चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११४ चाणक्यनीतिदर्पण।
को अपने मुख विवर में आसन दिये रहते हैं, शिवजी को पूजने के लिये जो रोज मेरा घर (कमल) उजाड़ा करते हैं, इन्हीं कारणों से नाराज होकर हे नाथ ! मैं सदैव ब्राह्मण का घर छोड़े रहती हूँ-वहाँ जाती ही नहीं ॥१६॥
बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्। दारुभेदनिपुणोऽपिषण्डङ्घ्रिनिष्क्रियोभवति पंकजकोशे
दोहा-बन्धन बहु तेरे अहें, प्रेमबन्धन कछु और । कठौ काटन में निपुण, बँध्यो कमल महँ भौर ॥१७॥
वैसे तो बहुत से बन्धन हैं, पर प्रेम की डोर का बन्धन कुछ और ही है। काठको काटने में निपुण भ्रमर कमलदल को काटने में असमर्थ होकर उसमें बँध जाता है ॥१७॥
छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धं वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम। यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥१८॥
दोहा---कटे न चन्दन महक तजु, वृद्ध न खेल गजेश । ऊख न पेरे मधुरता, शील न सकुल कलेश ॥१८॥
काटे जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, बूढ़ा हाथी भी खेलवाड़ नहीं छोड़ता, कोल्हू में पेरे जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती, ठीक इसी प्रकार कुलीन पुरुष निर्धन होकर भी अपना शील और गुण नहीं छोड़ता ॥१८॥