भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 132 में से

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११० चाणक्यनीतिदर्पणः

अयोग्य सावित हो जाता है। जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया और विष भी शिवजीके कण्ठका शृङ्गार हो गया ॥७॥

तद्भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं
तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।
सा प्राज्ञता या न करोति पापं
दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः ॥८॥

दोहा—द्विज उबरैउ भोजन सोई, पर सो मैत्री सोय।
जेहि न पाप वह चतुरता, धर्म दम्भ बिनुसोय ॥८॥

वही भोजन भोजन है, जो ब्राह्मणों के जीम लेने के बाद बचा हो, वही, प्रेम, प्रेम है जो स्वार्थ वश अपने ही लोगों में न किया जाकर औरों पर भी किया जाय। वही विज्ञता (समझदारी) है कि जिसके प्रभाव से कोई पाप न हो सके और वही धर्म है कि जिसमें आडम्बर न हो ॥८॥

मणिलुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः ॥६॥

दोहा—मणि लोटत रहु पाँव तर, काँच रह्यो शिर नाय।
लेत देत मणिही रहे, काँच काँच रहि जाय ॥९॥

वैसे मणि पैरों तले लुढ़के और काँच माथे पर रखा जाय तो इसमें उन दोनों के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। पर जब वे दोनों बाजार में बिकने आवेंगे और उनका क्रय-विक्रय होने लगेगा तब काँच-काँच ही रहेगा और मणि मणि ही ॥९॥

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