चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ चाणक्यनीतिदर्पणः
ज्ञान से होती हैं, अच्छे वेश-भूषा और श्रृङ्गार से नहीं ॥१२॥
नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम् । आत्मरूपं जले पश्येत् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ॥१३॥
मनुष्य नाई के घर हजामत बनवाता, स्वयं पत्थर पर चन्दन घिस कर लगाता और जल में अपनी छाया देखता है, वह यदि इन्द्र भी हो तो उसकी श्री नष्ट हो जाती है ॥१३॥
सद्यः प्रज्ञा हरेत्तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा । सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरः पयः ॥१४॥
तुण्डी ( कुन्दरू ) तुरन्त बुद्धि हर लेती है, वचा तुरन्त बुद्धि प्रदान करती ह, स्त्री तुरन्त शक्ति हर लेती है और दूध तुरन्त बल प्रदान करता है । १४॥
परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदस्तुः पदे पदे ॥१५॥
जिन लोगों के हृदय में परोपकार की भावना विद्यमान रहती उनकी सब विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं और पद-पद पर सम्पत्तियाँ मिलतीं रहती हैं ॥१५॥
यदि रामा यदि च रमा यदि तनयो विनयगुणोपेतः । तनये तनयोत्पत्तिः सुखमिन्द्रेकिमाधिक्यम् ॥१६॥
यदि घर में सुन्दरी स्त्री है, यदि मन माफिक धन (लक्ष्मी) मौजूद है, यदि विनय और बुद्धि से युक्त पुत्र घर में है और यदि पुत्र के भी पुत्र हो चुका है तो फिर स्वर्ग में इससे अधिक सुख कौन सा होगा ? ॥१६॥