चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १२७
आहार-निद्रा-भय-मैथुनानि
समानि चैतानि नृणां पशूनाम् ।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो
ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥१७॥
भोजन, शयन, भय और स्त्री प्रसंग, ये बातें तो मनुष्य और पशु में समान भाव से विद्यमान रहती हैं । मनुष्यों में केवल ज्ञान की विशेषता रहती है, वह विशेषता भी जिसमें नहीं है, उसे पशु ही समझना चाहिये ॥१७॥
दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालै—
दूरीकृताः करिवरेण मदान्धबुद्ध्या ।
तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषो—
भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति ॥१८॥
यदि मदके मोह से पहुँचे हुए भौरों को गजराज ने अपने कानों की फड़फड़ाहट से भगा दिया तो इसमें उसीके गण्डस्थलों की शोभा नष्ट हुई । भौंरे तो वहाँ से जाकर फूले हुए कमलों के बीच में निवास करेंगे । इसी प्रकार यदि कोई मदान्ध राजा किसी गुणी का आदर न करके उसे अपने यहाँ से निकाल देता है तो उससे उस राजा ही की हानि होती है, गुणी तो कहीं न कहीं पहुँच कर अपना अड्डा जमा ही लेगा ॥१८॥
राजा वेश्या यमश्चाग्निश्चौरा बालकयाचकाः
परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकण्टकः ॥१९॥