भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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१२० चाणक्यनीतिदर्पणः

दोहा—अति क्लेश करि धर्म तजि, अथवा परि अरि पाँय । जो मिलती संपत्ति सो, मेरे पास न आव ॥११॥

ज्यादा तकलीफ उठाकर, धर्म छोड़कर या शत्रु से नीचा देखकर धन प्राप्त होता हो तो, ऐसा धन मुझे नहीं चाहिए ॥११॥

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला । या तु वेश्येव सामान्यापथिकैरपि भुज्यते ॥१२॥

दोहा--जो सुतिया सम एक रत, तेहि सम्पति करु काह । जो वेश्या सम होय तेहि, भोगहिं चलती राह ॥१२॥

उस धन से क्या हो सकता है जो बहू की तरह घर के भीतर बन्द रहे अथवा उस धन से भी कुछ नहीं हो सकता जो लावारिसी तौर से वेश्या की तरह पड़ा हो और रास्ते चलनेवाले ऐरे गैरे भी उसे भोगें ॥१२॥

धने जीवितव्येषु स्त्री चाहारकर्मसु । अतृप्ताः प्राणिनस्सर्वे याता यास्यन्तियान्तिच।१३।

दोहा--धन जीवन जो अन्न सो, सब अतृप्त जगमाहिं । सब अतृप्तही चलि गये, और सबन चलि जाहिं ॥१३॥

धन, जीवन, स्त्री और भोजन इन चार चीजों से संसार के सभी प्राणी हमेशा अतृप्त रहे हैं । सब इनसे अतृप्त होकर ही चले गये, जायेंगे और चले जा रहे हैं ।

क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञमहोमबलिक्रियाः । न क्षीयन्ते पात्रदानमभयं यत्तु देहिनाम् ॥१४॥