चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
चाणक्यनीतिदर्पणः ११५
उर्व्यांकोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्भ्यां धृतो लीलया तेन त्वां दिवि भूतले च सततं गोवर्धनी गीयसे । त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते किंवा केशव भाषणेन बहुनापुण्यैर्यशो लभ्यते॥१६॥
स०--कोउभूमिकेमाँहिलघूपर्व्वतकरधार केनामतुम्हारोपऱ्या है । भूतलस्वर्गकेबीच सभीनेजोगिरिधरधारी प्रसिद्ध कियो है । तिहूँ लोक के धारक तुमको धरा कुच अग्र कहो यहको गिनतीहै । ताते बहु कहना हैजो वृथा यशलाभहरे निज-पुण्य मिलती है ।
रुक्मिणी-भगवान् से कहती हैं हे केशव ! आपने एक छोटे से पहाड़ को दोनों हाथों से उठा लिया, इसीलिये स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में गोवर्धनधारी कहे जाने लगे । लेकिन तीनों लोकों को धारण करनेवाले आपको मैं अपने कुचों के अगले भाग से ही उठा लेती हूँ, फिर भी उसकी कोई गिनती नहीं होती । हे नाथ ! बहुत कुछ कहने से कोई प्रयोजन नहीं, यही समझ लीजिये कि बड़े पुण्य से यश प्राप्त होता है ।
इति चाणक्ये पञ्चदशोऽध्यायः
अथ षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥१॥
११६ चाणक्यनीतिदर्पणः
क०—कबहूँ ना मैंने हरि पदको ध्यान धरा जो मुक्ति पद दाता शास्त्र बीच में कह्यो है । स्वर्ग के भी द्वारको खोलता है बलसे उस धर्म का भी संचय नहीं ही कियो है । नारिन के पुष्ट कुच स्वप्न में न देखे ऐसो खोटो जन्म हमहीं को आय यह मिल्यो है । माता के यौवन छेदन कुठार भये यही हमरो नाम धरा मंहिं बस तुल्यो है ।
किसी मुमूर्षु बूढ़े का पश्चात्ताप है कि संसार के बन्धन को तोड़ने के लिये न मैंने ईश्वर के चरणों का ध्यान किया, न स्वर्ग के दरवाजे तोड़ने की सामर्थ्य रखनेवाले धर्म का ही उपार्जन किया और न कामिनी के कठोर कुच तथा जाँघ का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया। जीवन व्यर्थ ही चला गया । हम अपनी माता के यौवन को काटने के लिए कुल्हाड़े ही बने और कुछ नहीं ॥१॥
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः ।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः ॥२॥
दोहा—बोले हैं कोइ और से, चितवत हैं कहिं और ।
मन में चिन्ता अन्य की, न स्त्री रति इक ठौर ॥२॥
स्त्रियाँ बातें दूसरे से करती हैं, नखड़े के साथ देखती हैं, किसी दूसरे की ओर, मन में सोचती हैं किसी और को, स्त्रियों का प्रेम एक जगह रहता ही नहीं है ॥२॥
यो मोहान्मन्यते मूढ़ो रक्तेयं मयि कामिनी ।
स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडाशकुन्तवत् ॥३॥
दोहा--जो मूरख ऐसे गिनत, कामिनी का मोहि ध्यान ।
नाचे वाके बस पर्यो, क्रीड़ा पक्षि समान ॥३॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११७
जो मूर्ख यह सोचता है कि अमुक स्त्री मेरे पर मुग्ध है, वह उसके वशीभूत होकर खिलौने की चिड़िया के समान नाचता रहता है ॥३॥
कोऽर्थान्प्राप्यनगर्वितोविषयिणःकस्याऽपदोऽस्तंगताः स्त्रीभिःकस्यनखंडितंभुविमनःको नाम राज्यप्रियः? कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्? को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथि?॥४॥
स०-धनसे किसको नहिं गर्व भयो किसकामकि दुःख समूहनसा । किसके मन खण्डित नाहिं किए जग काहि न राजहिं प्यारकसा । को काल के गाल में नाहिं पर्यो को याचक गौरव मानलहा । दुर्जन के वश में पड़के सुख मारग माहिं जा कौन घमा ।
