चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२४ चाणक्यनीतिदर्पणः
क्या जरूरत ? यदि सच्चाई है तो और तपकी क्या आवश्यकता ? यदि मन शुद्ध है तो तीर्थ करने की क्या जरूरत ? यदि सुजनता है तो और गुणों की जरूरत नहीं, यदि अपना प्रभाव है तो शृङ्गार की कोई आवश्यकता नहीं, यदि अपने पास अच्छी विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता और यदि अपयश विद्यमान ह तो मरने की क्या जरूरत है ॥४॥
पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शंखो भिक्षाटनं कुर्यान्नदत्तमुपतिष्ठते ॥५॥
जिसका बाप रत्नाकार (रत्नोंका खजाना समुद्र) और लक्ष्मी जिसकी सगी बहन है, शंख भी यदि भीख माँगता फिरे तो इसका यही मतलब है कि बिना दिये कुछ किसी को मिलता नहीं ॥५॥
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः । व्याधितो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ॥६॥
अशक्त साधु होता है, ब्रह्मचारी निर्धन होता है, रोगी देवताका भक्त होता है और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता हुआ करती है ॥६॥
नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा । न गायत्र्याः परो मन्त्रः न मातुर्दैवतं परम् ॥७॥
अन्न और जल के समान कोई दान नहीं होता, एकादशी की तरह कोई तिथि नहीं होती, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं होता और माता से बढ़कर कोई देवता नहीं होता ॥७॥
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाः विषं मुखे । वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ॥८॥