चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १२३
अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
पुस्तकं प्रत्ययाधीतं नाऽधीतं गुरुसन्निधौ ।
सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ॥१॥
जिस पण्डित ने गुरु के पास न पढ़कर पुस्तक ही से विद्या प्राप्त कर ली है । ऐसे लोग सभा में नहीं शोभते जैसे व्यभिचारी से गर्भवती स्त्री है ॥१॥
कृते प्रतिकृतिं कुर्यात् हिंसने प्रतिहिंसनम् ।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दौष्ट्यं समाचरेत् ॥२॥
उपकारी के प्रति उपकार, हिंसक के प्रति हिंसा करने में कोई दोष नहीं है, दुष्ट के साथ दुष्टता करनी ही चाहिये ॥२॥
यद्दूरं यद्दुराराध्यं यच्च दूरैर्व्यवस्थितम् ।
तत्सवैं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥३॥
जो वस्तु दूर है, जिसके लिए कठिन आराधना की आवश्यकता पड़ती है और जो अपने से दूर है, वह सब वस्तुयें भी तपस्या से साध्य हो सकती हैं । क्योंकि तपस्या सबसे प्रबल चीज है ॥३॥
लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः?
सत्यं यत्तपसा च किं शुचिमनो यद्यस्तितीर्थेन किम्?
सौजन्यं यदि किं गुणैःसुमहिमा यद्यस्ति किंमण्डनैः?
सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ॥४॥
जिसके पासमें लोभ है तो फिर और अवगुण की क्या आवश्यकता ? यदि चुगली करने की आदत है तो और पापों की