धन प्राप्त कर किसको गर्व नहीं हुआ ? संसार में कौन ऐसा विषयी पुरुष है कि जिसकी विपत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, कौन ऐसा है जिसका मन स्त्रियों के द्वारा खण्डित न हो गया हो, कौन ऐसा है जो राजा का प्रिय है, कौन ऐसा है जो काल की दृष्टि से बच गया है, कौन ऐसा मनुष्य है जो किसी के यहाँ माँगने के लिए जाकर भी गौरव को प्राप्त हुआ हो, और कौन ऐसा है कि जो दुष्टों की दुष्टता में फँसकर भी कुशलपूर्वक दुनियाँ का रास्ता तै कर गया है ॥४॥
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी । तथाऽपितृष्णारघुनंदनस्यविनाशकालेविपरीतबुद्धिः।
दोहा-रचो न देख्यो नहिं सुन्यो, नहीं कनक मृग गात । तऊ राम तृष्णा स्वमति, नाशकाल फिरि जात ॥५॥
११४ चाणक्यनीतिदर्पणः
न कभी किसी ने बनाया न कभी किसी के मुख से सुवर्णमय मृग होने की बात ही सुनी गयी । फिर भी रामचन्द्रजी को लोभ हो ही गया । जब विनाशकाल उपस्थित हो जाता है तब समझदारों की भी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥५॥
गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः ।
प्रासादशिखरस्थोऽपि किंकाकः गरुडायते ?॥६॥
सो०--गुण से पाय बड़ाय, नहिं ऊँचे बैठक टँगे ।
बैठि ऊँच घर जाय, कहाँ काग होवे गरुड़ ॥६॥
मनुष्य अपने गुणों से उत्तम बनता है, ऊँचे आसन पर बैठ जाने से नहीं । क्या भव्यभवन के शिखर पर बैठकर कौआ कौए से गरुड़ हो जायगा ॥६॥
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः ।
पूर्णेन्दुः कि तथा वंद्यो निष्कलङ्को यथा कृशः ।७।
सो०--सब थल गुणहि पुजाय, नहीं महतिहूँ संपदा ।
बन्दि कि तस विधु जाय, पूर चीन अकलंक जस ॥७॥
गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, धन चाहे जितना हो वह सब जगह नहीं पुजायेगा । जिस तरह कि द्वितीया के दुर्बल चन्द्रमा की वन्दना की जाती है उस तरह पूर्ण चन्द्रमा की वन्दना नहीं की जाती है ॥७॥
परमोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत् ।
इन्द्रोऽपिलघुतां याति स्वयं प्रख्यापितर्गुणः ॥८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११९
दोहा--औरन के वर्णन किये, गुणहु हीन गुणवान ।
इन्द्रौ लघुताई लहै, निज मुख किये बखान ॥८॥
दूसरे मनुष्य जिसके गुणों की प्रशंसा करें वह गुणहीन होता हुआ भी गुणी हो जाता है । और अपने मुँह अपने गुणों का बखान करने से तो इन्द्र भी छोटे ही मानें जायेंगे ।८॥
विवेकिनमनुप्राप्ता गुणाः यान्ति मनोज्ञताम् ।
सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ॥६॥
दो०--पहुँच विवेकी पुरुष पहँ, अति शोभा गुण पाव ।
धनी रत्न छवि तब कहै, जब लहि कनक जड़ाव ॥
गुण जब किसी समझदार मनुष्य के पास जाते हैं तभी सुन्दर लगते हैं । रत्न सोने के अलंकार में जड़ दिया जाता है, तभी जँचता है ॥९॥
गुणैःसर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः ।
अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ॥१०॥
दोहा--गुण में विष्णु समान हूँ, बिनु अवलम्बहि नाहि ।
हाय अमोले मणि तऊ, कनक अवलम्बहिं चाहि ॥१०॥
कोई गुण में चाहे विष्णु भगवान् के समान ही क्यों न हो पर आश्रय के बिना अकेला रहकर वह भी दुखी ही होता है । मणि कितना ही बेशकीमती क्यों न हो, जब तक कि वह सोने के किसी जेवर में नहीं जड़ा जाता तबतक बेकार ही रहता है ॥१०॥
अतिक्लेशेन ये अर्था धर्मस्याऽतिक्रमेण तु ।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था न भवन्तु मे ॥११॥
१२० चाणक्यनीतिदर्पणः
