चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ चाणक्यनीतिदर्पणः
न कभी किसी ने बनाया न कभी किसी के मुख से सुवर्णमय मृग होने की बात ही सुनी गयी । फिर भी रामचन्द्रजी को लोभ हो ही गया । जब विनाशकाल उपस्थित हो जाता है तब समझदारों की भी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥५॥
गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः ।
प्रासादशिखरस्थोऽपि किंकाकः गरुडायते ?॥६॥
सो०--गुण से पाय बड़ाय, नहिं ऊँचे बैठक टँगे ।
बैठि ऊँच घर जाय, कहाँ काग होवे गरुड़ ॥६॥
मनुष्य अपने गुणों से उत्तम बनता है, ऊँचे आसन पर बैठ जाने से नहीं । क्या भव्यभवन के शिखर पर बैठकर कौआ कौए से गरुड़ हो जायगा ॥६॥
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः ।
पूर्णेन्दुः कि तथा वंद्यो निष्कलङ्को यथा कृशः ।७।
सो०--सब थल गुणहि पुजाय, नहीं महतिहूँ संपदा ।
बन्दि कि तस विधु जाय, पूर चीन अकलंक जस ॥७॥
गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, धन चाहे जितना हो वह सब जगह नहीं पुजायेगा । जिस तरह कि द्वितीया के दुर्बल चन्द्रमा की वन्दना की जाती है उस तरह पूर्ण चन्द्रमा की वन्दना नहीं की जाती है ॥७॥
परमोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत् ।
इन्द्रोऽपिलघुतां याति स्वयं प्रख्यापितर्गुणः ॥८॥