भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१२२ चाणक्यनीतिदर्पणः

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रता ? ॥१७॥

मीठी बातें करने से सभी लोग प्रसन्न रहते हैं। ऐसी दशा में मीठी ही बातें करनी चाहिए। बात बोलने में कौन कमी है। १७।

संसारकूटवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे ।
सुभाषितं च सुस्वादः संगतिः सज्जने जने ॥१८॥

इस संसार रूपी कूटवृक्ष के दो अमृत-फल हैं, एक तो अच्छी-अच्छी बातें और दूसरे सज्जनों की संगति ॥१८॥

जन्मजन्मनि चाभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः ।
तेनैवाऽभ्यासयोगेन देही वाऽभ्यस्यते पुनः ॥१९॥

दान, अध्ययन और तप ये जन्म-जन्म के अभ्यास से होते हैं और प्राणी बार-बार इसी का अभ्यास करता रहता है ॥१९॥

पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥२०॥

जो विद्या कण्ठ में न रहकर पुस्तक में लिखी पड़ी है जो धन अपने हाथ में न रहकर पराये हाथ में पड़ा है अतएव आवश्यकता पड़ने पर अपने काम नहीं आसकती, वह विद्या न विद्या है और न वह धन-धनही है ॥२०॥

इति चाणक्ये षोडशोऽध्यायः ॥१६॥