दोहा—अति क्लेश करि धर्म तजि, अथवा परि अरि पाँय । जो मिलती संपत्ति सो, मेरे पास न आव ॥११॥
ज्यादा तकलीफ उठाकर, धर्म छोड़कर या शत्रु से नीचा देखकर धन प्राप्त होता हो तो, ऐसा धन मुझे नहीं चाहिए ॥११॥
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला । या तु वेश्येव सामान्यापथिकैरपि भुज्यते ॥१२॥
दोहा--जो सुतिया सम एक रत, तेहि सम्पति करु काह । जो वेश्या सम होय तेहि, भोगहिं चलती राह ॥१२॥
उस धन से क्या हो सकता है जो बहू की तरह घर के भीतर बन्द रहे अथवा उस धन से भी कुछ नहीं हो सकता जो लावारिसी तौर से वेश्या की तरह पड़ा हो और रास्ते चलनेवाले ऐरे गैरे भी उसे भोगें ॥१२॥
धने जीवितव्येषु स्त्री चाहारकर्मसु । अतृप्ताः प्राणिनस्सर्वे याता यास्यन्तियान्तिच।१३।
दोहा--धन जीवन जो अन्न सो, सब अतृप्त जगमाहिं । सब अतृप्तही चलि गये, और सबन चलि जाहिं ॥१३॥
धन, जीवन, स्त्री और भोजन इन चार चीजों से संसार के सभी प्राणी हमेशा अतृप्त रहे हैं । सब इनसे अतृप्त होकर ही चले गये, जायेंगे और चले जा रहे हैं ।
क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञमहोमबलिक्रियाः । न क्षीयन्ते पात्रदानमभयं यत्तु देहिनाम् ॥१४॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२१
सबहि दान नसि जात है, यज्ञ होम बलिदान ।
पर नहि नसत सुपात्र को, दियो दान शुभजान ॥१४॥
वैसे यह होम और बलिदान आदि दान समय बीतने पर नष्ट हो जाते हैं, पर सत्पात्रको दिया हुआ दान और सर्व-साधारण को दिया दान नष्ट नहीं होता है ॥१४॥
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न सो धूतो मामयंयाचयिष्यति ॥१५॥
दोहा--तृण सो लघु है तूल, यहि से है लघु याचकहिं ।
वायुहि ते केहि ना उड़्यो, डरत जो याचहि ताहि ॥१५॥
सबसे हल्की चीज है तृण, तृण से भी हल्की है रुई, रुई से भी हल्का है याचक (माँगने वाला) अब प्रश्न यह होता है कि इतने हल्के जीव को वायु क्यों न उड़ा ले गया तो कहते हैं कि वायु ने उसे इसलिए नहीं उड़ाया कि मेरे पास भी आकर कुछ माँग न बैठे ॥१५॥
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात् ।
प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने दिने ॥१६॥
दोहा--मर जानों है बहु भलो, अपमानित हो नाहि ।
प्राण त्यागना क्षणिक दुःख, मान भंग निशिरात ॥
मानभंग करके जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है । क्योंकि प्राण त्याग का दुःख थोड़ी देर के लिए होता है और मानभंग का क्लेश तो दिनों दिन होता रहता है ॥१६॥
१२२ चाणक्यनीतिदर्पणः
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रता ? ॥१७॥
मीठी बातें करने से सभी लोग प्रसन्न रहते हैं। ऐसी दशा में मीठी ही बातें करनी चाहिए। बात बोलने में कौन कमी है। १७।
संसारकूटवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे ।
सुभाषितं च सुस्वादः संगतिः सज्जने जने ॥१८॥
इस संसार रूपी कूटवृक्ष के दो अमृत-फल हैं, एक तो अच्छी-अच्छी बातें और दूसरे सज्जनों की संगति ॥१८॥
जन्मजन्मनि चाभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः ।
तेनैवाऽभ्यासयोगेन देही वाऽभ्यस्यते पुनः ॥१९॥
दान, अध्ययन और तप ये जन्म-जन्म के अभ्यास से होते हैं और प्राणी बार-बार इसी का अभ्यास करता रहता है ॥१९॥
पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥२०॥
जो विद्या कण्ठ में न रहकर पुस्तक में लिखी पड़ी है जो धन अपने हाथ में न रहकर पराये हाथ में पड़ा है अतएव आवश्यकता पड़ने पर अपने काम नहीं आसकती, वह विद्या न विद्या है और न वह धन-धनही है ॥२०॥
