदर्पणः
क०—कबहूँ ना मैंने हरि पदको ध्यान धरा जो मुक्ति पद दाता शास्त्र बीच में कह्यो है । स्वर्ग के भी द्वारको खोलता है बलसे उस धर्म का भी संचय नहीं ही कियो है । नारिन के पुष्ट कुच स्वप्न में न देखे ऐसो खोटो जन्म हमहीं को आय यह मिल्यो है । माता के यौवन छेदन कुठार भये यही हमरो नाम धरा मंहिं बस तुल्यो है ।
किसी मुमूर्षु बूढ़े का पश्चात्ताप है कि संसार के बन्धन को तोड़ने के लिये न मैंने ईश्वर के चरणों का ध्यान किया, न स्वर्ग के दरवाजे तोड़ने की सामर्थ्य रखनेवाले धर्म का ही उपार्जन किया और न कामिनी के कठोर कुच तथा जाँघ का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया। जीवन व्यर्थ ही चला गया । हम अपनी माता के यौवन को काटने के लिए कुल्हाड़े ही बने और कुछ नहीं ॥१॥
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः ।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः ॥२॥
दोहा—बोले हैं कोइ और से, चितवत हैं कहिं और ।
मन में चिन्ता अन्य की, न स्त्री रति इक ठौर ॥२॥
स्त्रियाँ बातें दूसरे से करती हैं, नखड़े के साथ देखती हैं, किसी दूसरे की ओर, मन में सोचती हैं किसी और को, स्त्रियों का प्रेम एक जगह रहता ही नहीं है ॥२॥
यो मोहान्मन्यते मूढ़ो रक्तेयं मयि कामिनी ।
स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडाशकुन्तवत् ॥३॥
दोहा--जो मूरख ऐसे गिनत, कामिनी का मोहि ध्यान ।
नाचे वाके बस पर्यो, क्रीड़ा पक्षि समान ॥३॥