चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ११९
दोहा--औरन के वर्णन किये, गुणहु हीन गुणवान ।
इन्द्रौ लघुताई लहै, निज मुख किये बखान ॥८॥
दूसरे मनुष्य जिसके गुणों की प्रशंसा करें वह गुणहीन होता हुआ भी गुणी हो जाता है । और अपने मुँह अपने गुणों का बखान करने से तो इन्द्र भी छोटे ही मानें जायेंगे ।८॥
विवेकिनमनुप्राप्ता गुणाः यान्ति मनोज्ञताम् ।
सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ॥६॥
दो०--पहुँच विवेकी पुरुष पहँ, अति शोभा गुण पाव ।
धनी रत्न छवि तब कहै, जब लहि कनक जड़ाव ॥
गुण जब किसी समझदार मनुष्य के पास जाते हैं तभी सुन्दर लगते हैं । रत्न सोने के अलंकार में जड़ दिया जाता है, तभी जँचता है ॥९॥
गुणैःसर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः ।
अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ॥१०॥
दोहा--गुण में विष्णु समान हूँ, बिनु अवलम्बहि नाहि ।
हाय अमोले मणि तऊ, कनक अवलम्बहिं चाहि ॥१०॥
कोई गुण में चाहे विष्णु भगवान् के समान ही क्यों न हो पर आश्रय के बिना अकेला रहकर वह भी दुखी ही होता है । मणि कितना ही बेशकीमती क्यों न हो, जब तक कि वह सोने के किसी जेवर में नहीं जड़ा जाता तबतक बेकार ही रहता है ॥१०॥
अतिक्लेशेन ये अर्था धर्मस्याऽतिक्रमेण तु ।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था न भवन्तु मे ॥११॥