इति चाणक्ये षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२३
अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
पुस्तकं प्रत्ययाधीतं नाऽधीतं गुरुसन्निधौ ।
सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ॥१॥
जिस पण्डित ने गुरु के पास न पढ़कर पुस्तक ही से विद्या प्राप्त कर ली है । ऐसे लोग सभा में नहीं शोभते जैसे व्यभिचारी से गर्भवती स्त्री है ॥१॥
कृते प्रतिकृतिं कुर्यात् हिंसने प्रतिहिंसनम् ।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दौष्ट्यं समाचरेत् ॥२॥
उपकारी के प्रति उपकार, हिंसक के प्रति हिंसा करने में कोई दोष नहीं है, दुष्ट के साथ दुष्टता करनी ही चाहिये ॥२॥
यद्दूरं यद्दुराराध्यं यच्च दूरैर्व्यवस्थितम् ।
तत्सवैं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥३॥
जो वस्तु दूर है, जिसके लिए कठिन आराधना की आवश्यकता पड़ती है और जो अपने से दूर है, वह सब वस्तुयें भी तपस्या से साध्य हो सकती हैं । क्योंकि तपस्या सबसे प्रबल चीज है ॥३॥
लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः?
सत्यं यत्तपसा च किं शुचिमनो यद्यस्तितीर्थेन किम्?
सौजन्यं यदि किं गुणैःसुमहिमा यद्यस्ति किंमण्डनैः?
सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ॥४॥
जिसके पासमें लोभ है तो फिर और अवगुण की क्या आवश्यकता ? यदि चुगली करने की आदत है तो और पापों की
१२४ चाणक्यनीतिदर्पणः
क्या जरूरत ? यदि सच्चाई है तो और तपकी क्या आवश्यकता ? यदि मन शुद्ध है तो तीर्थ करने की क्या जरूरत ? यदि सुजनता है तो और गुणों की जरूरत नहीं, यदि अपना प्रभाव है तो शृङ्गार की कोई आवश्यकता नहीं, यदि अपने पास अच्छी विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता और यदि अपयश विद्यमान ह तो मरने की क्या जरूरत है ॥४॥
पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शंखो भिक्षाटनं कुर्यान्नदत्तमुपतिष्ठते ॥५॥
जिसका बाप रत्नाकार (रत्नोंका खजाना समुद्र) और लक्ष्मी जिसकी सगी बहन है, शंख भी यदि भीख माँगता फिरे तो इसका यही मतलब है कि बिना दिये कुछ किसी को मिलता नहीं ॥५॥
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः । व्याधितो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ॥६॥
अशक्त साधु होता है, ब्रह्मचारी निर्धन होता है, रोगी देवताका भक्त होता है और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता हुआ करती है ॥६॥
नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा । न गायत्र्याः परो मन्त्रः न मातुर्दैवतं परम् ॥७॥
अन्न और जल के समान कोई दान नहीं होता, एकादशी की तरह कोई तिथि नहीं होती, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं होता और माता से बढ़कर कोई देवता नहीं होता ॥७॥
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाः विषं मुखे । वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ॥८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२५
साँप के दाँत में विष रहता है, मक्खी के मुख में विष रहता है और दुष्ट मनुष्य के सारे शरीर में विष रहता है ॥८॥
पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्या व्रतचारिणी ।
आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत् ॥६॥
जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत या उपवास करती है तो वह अपने पतिकी आयुहरती ह और अन्तमें नरकगामिनी होती है ॥९॥
