चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १२१
सबहि दान नसि जात है, यज्ञ होम बलिदान ।
पर नहि नसत सुपात्र को, दियो दान शुभजान ॥१४॥
वैसे यह होम और बलिदान आदि दान समय बीतने पर नष्ट हो जाते हैं, पर सत्पात्रको दिया हुआ दान और सर्व-साधारण को दिया दान नष्ट नहीं होता है ॥१४॥
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न सो धूतो मामयंयाचयिष्यति ॥१५॥
दोहा--तृण सो लघु है तूल, यहि से है लघु याचकहिं ।
वायुहि ते केहि ना उड़्यो, डरत जो याचहि ताहि ॥१५॥
सबसे हल्की चीज है तृण, तृण से भी हल्की है रुई, रुई से भी हल्का है याचक (माँगने वाला) अब प्रश्न यह होता है कि इतने हल्के जीव को वायु क्यों न उड़ा ले गया तो कहते हैं कि वायु ने उसे इसलिए नहीं उड़ाया कि मेरे पास भी आकर कुछ माँग न बैठे ॥१५॥
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात् ।
प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने दिने ॥१६॥
दोहा--मर जानों है बहु भलो, अपमानित हो नाहि ।
प्राण त्यागना क्षणिक दुःख, मान भंग निशिरात ॥
मानभंग करके जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है । क्योंकि प्राण त्याग का दुःख थोड़ी देर के लिए होता है और मानभंग का क्लेश तो दिनों दिन होता रहता है ॥१६॥