चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
चाणक्यनीतिदर्पणः १२५
साँप के दाँत में विष रहता है, मक्खी के मुख में विष रहता है और दुष्ट मनुष्य के सारे शरीर में विष रहता है ॥८॥
पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्या व्रतचारिणी ।
आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत् ॥६॥
जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत या उपवास करती है तो वह अपने पतिकी आयुहरती ह और अन्तमें नरकगामिनी होती है ॥९॥
न दानात् शुद्धयते नारी नोपवासशतैरपि ।
न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा ॥१०॥
स्त्री न दान से, सैकड़ों तरह के व्रत करने से और न तीर्थाटन करने से ही उतना पवित्र होती है, कि जितनी स्वामी के चरणोदक से पुनीत हो जाती है ॥१०॥
पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च ।
श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥११॥
पैर धोने के बाद बचा हुआ, पीने के बाद बचा हुआ और सन्ध्या करने के बाद बचा हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान होता ह । यदि भ्रमवश भी वह जल पीले तो चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥११॥
दानेन पाणिर्नतुकंकणेन स्नानेन शुद्धिर्नतु चन्दनेन ।
मानेनतृप्तिर्न तु भोजनेनज्ञानेन मुक्तिर्नतुमण्डनेन १२।
हाथों की शोभा होती है दान से न कि कंकणों से । स्नान से शरीर की शुद्धि होती है न कि चन्दनलेप से । सज्जनों की तृप्ति सम्मान से होती ह न कि भोजन से । उसी तरह मुक्ति
१२६ चाणक्यनीतिदर्पणः
ज्ञान से होती हैं, अच्छे वेश-भूषा और श्रृङ्गार से नहीं ॥१२॥
नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम् । आत्मरूपं जले पश्येत् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ॥१३॥
मनुष्य नाई के घर हजामत बनवाता, स्वयं पत्थर पर चन्दन घिस कर लगाता और जल में अपनी छाया देखता है, वह यदि इन्द्र भी हो तो उसकी श्री नष्ट हो जाती है ॥१३॥
सद्यः प्रज्ञा हरेत्तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा । सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरः पयः ॥१४॥
तुण्डी ( कुन्दरू ) तुरन्त बुद्धि हर लेती है, वचा तुरन्त बुद्धि प्रदान करती ह, स्त्री तुरन्त शक्ति हर लेती है और दूध तुरन्त बल प्रदान करता है । १४॥
परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदस्तुः पदे पदे ॥१५॥
जिन लोगों के हृदय में परोपकार की भावना विद्यमान रहती उनकी सब विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं और पद-पद पर सम्पत्तियाँ मिलतीं रहती हैं ॥१५॥
यदि रामा यदि च रमा यदि तनयो विनयगुणोपेतः । तनये तनयोत्पत्तिः सुखमिन्द्रेकिमाधिक्यम् ॥१६॥
यदि घर में सुन्दरी स्त्री है, यदि मन माफिक धन (लक्ष्मी) मौजूद है, यदि विनय और बुद्धि से युक्त पुत्र घर में है और यदि पुत्र के भी पुत्र हो चुका है तो फिर स्वर्ग में इससे अधिक सुख कौन सा होगा ? ॥१६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १२७
आहार-निद्रा-भय-मैथुनानि
समानि चैतानि नृणां पशूनाम् ।
ज्ञानं नराणामधिको विशेषो
ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥१७॥
भोजन, शयन, भय और स्त्री प्रसंग, ये बातें तो मनुष्य और पशु में समान भाव से विद्यमान रहती हैं । मनुष्यों में केवल ज्ञान की विशेषता रहती है, वह विशेषता भी जिसमें नहीं है, उसे पशु ही समझना चाहिये ॥१७॥
दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालै—
दूरीकृताः करिवरेण मदान्धबुद्ध्या ।
तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषो—
भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति ॥१८॥
