चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ११७
जो मूर्ख यह सोचता है कि अमुक स्त्री मेरे पर मुग्ध है, वह उसके वशीभूत होकर खिलौने की चिड़िया के समान नाचता रहता है ॥३॥
कोऽर्थान्प्राप्यनगर्वितोविषयिणःकस्याऽपदोऽस्तंगताः स्त्रीभिःकस्यनखंडितंभुविमनःको नाम राज्यप्रियः? कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्? को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथि?॥४॥
स०-धनसे किसको नहिं गर्व भयो किसकामकि दुःख समूहनसा । किसके मन खण्डित नाहिं किए जग काहि न राजहिं प्यारकसा । को काल के गाल में नाहिं पर्यो को याचक गौरव मानलहा । दुर्जन के वश में पड़के सुख मारग माहिं जा कौन घमा ।
धन प्राप्त कर किसको गर्व नहीं हुआ ? संसार में कौन ऐसा विषयी पुरुष है कि जिसकी विपत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, कौन ऐसा है जिसका मन स्त्रियों के द्वारा खण्डित न हो गया हो, कौन ऐसा है जो राजा का प्रिय है, कौन ऐसा है जो काल की दृष्टि से बच गया है, कौन ऐसा मनुष्य है जो किसी के यहाँ माँगने के लिए जाकर भी गौरव को प्राप्त हुआ हो, और कौन ऐसा है कि जो दुष्टों की दुष्टता में फँसकर भी कुशलपूर्वक दुनियाँ का रास्ता तै कर गया है ॥४॥
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी । तथाऽपितृष्णारघुनंदनस्यविनाशकालेविपरीतबुद्धिः।
दोहा-रचो न देख्यो नहिं सुन्यो, नहीं कनक मृग गात । तऊ राम तृष्णा स्वमति, नाशकाल फिरि जात ॥५॥