भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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८ चाणक्यनीतिदर्पणः ११३

अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः । विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते ॥१५॥

दो०—वह अलि नलिनी पति मधुप, तेहिरस मद अलसान । परि विदेश विधिवश करै, फूल रसा बहु मान ॥१५॥

यह एक भौंरा है, जो पहले कमलदल के ही बीचमें कमलिनी का वास लेता रहता था संयोगवश वह अब परदेश जा पहुँचा है, वहाँ वह कौरैया के पुष्परस को ही बहुत समझता है ॥१५॥

पीतः क्रुद्धेनतातश्चरणतलहता वल्लभो येन रोषा- दाबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे । गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिनसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासदाहंद्विजकुलनिलयंज्ञातयुक्तंत्यजामि

स०--क्रोध से तात पियो चरणन से स्वामी हतो जिन रोषते छाती । बालसे वृद्धभये तक मुख में भारति वैरिणी धारे संघाती ॥ मम वासको पुष्प सदा उन तोड़त शिवजीकी पूजा होत प्रभाति। ताते दुख मान सदैव हरी मैं ब्राह्मण कुलको त्याग चित्लाती ॥ ब्राह्मण अधिकांश दरिद्र दिखाई देते हैं, कवि कहता है कि इस विषय पर किसी प्रश्नोत्तर के समय लक्ष्मीजी भगवान् से कहती हैं—जिसने क्रुद्ध होकर मेरे पिता को पीलिया, मेरे स्वामी को लात से मारा, बाल्यकाल ही से जो रोज ब्राह्मण लोग वैरिणी (सरस्वती)