न दानात् शुद्धयते नारी नोपवासशतैरपि ।
न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा ॥१०॥
स्त्री न दान से, सैकड़ों तरह के व्रत करने से और न तीर्थाटन करने से ही उतना पवित्र होती है, कि जितनी स्वामी के चरणोदक से पुनीत हो जाती है ॥१०॥
पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च ।
श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥११॥
पैर धोने के बाद बचा हुआ, पीने के बाद बचा हुआ और सन्ध्या करने के बाद बचा हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान होता ह । यदि भ्रमवश भी वह जल पीले तो चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥११॥
दानेन पाणिर्नतुकंकणेन स्नानेन शुद्धिर्नतु चन्दनेन ।
मानेनतृप्तिर्न तु भोजनेनज्ञानेन मुक्तिर्नतुमण्डनेन १२।
हाथों की शोभा होती है दान से न कि कंकणों से । स्नान से शरीर की शुद्धि होती है न कि चन्दनलेप से । सज्जनों की तृप्ति सम्मान से होती ह न कि भोजन से । उसी तरह मुक्ति
१२६ चाणक्यनीतिदर्पणः
ज्ञान से होती हैं, अच्छे वेश-भूषा और श्रृङ्गार से नहीं ॥१२॥
नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम् । आत्मरूपं जले पश्येत् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ॥१३॥
मनुष्य नाई के घर हजामत बनवाता, स्वयं पत्थर पर चन्दन घिस कर लगाता और जल में अपनी छाया देखता है, वह यदि इन्द्र भी हो तो उसकी श्री नष्ट हो जाती है ॥१३॥
सद्यः प्रज्ञा हरेत्तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा । सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरः पयः ॥१४॥
तुण्डी ( कुन्दरू ) तुरन्त बुद्धि हर लेती है, वचा तुरन्त बुद्धि प्रदान करती ह, स्त्री तुरन्त शक्ति हर लेती है और दूध तुरन्त बल प्रदान करता है । १४॥
परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदस्तुः पदे पदे ॥१५॥
जिन लोगों के हृदय में परोपकार की भावना विद्यमान रहती उनकी सब विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं और पद-पद पर सम्पत्तियाँ मिलतीं रहती हैं ॥१५॥
यदि रामा यदि च रमा यदि तनयो विनयगुणोपेतः । तनये तनयोत्पत्तिः सुखमिन्द्रेकिमाधिक्यम् ॥१६॥
यदि घर में सुन्दरी स्त्री है, यदि मन माफिक धन (लक्ष्मी) मौजूद है, यदि विनय और बुद्धि से युक्त पुत्र घर में है और यदि पुत्र के भी पुत्र हो चुका है तो फिर स्वर्ग में इससे अधिक सुख कौन सा होगा ? ॥१६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२७
आहार-निद्रा-भय-मैथुनानि
समानि चैतानि नृणां पशूनाम् ।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो
ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥१७॥
भोजन, शयन, भय और स्त्री प्रसंग, ये बातें तो मनुष्य और पशु में समान भाव से विद्यमान रहती हैं । मनुष्यों में केवल ज्ञान की विशेषता रहती है, वह विशेषता भी जिसमें नहीं है, उसे पशु ही समझना चाहिये ॥१७॥
दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालै—
दूरीकृताः करिवरेण मदान्धबुद्ध्या ।
तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषो—
भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति ॥१८॥