यदि मदके मोह से पहुँचे हुए भौरों को गजराज ने अपने कानों की फड़फड़ाहट से भगा दिया तो इसमें उसीके गण्डस्थलों की शोभा नष्ट हुई । भौंरे तो वहाँ से जाकर फूले हुए कमलों के बीच में निवास करेंगे । इसी प्रकार यदि कोई मदान्ध राजा किसी गुणी का आदर न करके उसे अपने यहाँ से निकाल देता है तो उससे उस राजा ही की हानि होती है, गुणी तो कहीं न कहीं पहुँच कर अपना अड्डा जमा ही लेगा ॥१८॥
राजा वेश्या यमश्चाग्निश्चौरा बालकयाचकाः
परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकण्टकः ॥१९॥
१२८ चाणक्यनीतिदर्पणः
राजा, वेश्या, यम, अग्नि, चोर, बालक, भिखारी और ग्रामकण्टक यानी गाँववालों को दुःख देनेवाला, ये आठ प्राणी दूसरे के दुःख नहीं समझते ॥१९॥
अधः पश्यसि किं बाले ! पतितं तव किं भुवि ? रे रे मूर्ख ! न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम् ॥२०॥
कोई स्त्री किसी पुरुषको देखकर लज्जा भावसे सिर नीचा करके एक तरफ खड़ी हो गई। इस पर भी उस बेहया पुरुषने उसे छेड़ते हुए पूछा- बाले ! तुम्हारी कोई चीज गिर गयी है? क्या ढूँढ़ रही हो ! इसपर उसने झुँझलाके जवाब दिया- अरे मूर्ख ! क्या तू नहीं जानता ? यहाँ मेरी जवानीकी मोती खो गयी है ॥२०॥
व्यालाश्रयोऽपि विफलाऽपि सकण्टकाऽपि वक्राऽपि पंकसहिताऽपि दुरासदाऽपि । गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तो— रेको गुणः खलु हन्ति समस्तदोषान् ॥२१॥
कवि अन्योक्ति के रूप में केतकी (केवड़ा) से कहता है— केतकी ! यद्यपि तू साँपों का घर है, तेरे में काँटे भी बहुत होते हैं, तू टेढ़ी-मेढ़ी भी है, तेरे में कीचड़ भी होता है और तू मिलती भी मुश्किलसे है फिर भी तेरे में सुगन्ध है, उसी सुगंध की बदौलत तू सबको प्रिय है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य में चाहे कितने ही अवगुण हों पर यदि एक भी उज्जवल गुण उसके पास रहता ह तो उसके सब दोष छूमन्तर हो जाते हैं ॥२०॥
इति श्री पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषानुवाद सहितश्चाक्य-नीतिदर्पणः समाप्तः ।
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CC-0. Swami Atmanand Giri (Prabhuji) . Veda Nidhi Varanasi. Digitized by eGangotri
🌸 ज्योतिष विद्या का चमत्कार 🌸
एकबार अवश्य मँगावें ।
आप आश्चर्य न करें तो अच्छाही है । इस दुनियाँ में सभी कलायें एक तरफ और "ज्योतिष विद्या का चमत्कार एक तरफ है" बड़े से बड़े राजा, महाराजा, नेता, उद्योगपति हो वा जन साधारण सभी को भगवान भरोसे रहनाही पड़ता है और इस विद्या के ऊपर विश्वास करने सेही आपके भूत भविष्य व वर्तमान की सहायता से मालूम पड़ती है, जिसे आप स्वयं पढ़कर अनुभव करिये ।
| ग्रन्थ का नाम | मूल्य | ग्रन्थ का नाम | मूल्य |
|---|---|---|---|
| बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् | ६४) | बृहज्जातक भा.टी. | ३०) |
| भृगुसंहिताफलितसर्वाङ्ग | ३६) | रमलदिवाकर ,, | १६) |
| मानसागरी भा. टी. | २८) | सामुद्रिक रहस्य,, | १०) |
| ताजिकनीलकंठी ,, | २०) | लग्नचन्द्रिका ,, | ८) |
| जातकभरण ,, | २०) | गृहरत्नभूषण ,, | ५) |
| बृहद्ज्योतिषसार ,, | १५) | वास्तुप्रबन्ध ,, | ८) |
| कर्मविपाक ,, | १५) | ग्रहबल दर्पण ,, | ६) |
| भावकुतूहल ,, | १५) | जन्मप्रबोध ,, | ३) |
| मुहूर्त्तचिन्तामणि ,, | १३) | शीघ्रबोध ,, | ५) |
| लघुपाराशरी हिन्दी टीका | ४) | जातकालंकार भा.टी. | २) ५० |
| विवाहदाम्पत्य निर्णय | १४) |
हर प्रकार की पुस्तक मिलने का पता —
ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स, बुकसेलर,
राजादरवाजा, वाराणसी ।
मुद्रक—स्वतन्त्रभारत प्रेस, वाराणसी ।