चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १११
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥१०॥
दोहा—बहुत विघ्न कम काल है, विद्या शास्त्र अपार । जल से जैसे हंस पय, लीजै सार निसार ॥१०॥
शास्त्र अनन्त हैं, बहुत सी विद्यायें हैं, थोड़ा सा समय 'जीवन' है और उसमें बहुत से विघ्न हैं । इसलिये समझदार मनुष्य को उचित है जैसे हंस सबको छोड़कर पानी से दूध केवल लेता है, उसी तरह जो अपने मतलब की बात हो, उसे ले ले बाकी सब छोड़ दे ॥१०॥
दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा च गृहमागतम् । अनर्चयित्वा यो भुङ्क्ते स वै चाण्डाल उच्यते ॥११॥
दोहा—दूर देश से राह थकि, बिनु कारज घर आय । तेहि बिनु पूजे खाय जो, चाण्डाल कहलाय ॥११॥
जो दूर से आ रहा हो इन अभ्यागतों की सेवा किये बिना जो भोजन कर लेता है उसे चाण्डाल कहना चाहिए ॥११॥
पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेक॒शः । आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१२॥
दोहा—पढ़े चारहूँ वेदहुँ, धर्म शास्त्र बहु बाद । आपुहिं जानै नाहिं ज्यों, करिद्धिहिं व्यञ्जन स्वाद ॥१२॥