यदि मदके मोह से पहुँचे हुए भौरों को गजराज ने अपने कानों की फड़फड़ाहट से भगा दिया तो इसमें उसीके गण्डस्थलों की शोभा नष्ट हुई । भौंरे तो वहाँ से जाकर फूले हुए कमलों के बीच में निवास करेंगे । इसी प्रकार यदि कोई मदान्ध राजा किसी गुणी का आदर न करके उसे अपने यहाँ से निकाल देता है तो उससे उस राजा ही की हानि होती है, गुणी तो कहीं न कहीं पहुँच कर अपना अड्डा जमा ही लेगा ॥१८॥
राजा वेश्या यमश्चाग्निश्चौरा बालकयाचकाः
परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकण्टकः ॥१९॥
१२८ चाणक्यनीतिदर्पणः
राजा, वेश्या, यम, अग्नि, चोर, बालक, भिखारी और ग्रामकण्टक यानी गाँववालों को दुःख देनेवाला, ये आठ प्राणी दूसरे के दुःख नहीं समझते ॥१९॥
अधः पश्यसि किं बाले ! पतितं तव किं भुवि ? रे रे मूर्ख ! न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम् ॥२०॥
कोई स्त्री किसी पुरुषको देखकर लज्जा भावसे सिर नीचा करके एक तरफ खड़ी हो गई। इस पर भी उस बेहया पुरुषने उसे छेड़ते हुए पूछा- बाले ! तुम्हारी कोई चीज गिर गयी है? क्या ढूँढ़ रही हो ! इसपर उसने झुँझलाके जवाब दिया- अरे मूर्ख ! क्या तू नहीं जानता ? यहाँ मेरी जवानीकी मोती खो गयी है ॥२०॥
व्यालाश्रयोऽपि विफलाऽपि सकण्टकाऽपि वक्राऽपि पंकसहिताऽपि दुरासदाऽपि । गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तो— रेको गुणः खलु हन्ति समस्तदोषान् ॥२१॥
कवि अन्योक्ति के रूप में केतकी (केवड़ा) से कहता है— केतकी ! यद्यपि तू साँपों का घर है, तेरे में काँटे भी बहुत होते हैं, तू टेढ़ी-मेढ़ी भी है, तेरे में कीचड़ भी होता है और तू मिलती भी मुश्किलसे है फिर भी तेरे में सुगन्ध है, उसी सुगंध की बदौलत तू सबको प्रिय है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य में चाहे कितने ही अवगुण हों पर यदि एक भी उज्जवल गुण उसके पास रहता ह तो उसके सब दोष छूमन्तर हो जाते हैं ॥२०॥
इति श्री पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषानुवाद सहितश्चाक्य-नीतिदर्पणः समाप्तः ।
पृष्ठ अत्यधिक धुंधला/जीर्ण (faded/illegible) होने के कारण मूल देवनागरी पाठ पठनीय नहीं है।
CC-0. Swami Atmanand Giri (Prabhuji) . Veda Nidhi Varanasi. Digitized by eGangotri
🌸 ज्योतिष विद्या का चमत्कार 🌸
एकबार अवश्य मँगावें ।
आप आश्चर्य न करें तो अच्छाही है । इस दुनियाँ में सभी कलायें एक तरफ और "ज्योतिष विद्या का चमत्कार एक तरफ है" बड़े से बड़े राजा, महाराजा, नेता, उद्योगपति हो वा जन साधारण सभी को भगवान भरोसे रहनाही पड़ता है और इस विद्या के ऊपर विश्वास करने सेही आपके भूत भविष्य व वर्तमान की सहायता से मालूम पड़ती है, जिसे आप स्वयं पढ़कर अनुभव करिये ।
| ग्रन्थ का नाम | मूल्य | ग्रन्थ का नाम | मूल्य |
|---|---|---|---|
| बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् | ६४) | बृहज्जातक भा.टी. | ३०) |
| भृगुसंहिताफलितसर्वाङ्ग | ३६) | रमलदिवाकर ,, | १६) |
| मानसागरी भा. टी. | २८) | सामुद्रिक रहस्य,, | १०) |
| ताजिकनीलकंठी ,, | २०) | लग्नचन्द्रिका ,, | ८) |
| जातकभरण ,, | २०) | गृहरत्नभूषण ,, | ५) |
| बृहद्ज्योतिषसार ,, | १५) | वास्तुप्रबन्ध ,, | ८) |
| कर्मविपाक ,, | १५) | ग्रहबल दर्पण ,, | ६) |
| भावकुतूहल ,, | १५) | जन्मप्रबोध ,, | ३) |
| मुहूर्त्तचिन्तामणि ,, | १३) | शीघ्रबोध ,, | ५) |
| लघुपाराशरी हिन्दी टीका | ४) | जातकालंकार भा.टी. | २) ५० |
| विवाहदाम्पत्य निर्णय | १४) |
हर प्रकार की पुस्तक मिलने का पता —
ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स, बुकसेलर,
राजादरवाजा, वाराणसी ।
मुद्रक—स्वतन्त्रभारत प्रेस, वाराणसी ।