चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ चाणक्यनीतिदर्पणः
कितने लोग चारो वेद और बहुत से धर्मशास्त्र पढ़ जाते हैं, पर वे आपको नहीं समझ पाते, जैसे कि कलछुल पाक में रहकर भी पाक का स्वाद नहीं जान सकती ॥१२॥
धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे ।
तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ॥१३॥
दोहा—भवसागर में धन्य है, उलटी यह द्विज नाव ।
नीचे रहि तर जात सब, ऊपर रहि बुड़ि जाय ॥१३॥
यह द्विजमयी नौका धन्य है, कि जो इस संसाररूपी सागरमें उलटे तौर पर चलती है । जो इससे नीचे (नम्र) रहते हैं, वे तर जाते हैं और जो ऊपर (उद्धत) रहते, वे नीचे चले जाते हैं ॥१३॥
अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनाम् ।
अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः ॥
भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः ।
परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ॥१४॥
दोहा—सुधा धाम औषधिपति, छवि युत अमीय शरीर ।
तऊ चंद्र रविढिग मलिन, पर घर कौन गम्भीर ॥१४॥
यद्यपि चन्द्रमा अमृत का भण्डार है, ओषधियों का स्वामी है; स्वयं अमृतमय है और कान्तिमान् है । फिर भी जब वह सूर्य के मण्डल में पड़ जाता है तो किरण रहित हो जाता है । पराये घर जाकर भला कौन ऐसा है कि जिसकी लघुता न साबित होती हो ॥१४॥